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नेताजी की 125वीं जयंती 'पराक्रम दिवस' पर विशेषः ये थी टकराव की वजह, फिर भी गांधी सुभाष चंद्र बोस के लिए थे राष्ट्रपिता

नेताजी की 125वीं जयंती पर जानिए कि महात्मा गांधी और नेताजी के आपसी रिश्ते क्या थे, कि वैचारिक पथ अलग होने के बावजूद सुभाष बाबू ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा. लेखक राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' का अंश

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गांधी और सुभाषः भारत माता के दो अमर सपूत गांधी और सुभाषः भारत माता के दो अमर सपूत

जनता के दिल-दिमाग पर राज करने वाले देश के लाडले महान सपूत नेताजी और गांधी जी के रिश्तों की बार-बार पड़ताल होती रही है. आजाद हिंद फौज की अगुवाई उनके विराट व्यक्तित्व का दूसरा चमकीला पहलू है. उनका पराक्रम उनके प्रति श्रद्धानत करता है. पहले अहिंसक रास्ते और फिर ब्रिटिश सत्ता से सीधे युद्ध के जरिये पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति का यह संघर्ष विलक्षण और अविस्मरणीय है. वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राज खन्ना ने अपनी पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन से जुड़े कई पहलुओं को उजागर करने के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेताओं के उच्चकोटि के आपसी संबंधों पर भी नजर डाली है. 

आज नेताजी की 125वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए उनकी संघर्षगाथा के इन दोनों पहलुओं पर राज खन्ना की पुस्तक के इन दो अंशों को पढ़िए और जानिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आपसी रिश्ते क्या थे, कि वैचारिक पथ अलग होने के बावजूद उनमें किस कदर एक दूसरे के प्रति सम्मान था.

 गांधी जी और सुभाष बाबू

 गांधी जी ने कहा, "चूंकि मौलाना आजाद के मना करने के बाद पट्टाभि सीतारमैय्या मेरे कहने पर उम्मीदवार थे. इसलिए यह उनकी नहीं मेरी हार है. यह मेरी नीतियों-कार्यक्रमों की हार है. डेलीगेट्स ने उन नीतियों-सिद्धान्तों को नकार दिया है, जिन पर मैं चला हूं."
 सुभाष चंद्र बोस ने विनम्रता के साथ इसे गांधी की निजी हार मानने से असहमति व्यक्त की. "डेलीगेट्स को उनके (गांधी के) पक्ष या विपक्ष में वोट डालने को नहीं कहा गया था." गांधी की आहत भावनाओं को शांत करने के लिए उन्होंने कहा, "मेरे लिए यह त्रासद होगा कि मैं अन्य लोगों का विश्वास अर्जित कर लूं, लेकिन  देश के महानतम व्यक्ति का विश्वास प्राप्त करने में विफल रहूं."
शिष्टाचार और शालीनता के संवादों के बीच अविश्वास की खाई का बड़ा विस्तार किसी पुल की संभावना नकार रहा था. गांधी ने कहा, "बोस अध्यक्ष हैं. वह अपनी वर्किंग कमेटी गठित करें और कांग्रेस को चलाएं. आखिर सुभाष बाबू हमारे देश के शत्रु नहीं हैं. उन्होंने इसके लिए कष्ट उठाये हैं. वह बहुत प्रगतिशील हैं और उनकी नीतियां-कार्यक्रम बहुत प्रभावशाली हैं. अल्पमत केवल उनकी सफलता की कामना कर सकता है."
कांग्रेस में अध्यक्ष पद का यह ऐतिहासिक चुनाव था. आजादी की लड़ाई के बीच हुए इसके विवाद की चर्चा आज तक होती है. 1938 में हरीपुरा अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे. 1939 में सुभाष बाबू ने दूसरी बार अध्यक्ष पद पर दावा पेश किया. उस समय तक जवाहर लाल नेहरू के अपवाद को छोड़कर किसी अध्यक्ष को लगातार दूसरा कार्यकाल नहीं मिला था. तब तक हमेशा निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए. नेहरू को भी दूसरा अवसर 1937 में प्रांतीय असेम्बली के चुनाव की व्यस्तता के चलते मिला था. गांधी जी ने सरदार पटेल के जरिये सुभाष बाबू के भाई शरत चंद्र बोस को तार भिजवाया. उनसे आग्रह किया कि वह सुभाष बाबू को चुनाव न लड़ने के लिए राजी करें. गांधी जी ने कहा, "उनका पुनर्निर्वाचन उन प्रवृत्तियों को तीव्रता प्रदान करेगा, जो देश के लिए हानिकर होंगी." सुभाष बाबू अडिग रहे. 21 जनवरी, 1939 को उन्होंने अध्यक्ष पद की दावेदारी पेश करते हुए कहा, "विनम्रता का झूठा दिखावा छोड़ा जाए, क्योंकि इसमें निजी जैसा कुछ नहीं है. उम्मीदवारों के बीच निश्चित कार्यक्रमों और समस्याओं को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाना चाहिए. साम्राज्यवाद विरोधी तीव्र होते संघर्ष से उपजी समस्याओं के नजरिये से वह नए विचारों, विचारधारा और कार्यक्रमों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यदि वह चुनाव से हटेंगे तो उन्हें महसूस होगा कि वह जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे हैं."
