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गुमला: बिजली, पानी, सड़क और अस्पताल के लिए तरस रहा है ये गांव, प्रशासनिक उपेक्षा कब तक?

झारखंड के गुमला जिले में कोरवा जनजाति के परिवार आजादी के सत्तर दशकों के बाद भी उपेक्षित जीवन जीने को बाध्य हैं. इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचने के लिए उन्हें बेहद मुश्किल सफर तय करना पड़ता है. प्रशासन उनकी सुधि लेने को तैयार नहीं है.

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झारखंड के केवना गांव में इस सदी में भी नहीं पहुंची है सड़क.
झारखंड के केवना गांव में इस सदी में भी नहीं पहुंची है सड़क.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • समाज की मुख्य धारा से कटे हैं इस गांव के लोग
  • गांव से 5 किलोमीटर दूर है मुख्य सड़क
  • प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है केवना गांव

झारखंड के गुमला जिले में रहने वाला कोरवा जनजाति समुदाय प्रशासनिक उपेक्षा की मार झेल रहा है. बारडीह पंचायत के अंतर्गत आने वाले केवना गांव में कुल 35 आदिवासी परिवार रहते हैं. पहाड़ पर बसे इस समुदाय के लोगों का कहना है कि बीमारी फैलने के बाद भी, इस गांव की प्रशासन ने सुधि नहीं ली.

लोगों ने कहा कि जब वे सर्दी और  बुखार से जूझ रहे, तब भी किसी ने उनकी सुधि नहीं ली. अब जब वे बीमारी से उबर गए हैं, तो स्वास्थ्य विभाग की सर्वे टीम उनका हाल लेने पहुंची है.

ग्रामीणों का कहना है कि जब वे बीमार थे, तब जिन डॉक्टरों से उन्होंने इलाज कराया था, उन्हें अब किश्तों में भुगतान करना पड़ रहा है. जब इस गांव के लोग बीमार पड़ते हैं तो उन्हें खाट या कंधे पर लादकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है क्योंकि गांव तक सड़क ही नहीं पहुंची है. ये दूरी कम भी नहीं है, ग्रामीणों को करीब 5 किलोमीटर तक, खराब रास्तों पर हाथों के सहारे जाना पड़ता है.

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बीमारी में नहीं लिया किसी ने हाल

केवना गांव में रहने वाले कई परिवार बीमार पड़ गए थे, उस वक्त हॉस्पिटल की तरफ से न किसी पदाधिकारी ने संपर्क किया, न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी ने हाल लिया. जब गांव के लोग ठीक हो गए, तो प्रखंड से स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची, जिसे ग्रामीणों की नाराजगी का सामना करना पड़ा.

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ग्रामीणों का कहना है कि गांव में न तो सड़क है, न बिजली है. पानी पीने के लिए चपाकल की व्यवस्था नहीं है. केवल वोट के वक्त नेताओं को इस गांव की सुधि होती है, वे भी बड़े-बड़े वादे करते हैं और चले जाते हैं. जब पूरा गांव बीमार था तो झोला छाप डॉक्टर इलाज करने आते ते. उन्हें अब किश्तों में बकाया राशि चुका रहे हैं. बदहाली इतनी है कि अगर किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है तो उसे खाट पर लादकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है.

बुनियादी चीजों के लिए तरसते लोग

गांव के लोग पानी, बिजली, दवा और शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों से बहुत दूर हैं. यहां आने-जाने के लिए रास्ता भी नहीं है, जिसकी वजह से बच्चे स्कूलों का मुंह तक नहीं देख पाते हैं. सरकार से मदद की गुहार की लगाने के बाद भी सरकार ने मदद नहीं की है. ग्रामीणों ने एकजुट होने की बात कही है, और आंदोलन की धमकी भी दी है.

 

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गांव में लोगों को का इलाज करने वाले एक शख्स ने कहा कि इस इलाके में जिन लोगों को कोई भी बीमारी होती है, वे मुफ्त का इलाज कराते हैं. जब ग्रामीणों के पास पैसा होता है, तब वे लाकर पहुंचा देते हैं. ग्रामीण भी यही बात कहते हैं. जब इस स्थिति के बारे में जिला उपायुक्त शिशिर कुमार सिन्हा से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि गांव में बिजली और पानी की सुविधाएं जल्द बहाल की जाएंगी. आजादी के 72 साल बीत चुके हैं, गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए भी कराह रहा है.

प्रशासनिक और राजनैतिक उपेक्षा का मारा यह गांव, देश के विकास पर सवाल खड़े करता है. जब पूरा देश विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, तब इन गांवों का पिछड़ापन, विकास को चिढ़ाता नजर आता है.

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