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'मेरे जिस्म से अपनी भूख मिटाते थे IS के लड़ाके'

'मेरे जिस्म से अपनी भूख मिटाते थे IS के लड़ाके'
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साल 2018 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए कांगो के डॉ मुकवेगे और यज़ीदी महिला अधिकार कार्यकर्ता नादिया मुराद नादिया मुराद को चुना गया है. यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए इन दोनों का नाम चुना गया है. जानते हैं कौन हैं नादिया और उनकी उस लड़ाई के बारे में जिसकी वजह से उन्हें नोबेल पुरस्कार  से सम्मानित किया जाएगा.
'मेरे जिस्म से अपनी भूख मिटाते थे IS के लड़ाके'
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नादिया उत्तर इराक के सिंजर पहाड़ियों में के एक याजीदी गांव में पैदा हुई लड़की है. वह जब 21 साल की थी, तब एक चरमपंथी समूह ने उनके गांव पर हमला कर दिया था. साथ ही गांव की अन्य लड़कियों की तरह नादिया को भी सेक्स स्लेव बना दिया गया.
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उन्हें करीब 6 महीनों तक आईएस के लड़ाकों के बीच काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिसमें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना शामिल है. हालांकि उनके चंगुल से छूटने के बाद नादिया ने अपने साथ हुए अपराध को अपनी ताकत बनाया और वो याजीदी लोगों के लिए कार्यकर्ता के रूप में सामने आई और इन अपराधों से जंग लड़ी.
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उन्होंने अपनी पुस्तक 'द लास्ट गर्ल : माई स्टोरी ऑफ कैप्टिविटी एंड माई फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट' में अपने साथ हुई बर्बरता का दिल दहला देने वाला वर्णन किया है. उन्होंने बताया था कि आईएस के आतंकवादी मुराद से सेक्स स्लेव का काम लेते थे, मतलब आईएस के लड़ाके उनसे अपनी हवस की भूख शांत करते थे.

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उन्होंने साल 2016 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में भी बताया था कि आईएस महिलाओं के साथ किस तरह से व्यवहार करता था. आईएस के अत्याचारों को झेलने वाली नादिया ने एक किताब भी लिखी थी और अपनी किताब के जरिए आईएस के मानवीयता को शर्मसार कर देने वाले कारनामों का खुलासा किया था. नोबेल पुरस्कार से पहले भी उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था, जिसमें Vaclav Havel Human Rights Prize (2016) शामिल है.
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नादिया किसी तरह आईएस के कब्जे से भागने में सफल रहीं और अब वह जर्मनी में रहती हैं. पिछले सप्ताह मुराद की किताब रिलीज हुई है, जिसमें उन्होंने आईएस के कब्जे में रहने के दौरान अपनी दर्दनाक आपबीती बयान की है. नादिया अपनी पुस्तक में बताती हैं कि उन्होंने कई बार आईएस के चंगुल से भागने की कोशिश की और कई बार पकड़ी गईं. जब भी वह भागते हुए पकड़ ली जातीं, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता.
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उन्होंने लिखा है, "एक बार मैंने मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहनी जानी वाली पोशाक पहनकर भागने की कोशिश की, लेकिन एक गार्ड ने मुझे पकड़ लिया. उसने मुझे मारा और छह लड़ाकों की अपनी सेंट्री को सौंप दिया. उन सभी ने मेरे साथ तब तक बलात्कार किया, जब तक मैं होशो-हवास न खो बैठी."
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वह आगे लिखती हैं कि अगले सप्ताह उन्हें छह लड़ाकों की एक अन्य सेंट्री को सौंप दिया गया. उन लड़ाकों ने भी उनके साथ लगातार बलात्कार किया और मारा पीटा भी. इसके बाद एक आईएस लड़ाके को उन्हें सौंप दिया गया, जो उन्हें लेकर सीरिया चला गया.
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नादिया बताती हैं कि मोसुल में उन्हें एकबार भागने का मौका मिला. वह बागीचे की चहारदीवारी फांदने में सफल रहीं. लेकिन मोसुल की गलियों में भटकते हुए उन्हें जब समझ में नहीं आया कि क्या करें तो उन्होंने एक अनजान घर के दरवाजे की घंटी बजा दी और मदद की गुहार लगाई. हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्हें हर बार अनजान लोगों से मदद मिली हो.
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उन्होंने आईएस के कब्जे में सेक्स स्लेव की जिंदगी बिता रही अपनी भतीजी को बताया था कि छह बार उन्होंने जिन अनजान लोगों से मदद की गुहार लगाई. लेकिन उन्होंने मुराद को वापस आईएस के हवाले कर दिया. मोसुल में लेकिन उनका साहसी कदम काम आया और वह किसी तरह शरणार्थी शिविर तक पहुंचने में सफल रहीं.
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नादिया के अनुसार, इराक और सीरिया में उन्होंने देखा कि सुन्नी मुस्लिम आम जीवन जीते रहे, जबकि यजीदियों को आईएस के सारे जुल्म सितम सहने पड़े. मुराद बताती हैं कि हमारे लोगों की हत्याएं होती रहीं, रेप किए जाते रहे और सुन्नी मुस्लिम जुबान बंद किए सब देखते रहे. उन्होंने कुछ नहीं किया.
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नादिया अपनी पुस्तक में लिखती हैं, "अपनी कहानी कहना कभी आसान नहीं होता. हर बार जब आप इसके बारे में कहते हैं, आप उसे मंजर को जैसे फिर से जी रहे होते हैं. कई बार ऐसा होता था कि आपके साथ लगातार सिर्फ बलात्कार होता रहता था. आपको नहीं पता होता था कि अगला कौन दरवाजा खोलेगा और आपके साथ रेप करेगा. हर आने वाला दिन और खौफनाक होता था."
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गौरतलब है कि इराक और सीरिया में यजीदी अल्पसंख्यक समुदाय है और मुस्लिमों के अत्याचारों का शिकार है. 2014 में आईएस ने 7,000 यजीदी लड़कियों और महिलाओं को बंधक बना लिया था, जिसमें नादिया मुराद भी शामिल थीं. आईएस के लड़ाकों ने यजीदी पुरुषों और बूढ़ी महिलाओं की हत्या कर दी थी. मुराद के आठ भाई और उनकी मां की भी हत्या कर दी गई थी.
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