वर्किंग कमेटी के गांधी जी समर्थक सदस्यों बल्लभ भाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, जयराम दास दौलत राम, जेवी कृपलानी, जमना लाल बजाज, शंकर राव देव और भूला भाई देसाई ने 24 जनवरी को पलटवार करते हए कहा, "अध्यक्ष पद के चुनाव से विचारधारा, नीतियों, कार्यक्रमों का कोई सम्बन्ध नहीं है. नीतियां-कार्यक्रम अध्यक्ष नहीं तय करता. उसके लिए कांग्रेस की विभिन्न समितियां और वर्किंग कमेटी है. अध्यक्ष की स्थिति केवल उस सांविधानिक मुखिया की है, जो देश की एकता-दृढ़ता का प्रतीक और प्रतिनिधित्व करता है." सुभाष बाबू ने वर्किंग कमेटी के सदस्यों की हैसियत से इन सदस्यों के दो उम्मीदवारों के चुनाव के बीच संगठित हस्तक्षेप को अनुचित बताया. अध्यक्ष को सिर्फ सांविधानिक मुखिया मानने से इनकार किया. उसे प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति की भांति बताया, जो कि अपना कैबिनेट गठित करता है.
गांधी जी ने पहले जवाहर लाल नेहरू से अध्यक्ष बनने का आग्रह किया था. उनके इनकार के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद से अनुरोध किया गया. उन्होंने स्वास्थ्य कारणों के आधार पर मजबूरी जाहिर की. अगली पसन्द पट्टाभि सीतारमैय्या थे. आंध्रप्रदेश से आने वाले सीतारमैय्या को गांधी जी का आशीर्वाद प्राप्त था. 29 जनवरी, 1939 को हुए इस चुनाव में सुभाष बाबू को 1580 और पट्टाभि सीतारमैय्या को 1377 वोट मिले. कांग्रेस और देश में हलचल मच गई.  गांधी जी 1934 से कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य नहीं थे. पर उनकी पार्टी में हैसियत निर्विवाद थी. वहां वह सर्वशक्तिमान थे. हर कदम, हर निर्णय, उनकी सोच-छाप और सहमति लिए हुए होता था. बोस की जीत उनके आभामंडल के लिए चुनौती थी. तय था कि यह लड़ाई थमेगी नहीं.
20-21 फरवरी, 1939 को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक वर्धा में हुई. स्वास्थ्य कारणों से सुभाष बाबू इसमें नहीं पहुंच पाए. उन्होंने पटेल से वार्षिक अधिवेशन तक बैठक टालने को कहा. गांधी जी से अपनी इच्छानुसार वर्किंग कमेटी गठित करने का भी अनुरोध किया. यद्यपि गांधी जी ने इसे स्वीकार नहीं किया. दूसरी ओर पटेल, नेहरू समेत 13 सदस्यों ने सुभाष बाबू पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए वर्किंग कमेटी से इस्तीफा दे दिया. आरोप लगाया कि अपनी अनुपस्थिति में वह कांग्रेस के सामान्य कार्य को संचालित नहीं होने दे रहे.  गांधी समर्थकों को हीन बुद्धि का कहने के लिए उनसे माफी की भी मांग की गई.
8 से 12 मार्च, 1939 तक त्रिपुरी (जबलपुर) में पांच दिन के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी शामिल नहीं हुए. पर गैरमौजूदगी में भी उनकी मौजूदगी अधिवेशन पर हावी थी. इन दिनों को गांधी जी ने राजकोट के लिए चुना. वहां स्थानीय समस्याओं को लेकर वह अनशन पर बैठ गए. त्रिपुरी अधिवेशन के समानांतर प्रेस का पूरा ध्यान राजकोट में उनकी मौजूदगी पर था. अधिवेशन में उनकी भागीदारी चुनावी कटुता को दूर करने में सहायक हो सकती थी. वह दूर रहे. समर्थकों ने अगले चरण की जीत से चुनावी पराजय का हिसाब चुकता किया.
पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने एआईसीसी के 160 सदस्यों की ओर से सब्जेक्ट कमेटी में गांधी जी के नेतृत्व में पूरे भरोसे का प्रस्ताव रखा. ये प्रस्ताव था, "कांग्रेस पिछले बीस वर्षों से गांधी जी के मार्ग दर्शन में चलने वाली नीतियों-कार्यक्रमों में पूरा विश्वास व्यक्त करती है. निश्चित राय की है कि बिना रुकावट के इन्ही नीतियों के तहत भविष्य में भी कार्यक्रम संचालित होने चाहिए. पिछले वर्ष काम करने वाली वर्किंग कमेटी के काम में भी भरोसा व्यक्त करती है. उसके किसी भी सदस्य की निष्ठा पर उठाये गए सवाल पर दुख व्यक्त करती है. आगामी वर्ष में संभावित जटिल स्थिति के मद्देनजर इस तथ्य को स्वीकार करती है कि महात्मा गांधी अकेले व्यक्ति हैं, जो कांग्रेस और देश का नेतृत्व करके विजय दिला सकते हैं. इसके लिए जरूरी है कि कांग्रेस के कार्यपालक प्राधिकारी को उनका पूर्ण विश्वास प्राप्त हो. अतएव अध्यक्ष जी से अनुरोध है कि आगामी वर्ष के लिए गांधी जी की इच्छाओं के अनुरूप वर्किंग कमेटी गठित करें." 10 मार्च को सब्जेक्ट कमेटी ने 135 के मुकाबले 218 वोटों से इस प्रस्ताव को पारित कर दिया. समाजवादी जिन्होंने अध्यक्ष के चुनाव में सुभाष बाबू का साथ दिया था, इस मतदान में गांधी समर्थकों के साथ थे. 12 मार्च को खुले अधिवेशन में हाथ उठाकर बड़े बहुमत से इस प्रस्ताव को स्वीकृति प्राप्त हुई. सुभाष बाबू ने प्रस्ताव को तकनीकी आधारों पर रोकने की कोशिश नहीं की. हालांकि यह पार्टी संविधान के अनुच्छेद 15 के विपरीत था, क्योंकि इसने अध्यक्ष के वर्किंग कमेटी नामित करने के अधिकार को छीन लिया था. गांधी जी वहां नहीं थे. वह पार्टी के सदस्य भी नहीं थे. पर प्रस्ताव ने उन्हें चुने अध्यक्ष के ऊपर स्थापित कर दिया.
कांग्रेस के अध्यक्ष पद का यह चुनाव कड़वाहट-दूरियों का संदेश भी दे गया. चुनाव को उत्तर के वर्चस्व के खिलाफ़ पूर्व के संघर्ष से जोड़ा गया. भौगोलिक दृष्टि से गुजरात भले उत्तर में न हो लेकिन उसकी अगुवाई (गांधी-पटेल) के हाथों में होने के कारण भी विरोध था. हालांकि सुभाष बाबू ने व्यक्तिगत तौर पर चुनाव के अखिल भारतीय स्वरूप पर ही जोर दिया. सुभाष समर्थकों ने गांधी समर्थकों को दक्षिण पंथी बताते हुए अंग्रेजों के प्रति समझौतावादी रवैया अपनाने का आरोप लगाया. बीमारी के कारण सुभाष बाबू त्रिपुरी अधिवेशन में स्ट्रेचर पर पहुंचे. तीखी आवाज गूंजी, "बगल में प्याज तो नही दबाएं हैं?" सरदार पटेल ने सुभाष बोस के नेतृत्व को अक्षम बताया. राजाजी ने गांधी जी के मुकाबले उनकी तुलना छेद वाली नाव से की. आचार्य कृपलानी ने अपनी आत्मकथा, 'माई लाइफ' में लिखा," सुभाष बोस के बंगाली समर्थकों ने राजेन्द्र प्रसाद के कपड़े फाड़ दिए. खुद मुझे मेरी बंगाली पत्नी सुचेता ने बचाया." रवीन्द्र नाथ टैगोर ने गांधी जी से दख़ल का अनुरोध किया. सुभाष चंद्र बोस को स्वतंत्रता पूर्वक अध्यक्ष के तौर पर काम करने देने के लिए कहा. टैगोर ने अपने पूर्व सचिव अमिय चक्रवर्ती को लिखा, "जिस पवित्र मंच से आजादी के मंत्र गूंजने चाहिए वहां फासिस्ट दांत उभर आए हैं."
निर्वाचित अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस शक्ति विहीन हो चुके थे. पंडित नेहरू ने उनसे वर्किंग कमेटी के सदस्यों के बारे में अपनी टिप्पणी वापस लेने को कहा. वह झुकने को तैयार नहीं थे. नेहरू ने उनसे कार्यकाल पूरा करने को कहा. वह इसकी निरर्थकता समझ रहे थे. उन्होंने इस्तीफा देना बेहतर समझा. मई 1939 में उन्होंने कांग्रेस के अधीन फारवर्ड ब्लाक का गठन किया. उसके अखिल भारतीय कार्यक्रम की घोषणा की. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 9 जुलाई, 1939 ने एक प्रस्ताव के जरिये अगले तीन वर्षों के लिए उन्हें पार्टी के किसी पद के अयोग्य करार दिया.  छह महीने से कम वक्त में बहुत कुछ बदल चुका था. सुभाष चंद्र बोस की मंजिल वही थी. रास्ता बदल चुका था.
