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गोविंदाचार्य बोले- मोदी अभी सीख रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं

aajtak.in से बात करते हुए केएन गोविंदाचार्य ने अटल बिहारी वाजपेयी को याद किया. लालकृष्ण आडवाणी से हुई अपनी हालिया मुलाकात का जिक्र किया. नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में बेबाकी से बोले और गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा के लिए सरकारों को जिम्मेदार ठहराया.

फाइल फोटो फाइल फोटो

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) के प्रचारक और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सिद्धांतकार रह चुके केएन गोविंदाचार्य को संघ, स्वदेशी आंदोलन और हिंदुत्व के कुछ बेहद सुलझे हुए विचारकों में गिना जाता है. वर्ष 2000 में उन्होंने पार्टी और संघ दोनों को छोड़ दिया था. बहुत सारे लोग मानते हैं कि उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को आरएसएस का मुखौटा बताया था जिसके बाद दोनों के बीच संबंधों में खटास आ गई थी और आख़िरकार उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी. गोविंदाचार्य का एक परिचय यह भी है कि वो साफ-साफ बोलते हैं. एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने बीजेपी पर कई तीखे हमले किए थे. पार्टी को चापलूसी का अड्डा तक बताया था.

मोदी-अमित शाह की जोड़ी के बारे में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बारे में पूछे गए सवाल को गोविंदाचार्य ने यह कहते हुए टाल दिया कि वो व्यक्तियों के बारे में नहीं बोलना चाहते हैं. हालांकि, उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की मंशा ठीक है. वो बहुत मेहनत करते हैं लेकिन जिस शासन तंत्र के तहत काम कर रहे हैं वो पुराना है. तंत्र की ट्रेनिंग में दोष है. इसलिए हो सकता है कि कुछ काम हुआ और कुछ बच गया. मोदी जी राज्य की सत्ता से केंद्र में आए हैं सो उन्हें ये सब सीखने में थोड़ा वक्त लगेगा. वो अभी सीख रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में

मैंने उन्हें कभी मुखौटा नहीं कहा था. अखबार में लिखे गए एक लेख से यह पूरा विवाद शुरू हुआ. विवाद खड़ा हुआ तो मैंने खंडन किया. अटल जी ने कहा था, छोड़ो ये सब तुम. कुछ नहीं है इसमें. तुम शांति से अपना काम करो. वो संवेदनशील नेता थे. व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश ये उनका सिद्धांत था. हर कीमत पर सत्ता उन्हें कभी कबूल नहीं था. 1984 में जब सिख विरोधी दंगे दिल्ली में फैले तो वो दंगाइयों और पीड़ित सिखों के बीच में खड़े हो गए थे.

बीजेपी-आरएसएस संबंध के बारे में

देखिए, संघ को कभी भी किसी राजनीतिक बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ती है. संघ अपने हिसाब से काम करता है. अगर बीजेपी संघ के कार्यकर्ताओं की भावना का ख्याल रखता है तो कार्यकर्ता चुनाव में पार्टी का साथ देते हैं. नहीं रखते तो कार्यकर्ता उदासीन हो जाते हैं.  

गाय-बाबरी मस्ज़िद के बारे में

लिंचिंग के लिए देश की सरकारें दोषी हैं. सारी सरकारें. ये भी और पिछली भी. इसमें कोई शक नहीं है कि गाय के साथ लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं. भावनाओं की अनदेखी होगी तो जनभावनाएं तो भड़केंगी हीं. इसके लिए गोरक्षक नहीं, सरकारें दोषी हैं. बाबरी मस्ज़िद के बारे में भी यही हुआ था. जनभावनाओं का ख्याल नहीं रखा गया था. जो हुआ वो देश के सामने है. आप अगर समस्याओं से मुंह मोड़ लेंगे तो समस्याएं तो खत्म नहीं हो जाएंगी.

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