scorecardresearch
 

आईपीएल ने पैदा की शहर और गांव के बीच खाई: रामचंद्र गुहा

आप कितने दलित क्रिकेटरों को जानते हैं? क्रिकेट भद्रजनों का खेल तो है ही, पर क्या सवर्णों का खेल भी है? इसकी विस्तृत पड़ताल करती है इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा की नई किताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर'.

Ramchandra Guha Ramchandra Guha

आप कितने दलित क्रिकेटरों को जानते हैं? क्रिकेट भद्रजनों का खेल तो है ही, पर क्या सवर्णों का खेल भी है? इसकी विस्तृत पड़ताल करती है इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा की नई किताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर'.

दिग्गज लेखक ने इस किताब में क्रिकेट का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने की कोशिश की है. 'पेंगुइन' से प्रकाशित इस किताब में उन्होंने भारतीय क्रिकेट में नस्ल, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के असर को आंकने की कोशिश की है. साथ ही भारतीय क्रिकेट इतिहास के गुमनाम क्रिकेटरों के बारे में विस्तार से बात की है. इसी किताब के सिलसिले में उनका यह इंटरव्यू पेश-ए-नजर है.

सवाल: पेंगुइन हिंदी से प्रकाशित अपनी किताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर' में आपने इस पर बात की है कैसे विभाजन के दौर में क्रिकेट का खेल इससे प्रभावित हुआ था. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे का उपमहाद्वीप के क्रिकेट पर क्या मुख्य असर रहे? एक एकीकृत क्रिकेट टीम का विश्व क्रिकेट में क्या स्थान रहा होता? क्या भविष्य में देशों के अलग-अलग अस्तित्व के साथ, किसी एकीकृत टीम की आप कोई संभावना देखते हैं?

जवाब: अगर भारत का विभाजन नहीं होता तो शायद हम दुनिया की सबसे शक्तिशाली क्रिकेट टीम बन जाते. आप सत्तर के दशक को लीजिए. भारत के बैटिंग लाइन-अप में गावस्कर और मियांदाद, विश्वनाथ और ज़हीर होते. इमरान खान और सरफराज़ नवाज़ ओपनर होते और गेंदबाज़ी बेदी से शुरु होती फिर चंद्रशेखर आते. दुख की बात है कि ये कल्पना थी और कल्पना रहेगी. भारत-पाकिस्तान की कभी भी एकीकृत टीम बनने की कोई सम्भावना नहीं है. बस आप आशा और कामना कर सकते हैं कि दोनों देशों के बीच खेले जाने वाले क्रिकेट मैच अत्यधिक कटुता की भावना से न खेले जाएं.

सवाल: आप आईपीएल के आलोचक रहे हैं. यह खेल को किस तरह नुकसान पहुंचा रहा है? यह इतना महत्वपूर्ण खेल कैसे बन गया और क्या आपको लगता है कि इसने पुरानी शैली के टेस्ट मैचों को भारी नुकसान पहुंचाया है? आईपीएल कैसे इतनी बड़ी परिघटना बन गया?

जवाब: आईपीएल के बारे में मेरा विरोध क्रिकेट, सामाजिक और नैतिक है. 20- 20 मैच असल क्रिकेट नहीं है. बाउंड्री हास्यास्पद रुप से छोटी है (ताकि छक्के आसानी से जड़े जा सकें). बल्लेबाज अपने सारे स्ट्रोक नहीं खेल पाते और केवल आड़े बल्ले वाले और गेंद हवा में उछालने वाले शॉट्स खेलते हैं. और हां, गेंदबाज़ों को अपने विकेट चटकाने के हुनर को दिखाने का मौका बहुत कम मिलता है.

सामाजिक स्तर पर आईपीएल ने शहर और गांव के बीच गहरी खाई पैदा की है, आर्थिक रूप से ज़्यादा और कम विकसित क्षेत्रों के बीच की दूरी बढ़ाई है और साथ ही पेशेवर और मज़दूर वर्ग के बीच दूरी बढ़ाई है. ऐसा क्यों है कि महाराष्ट्र की दो आईपीएल टीमें हैं और उत्तर प्रदेश की एक भी नहीं. जब भारत, भारत बनकर खेलता है तो सभी नागरिक इसका आनंद ले पाते हैं और इस खेल की उत्तेजना को महसूस कर सकते हैं. पर आईपीएल के मैच देखने वाले ज्यादातर उच्च वर्ग के होते हैं. आखिर में, यह बात हैरान करने वाली है कि ज्यादातर प्रगतिशील और नई सोच रखने वाली भारतीय कंपनियों ने कोई आईपीएल टीम नहीं रखी है. टाटा, महिंद्रा और ऐसी दूसरी कंपनियां इससे दूर रही हैं. दूसरी तरफ, राजनेताओं से करीबी रिश्तों से फायदा उठाने वाले बदनाम उद्योगपतियों तथा अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं देने वाले उद्योगपतियों ने आईपीएल टीमों को बढ़ावा दिया है. मेरे विचार में आईपीएल क्रिकेट के और साथ ही साथ भारतीय समाज के बदतरीन पहलू को उजागर करता है.

