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वैज्ञानिकों की चेतावनी...इस सदी के अंत में आएगा 'प्रलय'...वजह आपको हैरान कर देगी

इस सदी के अंत तक धरती पर भयानक आपदाएं आएंगी. दुनियाभर के साइंटिस्ट इस बात को लेकर परेशान हैं. विज्ञान की रिपोर्ट पब्लिश करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी मैगजीन Nature ने हाल ही में एक सर्वे कराया. सर्वे आम लोगों का नहीं था. IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट बनाने वाले वैज्ञानिकों का था. इन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जिस तरह से ग्लोबल वॉर्मिंग यानी वैश्विक गर्मी बढ़ रही है, उस हिसाब से 2100 तक धरती पर भयानक बदलाव होंगे. ये किसी प्रलय से कम नहीं होंगे.

IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट बनाने वाले वैज्ञानिक ग्लोबल वॉर्मिंग से चिंतित. (फोटोः गेटी) IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट बनाने वाले वैज्ञानिक ग्लोबल वॉर्मिंग से चिंतित. (फोटोः गेटी)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • वैज्ञानिकों को डर- अंतरराष्ट्रीय लीडर्स नहीं कर रहे तेजी से काम
  • जल प्रलय और सूखे जैसी आपदा का खतरा सबसे ज्यादा है
  • लोग सोच रहे हैं कि बच्चे पैदा करें या नहीं, क्योंकि दुनिया सही नहीं रहेगी

इस सदी के अंत तक धरती पर भयानक आपदाएं आएंगी. दुनियाभर के साइंटिस्ट इस बात को लेकर परेशान हैं. विज्ञान की रिपोर्ट पब्लिश करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी मैगजीन Nature ने हाल ही में एक सर्वे कराया. सर्वे आम लोगों का नहीं था. IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट बनाने वाले वैज्ञानिकों का था. इन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जिस तरह से ग्लोबल वॉर्मिंग यानी वैश्विक गर्मी बढ़ रही है, उस हिसाब से 2100 तक धरती पर भयानक बदलाव होंगे. ये किसी प्रलय से कम नहीं होंगे. 

IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट को दुनिया के 234 साइंटिस्ट ने मिलकर बनाया है. उनमें से एक साइंटिस्ट और कोलंबिया के मेडेलिन में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एंटीकोइया की रिसर्चर पाओला एरियास ने कहा कि जितनी तेजी से दुनिया बदल रही है. जरूरतें बदल रही हैं. संसाधनों का दोहन हो रहा है. प्रदूषण और गर्मी बढ़ रही है, उस हिसाब से तो जीना मुश्किल होने वाला है. लगातार बदल रहे बारिश के पैटर्न से पानी की किल्लत हो भी रही है, आगे चलकर और भयावह स्थिति हो जाएगी. 

पाओला ने चेताया कि जिस तरह से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है, उस हिसाब से समुद्री जलस्तर भी बढ़ रहा है. मुझे लग नहीं रहा कि अंतरराष्ट्रीय लीडर्स ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर बहुत ज्यादा सक्रिय हैं. वो धीमी गति से काम कर रहे हैं. इस गति से धरती को बचाया नहीं जा सकता. प्राकृतिक आपदाओं के चलते सामूहिक स्तर पर लोग विस्थापित हो रहे हैं. IPCC की क्लाइमेट रिपोर्ट में जो बातें कही गई हैं, उनके हिसाब से इंसानों के पास धरती को बचाने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है. 

​​​​कहीं मंगल ग्रह की तरह न हो जाए धरती. ज्यादा तापमान में तो समुद्र सूख जाएंगे या फिर जमीन डूब जाएगी. (फोटोः गेटी)
​​​​कहीं मंगल ग्रह की तरह न हो जाए धरती. ज्यादा तापमान में तो समुद्र सूख जाएंगे या फिर जमीन डूब जाएगी. (फोटोः गेटी)

कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी पाओला एरियास की बात से सहमति जताई. नेचर जर्नल ने पिछले महीने इस क्लाइमेट रिपोर्ट को बनाने वाले 233 वैज्ञानिकों को सर्वे में शामिल कराया. जिसमें 92 वैज्ञानिकों ने जवाब दिया. यानी इस समूह के 40 फीसदी वैज्ञानिकों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि साल 2100 तक धरती पर इतनी तरह की समस्याएं आएंगी कि कई देश तो उसी में तबाह हो जाएंगे. बेमौसम बारिश, अचानक बादलों का फटना, सुनामी, तापमान ज्यादा होना. बाढ़, सूखा जैसी समस्याओं से इंसान परेशान हो जाएगा. 

जिन वैज्ञानिकों ने जवाब दिया उसमें से 60 फीसदी ने यह माना कि इस सदी के अंत तक धरती का औसत तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. यह पेरिस समझौते द्वारा तय किए गए 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तापमान से कहीं ज्यादा है. 88 फीसदी वैज्ञानिकों ने कहा कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से प्रलय जैसी आपदाएं आएंगी. जलवायु परिवर्तन कई पीढ़ियों को परेशान करेगा. इनमें से आधे वैज्ञानिकों ने क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अपनी जीवनशैली ही बदल ली है. 

IPCC की रिपोर्ट में 1.5 से 4 डिग्री तक तापमान बढ़ने की बात कही गई है. (फोटोः गेटी)
IPCC की रिपोर्ट में 1.5 से 4 डिग्री तक तापमान बढ़ने की बात कही गई है. (फोटोः गेटी)

जीवनशैली बदलने के मामले में सबसे बड़ा सवाल ये आया है कि बच्चे पैदा करें या नहीं. क्योंकि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य नहीं दे सकते तो उन्हें इस बर्बाद होती दुनिया में लाने की क्या जरूरत है. जवाब देने वाले वैज्ञानिकों में से 60 फीसदी ने कहा कि उन्हें बेचैनी, दुख और तनाव महसूस होता है, जब वो जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचते हैं. 

पाओला एरियास कहती हैं कि वेनेजुएला जैसे राजनीतिक तौर पर अस्थिर देशों में तो स्थिति और बिगड़ेगी. वहां खाने और रहने की बड़ी समस्या हो रही है. ऐसे ही उन देशों का सोचिए जहां पर आए दिन कोई न कोई बीमारी फैलती रहती है. अगर प्रकृति साथ न दे तो स्थिति और भयावह हो सकती है. अमेरिका, चीन, यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने का वादा किया है लेकिन क्या वो कर पाएंगे. क्योंकि जिन तरीकों से ये किया जा सकता है, उसके लिए दुनिया अभी मानसिक और आर्थिक तौर पर खुद को तैयार ही नहीं कर पा रही है. 

अफ्रीकन इंस्टीट्यूट फॉर मैथेमेटिकल साइंस के क्लाइमेट मॉडलर और आईपीसी रिपोर्ट में शामिल साइंटिस्ट मोउहमादोउ बाम्बा सिला ने कहा कि इस समय दुनियाभर की सरकारें सिर्फ ग्रीन वादें कर रही हैं. कोई एक्शन लेता हुआ नहीं दिख रहा है. चाहे वह अमीर देश हों या विकासशील. गरीब देशों की तो बात ही नहीं कर सकते. जमीन पर क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर कोई काम होता हुआ नहीं दिख रहा है. 

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