दिल्ली नगर निगम के सबसे बड़े अस्पताल में लिफ्ट की जगह मौत का दरवाजा खुला है. यहां कई हादसे होते-होते बचे हैं. हिन्दूराव अस्पताल के डॉक्टर और दूसरे स्टाफ के साथ-साथ आये दिन अस्पताल में आने वाले मरीज और तीमारदार मौत के मुंह में समाने से बाल-बाल बचते हैं. मगर कई शिकायतों के बाद भी अस्पताल प्रशासन को कोई सुध नही. पांच मंजिला अस्पताल की बिल्डिंग से पुरानी लिफ्ट को निकालने के बाद से ही लिफ्ट का होल खुला पड़ा है. यहां न तो कोई बेरिकेटिंग की गई है न ही खतरे का कोई निशान ही लगाया गया है. लगता है जैसे प्रशासन किसी हादसे का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद उसकी नींद टूटे.
पहली मंजिल से लेकर पांचवी मंजिल तक हर मंजिल पर मौत दरवाजा खुला है. लगभग दो महीने पहले तक यहां लिफ्ट हुआ करती थी. मगर लिफ्ट मेंटेनेंस के नाम पर अस्पताल प्रशासन ने यहां से लिफ्ट को ही निकलवा दिया. तभी से लिफ्ट के जगह का मेन होल खुला पड़ा है. यहां न कोई बेरिकेट है न ही कोई चेतावनी का निशान. इसकी वजह से डॉक्टर, नर्स और अस्पताल के स्टाफ समेत मरीज और परिजन कई लोगों की जान भगवान भरोसे ही बची हुई है.
एक मरीज के साथ आयी प्रतीभा का कहना है, यहां जो मरीज गंभीर हालत में आते हैं वो ऊपर की मंजिलों पर नहीं जो सकते इसलिए उन्हें दूसरे निजी अस्पतालों मे जाना पड़ रहा है, क्योंकि लिफ्ट नहीं है. अगर कोई ऊपर आ जाए तो नीचे लिफ्ट की खाली जगह को सीढ़ी समझ नीचे पैर रखेगा तो सीधे पांचवी मंजिल से नीचे जाएगा.
अपने एक रिश्तेदार को अस्पताल दिखाने आए आलोक तो बाल-बाल बचे हैं. उनके अनुसार, ‘मैं अपने मरीज को वार्ड में पहुंचाकर वापस नीचे के लिए लिफ्ट की ओर बढ़ रहा था तभी अचानक गार्ड ने पकड़ लिया नहीं तो सीधे नीचे गिरता.’
अस्पताल में लिफ्ट न होने के कारण वार्ड न. 6 से लेकर 16 तक मरीजों को आने-जाने में उनका दम निकल जाता है. तीमारदारों को अपने कंधे पर मरीज को लादकर अलग-अलग वार्डों में पहुंचाना पड़ता है. गर्भवती महिलाओं के लिए भी मुसिबतें कम नहीं हैं, इसके लिए स्थानीय लोग और नॉर्थ दिल्ली रेजिडेंट वेलफेयर एशोसिएशन ने भी निगम में लगातार शिकायत की मगर अस्पताल प्रशासन पर कोई असर नही पड़ा.
नार्थ दिल्ली रेजिडेंट वेलफेयर एशोसिएशन के अध्यक्ष अशोक भसीन कहते हैं, अस्पताल का वार्ड मौत का कुआ बन हुआ है. डॉक्टर, स्टॉफ, मरीज और उसके रिश्तेदारों की जानें हर बार बाल-बाल बचती है.
नगर निगम के सबसे बड़े इस अस्पताल में रोज हजारों की संख्या में मरीज इलाज के लिए आते हैं. साथ में उनके तीमारदार भी होते हैं, जो इस भरोसे से आते हैं कि अस्पताल में उन्हें सही ईलाज के बाद जीवन दान मिलेगा. मगर अस्पातल प्रशासन की इस तरह के लापारवाहियों के कारण उनकी जान अस्पताल में ही सबसे ज्यादा खतरे में पड़ जाती है. क्या अस्पताल प्रशासन किसी की जान जाने के बाद ही सुध लेगा.