सवाल: जैसा कि आपकी किताब के जरिए जाना जा सकता है कि क्रिकेट ने तब चल रहे राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को अपनी तरह से मजबूती प्रदान की थी. क्रिकेट के बारे में क्या यही बात राष्ट्र के निर्माण के दौर के बारे में कही जा सकती है? और आज जब राष्ट्र एक नए दौर की तरफ तेजी से बढ़ रहा है, आप इसमें क्रिकेट की क्या भूमिका देखते हैं? क्या क्रिकेट से ऐसी कोई उम्मीद रखी भी जा सकती है?

जवाब: भारत जब एक उपनिवेश था, और इसकी आजादी के पहले कुछ दशकों में भी, क्रिकेट ने राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साधन के रूप में भूमिका निभाई थी. इसीलिए 1926-27 में एक एमसीसी टीम के खिलाफ सीके नायडू के शतक (जिसमें 11 छक्के शामिल थे) ने ऐसी व्यापक प्रशंसा को जन्म दिया था और 1971 में हमारी विजय के बाद प्रधानमंत्री क्रिकेटरों से मिली थीं. एक बार फिर, 1990 के दशक में, कारगिल युद्ध और कश्मीर में विद्रोह के दशक में, भारत और पाकिस्तान के बीच होनेवाले मैच राजनीतिक अर्थ लिए हुए होते थे. लेकिन अब इसे देखते हुए कि अब हम करीब सात दशक पुराने राष्ट्र हैं, हमें कम अंधराष्ट्रवादी होना चाहिए और इसे महज एक खेल के रूप में ही देखना चाहिए. अगर हम ऑस्ट्रेलिया से या फिर पाकिस्तान तक से एक मैच या सीरीज हारते हैं, तो इससे हमारा राष्ट्रीय मान जरा भी प्रभावित नहीं होना चाहिए.

सवाल: आप पर्यावरण और राजनीतिक इतिहास पर लिखते रहे हैं. भारत में क्रिकेट के इतिहास पर किताब लिखने का विचार कैसे आया?

जवाब: यह करीब-करीब एक संयोग था. मैंने बंबई पंचकोणीय प्रतियोगिता (जो पहले चतुष्कोणीयथी) पर एक किताब लिखने की योजना बनाई थी. यह 1912 से 1945 के बीच हमारी प्रमुख क्रिकेट प्रतियोगिता थी. तब यह रणजी ट्रॉफी से भी अधिक महत्वपूर्ण थी. पहले महान भारतीय टेस्ट क्रिकेटरों सीके. नायडू, विजय मर्चेंट, मुश्ताक अली, मुहम्मद निसार, अमर सिंह, विजय हजारे, वीनू मांकड़ ने इसमें अपनी निशानियां छोड़ी थीं. मेरी किताब का उद्देश्य एक क्रिकेटीय इतिहास होना था, जिसमें पारियों तथा हारे और जीते गए मैचों पर ध्यान केंद्रित करना था. लेकिन मैं जितना अधिक शोध करता गया, उतना ही मैंने देखा कि चतुष्कोणीय तथा पंचकोणीय राजनीति और समाज के साथ आपस में गुंथे हुए थे. इसलिए आखिर में मैंने एक ऐसी किताब लिखी, जिसमें नस्ल, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद खुद क्रिकेट जितने ही महत्वपूर्ण थे.

सवाल: दलित गेंदबाज पालवंकर बालू के बारे में पहली बार इतनी सामग्री उपलब्ध हुई है. बालू को किताब के केंद्र में रखने के पीछे क्या ख्याल था?

