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बिजनेस

शिखर से हवालात तक, कैसे बर्बाद हुआ सिंह बंधुओं का साम्राज्य

शिखर से हवालात तक, कैसे बर्बाद हुआ सिंह बंधुओं का साम्राज्य
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रैनबैक्सी के पूर्व सीईओ मलविंदर सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. मलविंदर की गिरफ्तारी लुधियाना से हुई. मलविंदर को 2,300 करोड़ रुपये के हेराफेरी के मामले में गिरफ्तार किया गया है. पुलिस ने इस मामले में पांचवीं गिरफ्तारी की है. इससे पहले उनके भाई और कंपनी के पूर्व सीईओ शिविंदर सिंह को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया.
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इस तरह कभी देश की दिग्गज कंपनी रैनबैक्सी के प्रमोटर रहे और बाद में कंपनी बेचकर करीब 9,500 करोड़ रुपये की नकदी जेब में रखने वाले सिंह बंधु हवालात में पहुंच गए हैं.  उनके अलावा रेलिगयेर इंटरप्राइजेज लिमिटेड (REL) के पूर्व सीएमडी सुनील गोधवानी और कंपनी के दो अन्य वरिष्ठ अधिकारियों कवि अरोड़ा और अनिल सक्सेना को भी दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है. दिल्ली पुलिस की आर्थ‍िक अपराधा शाखा (EOW) ने मार्च में एफआईआर दर्ज की थी.
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रेलिगेयर फिनवेस्ट लिमिटेड (RFL) के मनप्रीत सिंह सूरी ने शिविंदर, गोधवानी के साथ कई अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उन्होंने कंपनी के कामकाज के लिए लोन हासिल किए, लेकिन उसे दूसरी कंपनियों में लगा दिया गया. सिंह बंधुओं परिवार एक प्रभावशाली 'बाबा' के असर में था.
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गुरिंदर सिंह ढिल्लन राधा स्वामी सत्संग ब्यास (RSSB) के आध्यात्मिक गुरु हैं और 'बाबाजी' या 'व्यास के संत' के नाम से मशहूर हैं. सिंह परिवार इनका अनुयायी है और सिर्फ अनुयायी ही नहीं बल्कि ढिल्लन परिवार और सिंह परिवार में बहुत करीबी रिश्ता है. ढिल्लन के पहले इसके उनके मामा चरण सिंह 1951 से 1990 से इस संस्था के आध्यात्म‍िक गुरु थे. चरण सिंह की बेटी निम्मी सिंह असल में सिंह बंधुओं की मां हैं और दिवंगत परविंदर सिंह की पत्नी हैं.
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इस तरह ढिल्लन रिश्ते में सिंह बंधुओं के मामा लगते हैं. ढिल्लन ने ही गोधवानी का सिंह बंधुओं से परिचय कराया और यह रिश्ता इतना करीबी हो गया कि गोधवानी को सिंह बंधुओं का 'तीसरा भाई' तक कहा जाने लगा. बाद में ढिल्लन के ही कहने पर सिंह बंधुओं ने गोधवानी को अपनी नॉन-बैंकिंग कंपनी रेलिगेयर इंटरप्राइजेज का प्रमुख बना दिया. इस कारोबारी बाबा और सिंह बंधुओं ने मिलकर ऐसा कारनामा किया जो बॉलीवुड की किसी कहानी को भी फेल कर सकता है. उनके कारनामे से करीब 22,500 करोड़ रुपये हवा में उड़ गए.
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कारोबारी जगत में मलविंदर सिंह और शिवेंदर सिंह करीब तीन साल पहले से चर्चा में हैं, जब यह पता चला कि उनके ऊपर करीब 13,000 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया है. यह तब है, जब 2008 में उन्होंने तबकी भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी को जापान की दाइची सैंक्यो को बेचा था और इससे उनके पास 9,567 करोड़ रुपये की नकदी आ गई थी. यह कंपनी उन्हें अपने पिता परविंदर सिंह से विरासत में मिली थी. उनके दादा मोहन सिंह बंटरवारे के बाद रावलपिंडी से दिल्ली आए थे और उन्होंने यहां कारोबार जमाया.
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तो सवाल यही है कि उनके पास से करीब 22,500 करोड़ रुपये (9,500 करोड़ नकदी और 13,000 करोड़ कर्ज) कहां हवा हो गए. रैनबैक्सी को बेचने के बाद पिछले 10 साल में सिंह बंधु ने फोर्टिस हेल्थकेयर और रेलिगेयर एंटरप्राइजेज जैसे एनबीएफसी से भी अपना प्रभावी नियंत्रण खो दिया. सिंह बंधुओं की सफलता की चमकदार कहानी में ट्रेजडी का सिलसिला शुरू हुआ रैनबैक्सी के बेचने और उससे मिली नकदी के बाद.
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रैनबैक्सी बेचने से मिली करीब 9,500 करोड़ रुपये की नकदी में से सिंह बंधुओं ने 2,000 करोड़ रुपये टैक्स और पुराने लोन चुकाने में लगाए. बचे 7,500 करोड़ रुपये में से 1,750 करोड़ रुपये रेलिगेयर में लगाए गए ताकि कंपनी में और तरक्की हो. इसी तरह 2,230 करोड़ रुपये फोर्टिस में ग्रोथ के लिए लगाए गए. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि 2,700 करोड़ रुपये गुरु ढिल्लन के परिवार की कंपनियों को ट्रांसफर कर दिया गया.  इसके अलावा रेलिगेयर और फोर्टिस में मनमाने तरीके से विस्तार के लिए पैसे लगाए गए, जिससे काफी नुकसान हुआ.
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इस तरह सिंह बंधुओं ने ढिल्लन परिवार को करीब 4000 से 5000 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए. लेकिन ये पैसे उनको वापस नहीं मिल पाए हैं. सिंह बंधुओं से मिले पैसे की वजह से ढिल्लन परिवार ने रियल एस्टेट सेक्टर में जमकर निवेश किया. मंदी के दौर में रेलिगेयर और फोर्टिस को लोन चुकाने में काफी दिक्कत होने लगी. इसी तरह रियल एस्टेट में मंदी आने से ढिल्लन परिवार को भी काफी नुकसान हुआ. इसमें सबसे ज्यादा नुकसान में सिंह परिवार ही रहे.