 गांधी जी से सुभाष बाबू की दूरियों की वजह क्या थी? क्या ये टकराव सिर्फ नीतियों-कार्यक्रमों और शैली का था? शायद ही इससे इनकार किया जा सके. पर शायद सिर्फ़ इतना काफी नहीं होगा. दो दिग्गजों के व्यक्तित्व का भी यह टकराव था. अपरोक्ष ही सही. अहम भी टकरा रहे थे. बेशक सुभाष बाबू गांधी जी का बहुत आदर करते थे. आजादी के आंदोलन में उनकी अगुवाई भी सहज स्वीकार्य थी. लेकिन वह पटेल, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद आदि की तरह गांधी जी के अनन्य भक्त और अनुयायी नहीं थे. उनके लिए गांधी जी की इच्छा आखिरी और शिरोधार्य नहीं थी. वह प्रतिद्वंदी नहीं थे. पर उन्होंने असहमति और सवाल के अपने अधिकार संजो रखे थे. उसके इस्तेमाल में वह चूके नहीं और नतीजा सामने था.
कांग्रेस से सुभाष बाबू के अलगाव के बाद दोनों ने निजी स्तर पर रिश्तों की मर्यादा को बनाये रखा. अगस्त 1939 में सुभाष बाबू को पटना में काले झंडे दिखाए जाने का गांधी जी ने विरोध किया. 1940 में कांग्रेस की योजनाओं से अलग रहकर काम करते सुभाष बाबू  गिरफ्तार हो गए. कांग्रेस और गांधी जी से सवाल हुआ कि बचाव में क्यों आगे नहीं आये? 9 जुलाई, 1940 को सेवाग्राम में गांधी जी ने कहा, "सुभाष बाबू जैसे महान व्यक्ति की गिरफ्तारी मामूली बात नहीं है. लेकिन सुभाष बाबू ने अपनी लड़ाई की योजना बहुत समझ-बूझ और हिम्मत से बनाई है. वह मानते हैं कि उनका तरीका सबसे अच्छा है. उन्होंने मुझसे बड़ी आत्मीयता से कहा कि जो कुछ कार्य समिति नहीं कर पायी, उसे कर दिखाएंगे. वह विलम्ब से ऊब चुके हैं. मैंने उनसे कहा कि आपकी योजना के फलस्वरुप मेरे जीवनकाल में स्वराज मिल गया तो बधाई का पहला तार मेरी ओर से आपको मिलेगा." 17 अगस्त, 1941 को जब सुभाष बाबू कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित आवास से बिन बताये गायब हुए तो उनके भाई शरत चन्द्र बोस को गांधी जी ने तार भेजकर पूछा, "सुभाष के बारे में खबर चौंकाने वाली है. कृपया सच्चाई तार से सूचित करें. चिंतित हूं."
1943 में गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर पर बैंकाक रेडियो से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का संदेश प्रसारित हुआ, "मन की शून्यता के क्षणों में महात्मा गांधी का उदय हुआ. वह अपने साथ लाये असहयोग का, सत्याग्रह का एक अभिनव-अनोखा तरीका. ऐसा लगा कि विधाता ने ही उन्हें स्वतंत्रता का मार्ग दिखाने के लिए भेजा है. स्वतः ही सारा देश उनके साथ हो गया." ये नेताजी थे जिन्होंने 6 जुलाई, 1944 को सिंगापुर रेडियो से अपने प्रसारण में प्रथम बार गांधी जी को राष्ट्रपिता संबोधित किया और कहा, "भारत की आजादी की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है. आजाद हिन्द फौज हिंदुस्तान की धरती पर लड़ रही है. सारी दिक्कतों के बावजूद आगे बढ़ रही है. ये हथियारबंद संघर्ष तब तक चलेगा, जब तक ब्रिटिश को देश से उखाड़ नहीं देंगे. दिल्ली के वायसराय हाउस पर तिरंगा फहरेगा." पल भर की खामोशी बाद उनका अगला वाक्य मन की अतल गहराइयों से निकला. दिलों में उतरा और इतिहास में दर्ज हो गया, "राष्ट्रपिता, हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में हम आपका आशीर्वाद मांगते हैं." गांधी जी ने नेताजी की विमान दुर्घटना की मृत्यु की खबर पर कहा, "उन जैसा दूसरा देशभक्त नहीं. वह देशभक्तों के राजकुमार थे." 24 फरवरी, 1946 को हरिजन में लिखा, "आजाद हिंद फौज का जादू हम पर छा गया है. नेताजी का नाम सारे देश में गूंज रहा है. वे अनन्य देश भक्त हैं. (वर्तमान काल का प्रयोग जानबूझकर कर रहा हूं). उनकी बहादुरी उनके सारे कामों में चमक रही है. उनका उद्देश्य महान था. पर वह असफल रहे. असफल कौन नहीं रहा? हमारा काम तो यह देखना कि हमारा उद्देश्य महान और सही हो. सफलता हर किसी की किस्मत में लिखी नहीं होती."
उनके रास्ते अलग हो गए थे. मंजिल एक थी. उसे हासिल करने की निष्ठा पर सवाल नहीं था. वैचारिक मतभेद थे. लेकिन परस्पर सम्मान-आत्मीयता शेष थी. यही उन्हें जोड़ती रही. दूर से भी पास करती रही.

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Subhash Chandra Bose              
रास्ता बदला, मंजिल वही                  
मंजिल वही थी. रास्ता बदल गया. पड़ाव भी. सुभाष चंद्र बोस अब और इंतजार को तैयार नही थे. अंग्रेज दूसरे विश्वयुद्ध में फंसे थे. उन पर निर्णायक प्रहार का उन्हें यह माकूल समय लगा. 20 जुलाई, 1921 को वह पहली बार गांधी जी से मिले थे. असहयोग आंदोलन के एक सामान्य सत्याग्रही से शुरू उनका सफ़र कांग्रेस के सर्वोच्च अध्यक्ष पद तक पहुंचा. 1939 में दूसरी बार वह कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए . इस बार गांधी जी की इच्छा के विरुद्ध. 29 अप्रैल 1939 को इस्तीफा देना पड़ा. 9 जुलाई, 1939 को वह कांग्रेस से मुक्त हो गए. फारवर्ड ब्लॉक का गठन किया. एक बड़ा जनांदोलन खड़ा करने के लिए देश भर में घूमे. नतीजे बहुत उत्साहजनक नहीं थे. वापस बंगाल पहुंच सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया. 3 जुलाई, 1940 को अंग्रेजों ने भारत रक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया. उनकी भूख हड़ताल ने दिसम्बर 1940 में रिहाई मुमकिन की. लेकिन घर की निगरानी जारी रही. 16/17 जनवरी, 1941 की रात एल्गिन रोड स्थित कलकत्ता निवास से वह चुपके से निकले. आगे  फ्रंटियर मेल पर पेशावर के सफ़र में थे. बदले वेश में. पठान  मोहम्मद जियाउद्दीन के बदले नाम से. पेशावर से काबुल और फिर आगे का मुश्किल सफ़र. 
सुभाष बाबू जर्मनी के नस्लवाद के विरोधी थे. उसकी एकाधिकार कोशिशों के भी खिलाफ़. पर उन्हें लगता था कि महायुद्ध में जर्मनी जीत सकता है. धुरी शक्तियों की सहायता से वह भारत की स्वतंत्रता की संभावनाओं को टटोलने लगे. हिटलर-गोयबल्स से उनकी मुलाकात में कुछ हासिल नहीं हुआ. वहां उन्हें आजाद हिंद रेडियो शुरू करने की मंजूरी मिली. दस्ता गठित करने के लिए उत्तरी अफ्रीका में गिरफ्तार भारतीय युद्धबन्दी उन्हें सौंपे गए. स्तालिनग्राद में जर्मनों की हार के बाद वहां नाउम्मीदी और बढ़ गई. भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में धुरी शक्तियों की ओर से कोई घोषणा भी नहीं की गई.
तभी उम्मीद की किरण जापान की ओर से नजर आयी. 1940 तक जापान भारत की स्वतंत्रता में रुचि लेने लगा था. मेजर फुजीवारा ने दक्षिण पूर्व एशिया में आजादी के उत्सुक भारतीयों से संपर्क शुरू किया. प्रीतम सिंह की अगुवाई में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग सक्रिय थी. कैप्टन मोहन सिंह ने दिसम्बर 1941 में मलाया के जंगलों में जापानियों के समक्ष समर्पण किया था. उन्होंने जापानियों के सहयोग से युद्धबन्दी भारतीयों की सेना गठित करने की हामी भरी. जून 1942 में इंडियन इंडिपेंडेंट लीग की कमान जापान में रह रहे क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने संभाली. सितम्बर 1942 तक कैप्टन मोहन सिंह की अगुवाई में आजाद हिंद फ़ौज का गठन पूर्ण हो गया. दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने वाली लीग का इस फ़ौज पर नियंत्रण था.  प्रधानमंत्री तोजो ने जापानी संसद में भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में घोषणा की. लेकिन जापानी आजाद हिंद फ़ौज को सहयोगी सेना की जगह अधीन मानते थे. उसे किसी प्रकार की निर्णय स्वतंत्रता भी नहीं थी. बराबरी और आजादी की कैप्टन मोहन सिंह की मांग से नाराज जापानियों ने उनसे कमान छीनी और जेल भेज दिया. क्रांतिकारी रास बिहारी बोस की बढ़ती उम्र उनकी हिम्मत-हौसलों पर भारी पड़ी. आजाद हिंद फ़ौज का पहला प्रयोग 1943 के प्रारम्भ तक विफल हो चुका था.
पर ये कैप्टन मोहन सिंह ही थे, जिन्होंने जापानियों को आजाद हिंद फ़ौज की अगुवाई के लिए सुभाष चंद्र बोस का नाम सुझाया था. जापान ने जर्मनी से सम्पर्क किया. पनडुब्बी से लम्बा कठिन सफ़र था. मई 1943 में वह दक्षिण पूर्व एशिया पहुंचे. जापान से सहायता और बराबरी का पुख़्ता यकीन हासिल किया और आजाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व संभाल लिया. 5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर टाउन हॉल की सभा में उन्होंने 'दिल्ली चलो' का उद्घोष किया. 21 अक्टूबर, 1943 को अस्थायी आजाद हिंद सरकार का गठन किया. जापान ने इस सरकार को फ़ौरन और बाद में जर्मनी, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, माँचुको और आयरलैंड ने भी मान्यता दी. आजाद हिंद फ़ौज में लगभग पैंतालीस हजार सैनिक थे. इनमें बड़ी संख्या वर्मा, मलाया के जंगलों में समर्पण करने वाले ब्रिटिश भारतीय सेना के युद्धबन्दियों की थी.
आजाद हिंद सरकार ने इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की. योजना जापानी सेना के सहयोग से वर्मा से गुजरते हुए इम्फाल और फिर असम पहुंचने की थी. वर्मा के मोर्चे पर अच्छी कामयाबी मिली. भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध गुस्सा तीव्र था. आकलन था कि इस सैन्य अभियान से उत्साहित भारतीय जनता गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए खुला विद्रोह करेगी. उन्होंने महात्मा गांधी से जीत के लिए आशीर्वाद मांगा. देशवासियों से कहा कि आज के दौर में आधुनिक सेना और युद्ध के बिना अहिंसक रास्ते से आजादी नहीं मिलेगी. "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का उनका नारा दूर-दूर तक गूंजा. इम्फाल अभियान आजाद हिंद फ़ौज की दो रेजिमेंट ने जापानी सेना के सहयोग से 8 मार्च, 1944 को शुरू किया. 22 जून, 1944 तक युद्ध जारी रहा. जापान और आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा. सुभाष चंद्र बोस ने हिम्मत नहीं हारी. फिर पीछे कतारबन्दी की कोशिश की. आजाद हिंद फौज से अंग्रेज सेना का आखिरी टकराव वर्मा की पोपा पहाड़ियों में हुआ. अंग्रेजी सेनाएं भारी पड़ीं. वायु सेना का अभाव, कमान की श्रंखला टूटना,आपूर्ति में रुकावट, जापानी सेना का पूर्ण सहयोग न मिलना और मित्र राष्ट्रों की साझा भारी ताकत ने सुभाष चंद्र बोस के अद्भुत साहसिक अभियान को विफ़ल कर दिया. जापानियों के समर्पण के बाद उन्होंने रुस से मदद लेने को सोची. जापानियों ने उन्हें मंचूरिया तक ले जाने की हामी भरी. 18 अगस्त, 1945 को ताइवान के ताइहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की ख़बर फैली. लेकिन कथित दुर्घटना और उसमें उनकी मृत्यु की गुत्थी हमेशा अनसुलझी रही. 