जवाब: यह शोध के दौरान, इसके भीतर से ही उभर कर आया. मुंबई में, मैं बालू के भतीजे से मिला, जिन्होंने अनमोल पारिवारिक दस्तावेज मुझे सौंपे (जिसमें मराठी में छपा एक संस्मरण भी शामिल था) और अपने चाचा तथा अपने पिता विट्ठल (बालू के छोटे भाई और एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज) की यादें मेरे साथ बांटीं. इसके बाद तब के एक अग्रणी राष्ट्रवादी अखबार बॉम्बे क्रॉनिकल की माइक्रो फिल्में देखते हुए मैंने दोनों भाइयों के निजी संघर्षों पर दिलचस्प सामग्री पाई. ये दोनों भाई अपने समय के बेहतरीन हिंदू क्रिकेटर थे, लेकिन दलित पृष्ठभूमि से होने के कारण उन्हें पर्याप्त स्वीकृति से वंचित रखा गया. खुद बॉम्बे क्रॉनिकल ने बालू और विट्ठल के सम्मान के आंदोलन का नेतृत्व किया. इसके बाद मैंने बीआर आंबेडकर के साथ बालू के करीबी और जटिल संबंध के बारे में नई और अब तक अनदेखी रिपोर्टें भी पाईं.

इस तरह आखिरकार बालू इस किताब के केंद्रीय विषय बन गए और मैं सोचता हूं कि वे पूरी तरह इसके लायक हैं. क्योंकि वे एक शानदार क्रिकेटर थे और साथ ही साथ एक उल्लेखनीय इंसान भी थे. तर्कसंगत रूप से वे प्रतीक बन जाने वाले भारत के पहले खिलाड़ी थे और इसी के साथ वे 1910 से 1930 के बीच पश्चिमी भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दलित हस्ती भी थे.

सवाल: आपकी किताब का बड़ा हिस्सा क्रिकेट में वंचित तबकों के संघर्ष को लेकर है. ऐसी पहली कोशिशों के करीब एक शताब्दी बाद, दलितों के मामले में भारतीय क्रिकेट आज कहां खड़ा है? यह कितना समावेशी हुआ है?

जवाब: बालू और उनके भाइयों के बाद वंचित तबकों से कुछ बेहतरीन क्रिकेटर आए थे. 1947 के बाद शायद तीन या चार दलितों ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला, लेकिन कोई भी ख्याति नहीं हासिल कर सका. मुझे यकीन है कि अब तक कोई आदिवासी या उत्तर-पूर्व से कोई भारत के लिए नहीं खेला है. इसलिए, जबकि भारतीय टीम में खेल प्रशंसकों में से सभी वर्गों और धर्मों के लोग आते हैं, लेकिन शीर्ष स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ी व्यापक रूप से शहरों और ऊंची जातियों से आते हैं. भारतीय क्रिकेट टीम में राष्ट्र की सामाजिक और भौगोलिक विविधता का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं है.

सवाल: आपने एक खेल के इतिहास को राजनीतिक और सामाजिक इतिहास की संगति में पेश किया है. क्या कभी आपको लगा कि खेल का कोई इतिहास राजनीतिक और सामाजिक इतिहास के परे भीलिखा जा सकता है? अगर ऐसा एक इतिहास लिखा जाए तो वह कैसा होगा?

जवाब: मैंने जो लिखा है वह भारतीय क्रिकेट का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास है, जिसे नस्ल, जाति, धर्म और राष्ट्र की ‘प्रधान श्रेणियों’ के जरिए लिखा गया है. नए संस्करण के लिए मैंने क्रिकेट पर बाजार और कारोबार के असर पर (जैसा कि आईपीएल में दिखता है) एक पूरा नया अध्याय जोड़ा है. हालांकि ऐसा इतिहास लिखना संभव है जो सामाजिक आयामों को बीच में लाए बिना, खुद खेल पर अपना ध्यान केंद्रित करे. मुझे अच्छा लगेगा अगर कोई बालू और विट्ठल की अवधि के बीतने के बाद खेल पर राज करने वालीचौकड़ी की एक जीवनी लिखे: सीके नायडू, विजय मर्चेंट, विजय हजारे और वीनू मांकड़. ये सभी बेमिसाल क्रिकेटर थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत कम अवसर हासिल हुए. मेरे दिमाग में एक क्रिकेटीय अध्ययन है, जो तब खेल जैसा हुआ करता था, उसके संदर्भ में उनकी बल्लेबाजी और गेंदबाजी की शैली का विश्लेषण करे, जो मैदान पर उनकी मुख्य उपलब्धियों का विश्लेषण करे आदि.

नायडू, वीरेंदर सहवाग जैसी महारत से गेंदबाजों की धुलाई कर सकते थे. मर्चेंट और हजारे, राहुल द्रविड़ के सांचे के श्रेष्ठतम बल्लेबाज थे. और वीनू मांकड़ तर्कसंगत रूप से कपिल देव से भी महान हरफनमौला थे. ये प्रथम महान भारतीय क्रिकेटर थे और इस महानता का समुचित आकलन अभी बाकी है. उम्मीद करता हूं कि कोई युवा लेखक इस काम को अपने हाथ में लेगा.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें