केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने लोगों से अपील की है कि गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए अस्थियों को उसमें प्रवाह न करें. केंद्रीय राज्यमंत्री नमामि गंगे प्रोजेक्ट के आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. सत्यपाल ने कहा कि अस्थियों को जमीन पर इकट्ठा करके पूर्वजों के नाम का पौधा लगाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए अस्थियों के विसर्जन और जलसमाधि जैसी धार्मिक प्रथाओं पर रोक लगनी चाहिए. उन्होंने देश के धर्माचार्यों और धर्मगुरुओं से अपील की कि वे गंगा को निर्मल बनाने में अपने स्तर पर भी पहल करें.
डा. सत्यपाल ने कहा कि अस्थियों के विसर्जन, साधु संतों के जलसमाधि लेने या फिर फूल अर्पित करने की वजह से भी गंगा प्रदूषित हो रही हैं. गंगा में अस्थियों का विसर्जन कतई शास्त्रसम्मत नहीं है. सत्यपाल ने साथ ही यह भी कहा, 'लोगों की आस्था है लेकिन समय की मांग के चलते जरूरत है कि हम उस दोबारा ध्यान दे और कुछ भी ऐसा न करें जिससे गंगा की शुद्धता पर असर पहुंचे.' अब सवाल यह उठता है कि आखिर हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के बाद अस्थिविसर्जन गंगा या पवित्र नदियों में ही करने की परंपरा क्यों रही है. आइए जानते हैं क्या कहते हैं शास्त्र और पुराण...
हिन्दू धर्म के अलावा सिख धर्म में ही अस्थि विसर्जन किया जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं कि वह गंगा नदी में ही हो. लेकिन हिंदू धर्म के शास्त्रों में खासतौर पर अस्थि विसर्जन को गंगा नदी से जोड़कर ही देखा गया है.
हिन्दू धार्मिक स्थल जैसे कि हरिद्वार, प्रयाग आदि में गंगा का वास है जहां एक बड़े स्तर पर विधि-विधान से अस्थि विसर्जन किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि मनुष्य की अस्थियां वर्षों तक गंगा नदी में ही रहती हैं. गंगा नदी धीरे-धीरे उन अस्थियों के माध्यम से इंसान के पाप को खत्म करती है और उससे जुड़ी आत्मा के लिए नया मार्ग खोलती है.
महाभारत की एक मान्यता के अनुसार जब तक गंगा में व्यक्ति की अस्थियां रहती हैं तब तक वह स्वर्ग का अधिकारी बना रहता है. पद्मपुराण में कहा गया है कि जिस व्यक्ति के प्राण निकल रहे हों उसके मुंह में गंगा जल की एक बूंद भी डल जाए या गंगा मैया का स्मरण कर लेने भर से उसके सभी पापों का नाश हो जाता है और वो विष्णु लोक में जाता है.
शंख स्मृति एवं कर्म पुराण में गंगा नदी में ही क्यों अस्थि विसर्जन करना शुभ बताया गया है. इस नदी की पवित्रता को दर्शाते हुए ही वर्षों से अस्थियों को इसमें विसर्जित करने की महत्ता बनी हुई है. महाभागवत में यमराज ने अपने दूतों को बताया है कि गंगा में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति का मैं दास हूं.
क्या है वैज्ञानिक आधार?
इंसान की अस्थियों एवं नदी को वैज्ञानिक रूप से भी जोड़कर देखा जाता है. कहते हैं कि नदी में प्रवाहित मनुष्य की अस्थियां समय-समय पर अपना आकार बदलती रहती हैं जो कहीं ना कहीं उस नदी से जुड़े स्थान को उपजाऊ बनाती हैं.
अस्थियां और प्रकृति-
जिस भी धरातल को नदी का पानी छूता है वह स्थान उपजाऊ बन जाता है. इसका यह अर्थ है कि मरने के बाद भी इंसान की अस्थियां प्रकृति को एक नया जीवन देने के लिए लाभकारी सिद्ध होती हैं.