बेशक युद्ध के मोर्चे पर आजाद हिंद फ़ौज अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी. पर ये सिर्फ़ एक रोमांचकारी असफल कोशिश नहीं थी. आजादी की लड़ाई के इतिहास के हाशिये के किसी कोने पर उसे डालना सच को बेदखल करना होगा. जाहिर तौर पर युद्ध मोर्चे पर असफ़लता मिली. लेकिन उसने जनमोर्चे की धार तेज की. निर्णायक संघर्ष के नए कपाट खोले. भारत की ब्रिटिश सत्ता के ताबूत में आखिरी कील ठोंकी. आने वाले दिन इसके गवाह बने. आजाद हिन्द फ़ौज के समर्पण करने वाले बीस हजार सैनिकों को अंग्रेजों ने सफेद, भूरे और काले की श्रेणियों में बांटा. जापानियों और आजाद हिंद सेना के प्रचार में भटकाव   मानकर सफेद और भूरे श्रेणी के सैनिकों को रिहा कर दिया गया. लेकिन 'काले 'श्रेणी में रखे सैन्य बंदियों को समर्पित माना गया. उन्हें किसी प्रकार की रियायत देने को अंग्रेज तैयार नहीं थे. ऐसे दस मुकदमे चलाये गए. उनमें सबसे पहला और मशहूर मुकदमा आजाद हिंद फ़ौज के तीन अफसरों प्रेम कुमार सहगल, शाहनवाज खान और गुरुदयाल सिंह ढिल्लो पर चलाया गया. फौजी अदालत में चला ये खुला मुकदमा था. स्थान था लाल किला. ब्रिटिश सत्ता के प्रभुत्व का प्रतीक. 5 नवम्बर, 1945 को यह मुकदमा शुरू हुआ. 87 साल पहले इसी लाल किले में 1857 की क्रांति की अगुवाई के आरोप में मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफ़र के खिलाफ 1858 में अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया था. तब जफ़र को सजा देकर रंगून के लिए देश निकाला किया था. इस बार जिन सपूतों पर मुकदमा चलाया जा रहा था, रंगून उनकी लड़ाई का महत्त्वपूर्ण केंद्र था. 1858 के मुकदमे के समय क्रांति की ज्वाला ठंडी थी. 1945 में इसकी लपटें अंग्रेजों को झुलसा रही थीं. तब आजादी सपना थी. अब सपना सच होने के नजदीक था.
महायुद्ध के बाद सेंसरशिप हटाई जा चुकी थी. हर खबर लोगों तक और उनकी जुबान पर थी. आजाद हिंद फ़ौज, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके सेनानियों की अटूट देशभक्ति और बलिदान के प्रति आदर-सम्मान और अपनत्व का अद्भुत जनज्वार था. कोई अछूता नहीं था. वह कांग्रेस भी नहीं, जो नेताजी और उनके साथियों को 'गुमराह देशभक्त' मानती थी. वह गांधी जी भी जो उनकी देशभक्ति के प्रशंसक थे, पर उनके रास्ते को गलत मानते थे. वे साम्यवादी भी जो नेताजी पर फासिस्ट ताकतों के हाथों की कठपुतली होने के आरोप लगाते थे. सितंबर 1945 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने इन गुमराह देशभक्तों की पैरवी का फैसला किया. बचाव कमेटी गठित की. दिग्गज वकील तेज बहादुर सप्रू , भूला भाई देसाई , आसफ़ अली के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू इसमें शामिल थे. 25 वर्षों के अंतराल पर पंडित नेहरू ने हैंगर पर टंगे अपने काले कोट और गाउन को इस मुकदमे की पैरवी के लिए फिर से धारण किया. बचाव पक्ष की दलील थी कि देश की आजादी के लिए लड़ने वालों पर गद्दारी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
अदालत से अलग एक और लड़ाई चल रही थी. सड़कों-गलियों-चौराहों-दफ्तरों-बैंकों और यहां तक कि सेना के बीच भी. मुकदमे के तीन आरोपियों में हिन्दू, मुसलमान और सिख शामिल थे. कुछ वक्त के लिए ही सही. साम्प्रदायिकता की भट्टी की आंच ठंडी हो गई. सद्भाव-एका के तराने फूट पड़े. 5 से 11 नवम्बर तक सारे देश में आजाद हिंद फौज सप्ताह मनाया गया. 12 नवम्बर को आजाद हिंद फ़ौज दिवस. सभी वर्गों के लोग शामिल हुए. बाजार दुकानें बंद. जनजीवन ठप. विरोध प्रदर्शनों-सभाओं का सिलसिला. बहुत से स्थानों पर दीवाली नहीं मनाई गई. आजाद हिंद राहत कोष में मदद करने वाले उमड़ पड़े. आंदोलन कुर्ग, बलूचिस्तान और असम तक फैला. 7 नवम्बर को मदुरै में पुलिस ने गोली चलाई. 21 से 24 नवम्बर के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में जबरदस्त अशांति रही. सुभाष चंद्र बोस के अपने नगर कलकत्ता में लोगों का क्रोध चरम पर था. तीन दिन लगे वहां के हालात काबू आने में. 33 की जान गई. 200 घायल हुए. बम्बई, कराची, रावलपिंडी, पटना, इलाहाबाद, बनारस सहित लगभग समूचे देश में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए.
