किशनगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट पर डैम को लेकर पाकिस्तान की आपत्तियों को वर्ल्ड बैंक ने खारिज कर दिया है. पाकिस्तान को करारा झटका देते हुए वर्ल्ड बैंक ने इस मामले में दखल देने से इंकार कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 मई को किशनगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया था. यह वही प्रोजेक्ट है, जिसपर पाकिस्तान शुरू से ही आपत्ति जता रहा है. 10 साल में पूरा हुआ यह प्रोजेक्ट भारत और पाकिस्तान के बीच काफी वक्त से मतभेद का कारण बना हुआ है. परियोजना के उद्घाटन के बाद पाकिस्तान ने वर्ल्ड बैंक से शिकायत की थी. लेकिन उसे करारा झटका लगा है. 1960 के सिंधु जल समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान ने इस
प्रोजेक्ट पर विश्व बैंक से निगरानी रखने को कहा था और साथ ही अपील की थी
कि वर्ल्ड बैंक इस प्रोजेक्ट में गारंटर की भूमिका निभाए. हालांकि इस पर वर्ल्ड बैंक, पाकिस्तान और भारत के अधिकारियों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी.
330 मेगावॉट क्षमता वाली किशनगंगा परियोजना नियंत्रण रेखा से महज दस किलोमीटर की दूरी पर है. जहां यह परियोजना स्थित है वह इलाका साल भर में छह महीनों के लिए राज्य के बाकी हिस्सों से कटा रहता है. नीलम नदी, जिसका एक नाम किशनगंगा भी है पर बने इस परियोजना की शुरुआत साल 2007 में हुई थी. इसके 3 साल बाद ही पाकिस्तान ने यह मामला हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उठाया, जहां तीन साल के लिए इस परियोजना पर रोक लगा दी गई. साल 2013 में, कोर्ट ने फैसला दिया कि किशनगंगा प्रॉजेक्ट सिंधु जल समझौते के अनुरूप है और भारत ऊर्जा उत्पादन के लिए इसके पानी को डाइवर्ट कर सकता है.
ऐसे में किशनगंगा प्रोजेक्ट भारत के लिए सिर्फ एक बांध नहीं है और इसकी सुरक्षा करना भारत के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन यह आसान नहीं है. कई सुरक्षा एजेंसियों ने इस परियोजना पर आतंकवादी हमले की आशंका जताई है. घुसपैठ की वारदातों और खुफिया रिपोर्ट के मद्देनजर गृह मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है. आपको बता दें कि यह प्रोजेक्ट दो घाटियों के बीच 379 हेक्टर में फैला हुआ है और इसके लिए 23.24 किलोमीटर सुरंग खोदी गई है .
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार पाकिस्तान द्वारा मोर्टार हमले और आतंकियों दोनों से इस बांध को खतरा है, हालांकि ज्यादा खतरा आतंकियों से है. नवंबर 2016 में जब उड़ी हमले और फिर भारत की जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान लगातार सीजफायर का उल्लंघन कर रहा था, तब कई मोर्टार यहां आकर गिरे थे. उस दौरान सभी कर्मचारी भागकर इसके टनल में चले गए थे, जो उस समय खाली था और पानी से भरा नहीं गया था.
परियोजना पर काम कर रहे एक अधिकारी के अनुसार यह टनल 2014 में बन चुका था. यह टनल गुरेज स्थित डैम से पानी बांदीपोरा स्थित पावर स्टेशन तक ले जाने का काम आता है. उस दौरान कई कर्मचारियों अलावा गांववाले भी सुरक्षा के लिए इस टनल में आ गए थे. उनकी मदद के लिए सेना को बुलाया गया था. हालांकि ऐसी घटना अब तक सिर्फ एक बार हुई है.
वहीं अब इस डैम की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. इसकी सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) कर रहा है. इसके अलावा सेना का एक कैंप भी यहां मौजूद है. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार एक अधिकारी ने बताया कि भारत ने अगर इस संवेदनशील जगह पर डैम बनाने का निर्णय लिया है तो उसे पूरा विश्वास है कि वह इसकी सुरक्षा भी कर सकता है. हालांकि इस डैम को ज्यादा बड़ा खतरा किसी आतंकी हमले से है.
अधिकारी के अनुसार पाकिस्तान इस डैम को इसलिए भी नुकसान नहीं पहुंचाना
चाहेगा क्योंकि इससे सबसे ज्यादा नुकसान उसे ही होगा. क्योंकि बांध के
टूटने पर सबसे ज्यादा खतरा एलओसी के पास पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के
इलाकों को है. किशनगंगा नदी के एलओसी पार करते ही आबादी वाले गांव शुरू हो
जाते हैं. पाकिस्तान में इसे तावबल कहा जाता है. वहीं भारत के हिस्से में
स्थित 27 गांवों में से बस 6 गांव ही डैम के बाद नीचे किशनगंगा नदी के
किनारे स्थित हैं.
अधिकारी के अनुसार डैम को पाकिस्तान की बमबारी से इसलिए भी ज्यादा खतरा
नहीं है, क्योंकि डैम पहाड़ों के बीच स्थित है और पाकिस्तान की बमबारी
की सीधे पहुंच में नहीं आता है. साथ बांध काफी मजबूत है और इसका
इंफ्रास्ट्रक्चर बमबारी झेलने के लिए काबिल है. हालांकि सबसे ज्यादा
खतरा आतंकियों द्वारा प्लान अटैक से है.
आतंकियों के हमले में भी पाकिस्तान की तरफ बाढ़ का खतरा बना हुआ है, हालांकि यह हमले के स्तर पर निर्भर करेगा. डैम को हमले से कितना नुकसान पहुंचा है, उस निर्भर करेगा कि पानी का फ्लो कैसा रहेगा. आपको बता दें कि गुरेज में रह रहे लोग भी इस डैम की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. यहां रह रहे ज्यादातर लोगों को प्रो इंडिया माना जाता है, ऐसे में वे सेना की मदद भी करते हैं.
टनल की सुरक्षा के बारे में अधिकारी ने बताया कि यह पानी से भरा रहता है, ऐसे में यहां तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है और इस पर हमला करना काफी मुश्किल है.
आपको बता दें कि किशनगंगा प्रोजेक्ट के उद्घाटन के बाद पाकिस्तान एकबार फिर विश्व बैंक के पास पहुंच गया था. 1960 के सिंधु जल समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान ने इस प्रोजेक्ट पर विश्व बैंक से निगरानी रखने को कहा था. सूत्रों के अनुसार इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है, लेकिन हां वर्ल्ड बैंक ने पाकिस्तान से यह वादा जरूर किया है कि वह इस मसले पर दोनों देशों से बात करता रहेगा. आपको बता दें कि पहले इसकी लंबाई 98 मीटर रखी गयी थी लेकिन पाकिस्तान की आपत्ति के बाद इसे 37 मीटर कर दिया गया था.