मुकदमे में बचाव पक्ष की तमाम कानूनी दलीलें बेअसर रहीं. अदालत ने तीनों फौजी अफसरों को दोषी करार दिया. लेकिन सड़कों पर जनता के गुस्से की दलीलों में बहुत दम था. उसने अंग्रेजों को भीतर तक हिला दिया. 3 जनवरी, 1946 को कमांडर इन चीफ औचिनलेक के आदेश से सहगल, खान और ढिल्लो रिहा कर दिए गए. उनका स्वागत बेमिसाल था. उनकी रिहाई का जश्न चल ही रहा था कि एक दूसरे फैसले ने लोगों का गुस्सा भड़का दिया. कैप्टन अब्दुर्रशीद की पैरवी मुस्लिम लीग की एक बचाव कमेटी कर रही थी. 4 फरवरी को उनके मुकदमे के फैसले में सात साल बामशक्कत कैद की सजा सुनाई गई. 11 से 13 फरवरी तक कलकत्ता फिर अशांति का केंद्र था. 84 जानें गईं. 300 घायल हुए. हिंसा की आग पूर्वी बंगाल तक फैली. देश के तमाम शहरों में फिर से प्रदर्शन शुरू हुए. अंग्रेजों की रक्षा कवच भरोसेमंद सेना थी. आजाद हिंद फौज के गिरफ़्तार अधिकारियों- सैनिकों के प्रति भारतीय सेना के अधिकारियों- सैनिकों की सहानुभूति ने अंग्रेजों को विचलित कर दिया. ख़ुफ़िया रिपोर्टें बता रही थीं कि सेना में आजाद हिंद फौज ने राजनीतिक चेतना बढ़ाई है. सेना के लोगों ने केवल आर्थिक मदद नहीं दी . तमाम सैन्यकर्मी पूरी वर्दी में विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल हुए.
जनवरी 1946 में  वायुसेना के लोग अपनी विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल पर उतरे. उधर शाही नौसेना के खुले विरोध ने अंग्रेजों को और चिंतित कर दिया. 18 फरवरी, 1946 को एच.एम.आई.एस. तलवार के नौसैनिकों ने खराब भोजन और नस्ली भेदभाव के विरुद्ध हड़ताल शुरू की. फिर यह विद्रोह दूर तक फैला, जिसमें 78 जहाज, 20 तटीय प्रतिष्ठान और  बीस हजार नौसैनिक शामिल थे. जनता में उनके प्रति असीम सहानुभूति थी. 22 फरवरी को बम्बई में उनके समर्थन में बंद रहा. यातायात ठप. रेलगाड़ियां जलाई गईं. बैंकों में ताला. कारखाने ठप. तीन दिन बाद वहां शांति बहाल हुई. 228 मौतें हुईं. 1046 घायल हुए. 23 फरवरी को कराची और 25 फरवरी को मद्रास में हिंसक प्रदर्शन और मौतें हुईं. तिरुचिरापल्ली और मदुरै में भी हिंसा हुई. विभिन्न स्थानों पर शाही भारतीय वायु सेना और थल सेना के भी कुछ लोग हड़ताल में शामिल हुए. 
नौसैनिकों का विद्रोह अल्पकालिक था. पर अंग्रेजों के लिए संदेश गहरे थे. उसके जांच आयोग ने "अधिकांश नौसैनिकों को राजनीतिक चेतना से सम्पन्न और आजाद हिंद फ़ौज के आदर्शों से गहराई से प्रभावित पाया." वायुसेना और थलसेना की सहानुभूति ने भी बता दिया कि स्वतंत्रता के लिए जूझ रहे भारतीयों के दमन के लिए ये सेना भरोसेमंद नहीं रही. कांग्रेस जिसने आजाद हिंद फौज के अफसरों के बचाव में सक्रिय भूमिका निभाई थी, सेना में किसी प्रकार के विद्रोह के खिलाफ़ थी. सरदार पटेल ने विद्रोही नौसैनिकों को समर्पण के लिए राजी किया. पटेल की प्राथमिकताएं स्पष्ट थीं, "सेना के अनुशासन से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती... हमें स्वतंत्र भारत मे सेना की आवश्यकता होगी." अहिंसा की अपनी नीति के तहत कांग्रेस नेतृत्व हिंसक आंदोलनों को लगातार गलत ठहराता रहा. आजाद हिंद फौज के अफसरों की वापसी के सवाल पर कलकत्ता की जनसभा में पटेल ने 'गुमराह देशभक्तों' के लिए कहा, "पहले उन्हें अपनी तलवारें म्यान में वापस करनी होंगी." आजाद हिंद फौज से जुड़े लोगों को अंग्रेजों के समय या फिर बाद में भी भारतीय सेना में जगह नहीं मिली.
तीसरे दशक के अंतिम दौर में सुभाष चंद्र बोस ने अपने बागी तेवरों से कांग्रेस को झकझोरा था. चौथे दशक के मध्य में उनका सैन्य अभियान व्यापक जनचेतना का कारण बना. इससे कोई वर्ग नहीं बचा. अंग्रेजी हुकूमत को मजबूती देने वाला सरकारी तंत्र रहा हो या फिर सेना. सबने अंग्रेजी राज के सूरज डूबने के संदेश दिए. 

# राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' के अंश. प्रतीक बुक्स से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 500 रुपए है.

 

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