जंग थमेगी और दोनों जीत भी जाएंगे... अगर इन 5 प्वाइंट पर राजी हो जाएं US और ईरान

अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण संघर्ष के बाद अब शांति समझौते की सुगबुगाहट तेज हो गई है. दोनों देशों पर युद्ध रोकने का भारी दबाव है. कूटनीतिक गलियारों में एक ऐसे फॉर्मूले पर चर्चा हो रही है, जिसे ट्रंप और तेहरान दोनों अपनी 'ऐतिहासिक जीत' बताकर पेश कर सकें.

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अमेरिका-ईरान में हो सकती है दूसरे दौर की शांति वार्ता. (File Photo: ITG) अमेरिका-ईरान में हो सकती है दूसरे दौर की शांति वार्ता. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • वॉशिंगटन,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:27 AM IST

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव और युद्ध के बीच दोनों देशों पर शांति समझौता करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. युद्ध की शुरुआत के बाद से अब सीजफायर के अंतिम दिनों में दोनों पक्षों के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं. इस्लामाबाद में हुई लंबी बातचीत के बावजूद कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका, लेकिन दोनों तरफ से दूसरे दौर की वार्ता के लिए दरवाजे खुले हुए हैं.

CNN की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका-ईरान में कूटनीतिक स्तर पर एक ऐसे फॉर्मूले पर चर्चा हो रही है, जिसे ट्रंप और तेहरान दोनों अपनी 'ऐतिहासिक जीत' बताकर पेश कर सकें, क्योंकि अमेरिका को बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों के कारण तत्काल समझौते की जरूरत है तो दूसरी ओर  ईरान 39 दिनों की बमबारी और 13,000 ठिकानों के तबाह होने के बाद भारी दबाव में है.

प्रस्तावित समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने, परमाणु संवर्धन पर रोक और यूरेनियम भंडार के प्रबंधन जैसे प्रमुख बिंदु शामिल हैं. इजरायल और लेबनान के मुद्दों को अलग रखकर सीधे द्विपक्षीय प्रगति पर ध्यान दिया जा रहा है. ट्रंप इसे परमाणु खतरा कम करने वाली जीत बताना चाहते हैं, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और प्रतिरोधक क्षमता बचाने का दावा कर रहा है.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे बड़ी शर्त

रिपोर्ट में बताया गया है कि शांति समझौते की पहली सबसे बड़ी शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को स्वतंत्र रूप से यातायात के लिए फिर से खोलना है. अमेरिकी नाकाबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया है, जिससे उसके सहयोगी देश भी प्रभावित हो रहे हैं.

ईरान को पता है कि चीन जैसे देशों पर दबाव कम करने के लिए उसे यातायात की अनुमति देनी होगी. दोनों पक्ष अब इस मुद्दे के केवल बारीकियों पर चर्चा कर रहे हैं.

न्यूक्लियर एनरिचमेंट पर खींचतान

सीएनएन का कहना है कि न्यूक्लियर एनरिचमेंट (परमाणु संवर्धन) पर रोक लगाने के समय को लेकर दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है. ईरान पांच साल की रोक चाहता है, जबकि अमेरिका इसे बीस साल तक खींचना चाहता है. इसके बीच का कोई रास्ता निकालने पर सहमति बन सकती है.

इसके अलावा ईरान के पास मौजूद 60% संवर्धित यूरेनियम को रूस भेजने या आईएईए (IAEA) की निगरानी में नष्ट करने पर विचार हो रहा है.

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लेबनान पर अलग से बातचीत

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि शांति वार्ता में इजरायल और लेबनान, हिज्बुल्लाह और अन्य प्रॉक्सी ग्रुप से जुड़े मुद्दों को अलग से बातचीत का विषय बनाया गया है. लेबनान सरकार और इजरायल के बीच सीधी बातचीत शुरू हो गई है, लेकिन हिज्बुल्लाह का डिसआर्मामेंट्स (हथियार डालना) फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है. अमेरिका और ईरान इस जटिल मुद्दे को अलग रखकर अपने द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति करना चाहते हैं, ताकि युद्ध के विस्तार को रोका जा सके.

अमेरिका की घरेलू जरूरत

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ये समझौता उनकी घरेलू राजनीति के लिए संजीवनी जैसा है. अमेरिका में महंगाई और गैस की बढ़ती कीमतों ने उनके समर्थकों के बीच नाराजगी पैदा की है. ट्रंप को एक ऐसे समझौते की तलाश है, जिसे वो 2015 के ओबामा काल के समझौते से बेहतर बता सकें. वह लोगों को दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने ईरान के परमाणु ढांचे को स्थाई रूप से पंगु बना दिया है.

ईरान को भविष्य की चिंता

ईरान ने भीषण हवाई हमलों के बावजूद हार नहीं मानी है, लेकिन उसकी सैन्य और प्रशासनिक शक्ति कमजोर हुई है. अयातुल्ला खामेनेई के बाद नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और आईआरजीसी (IRGC) के कमांडरों का मारा जाना तेहरान के लिए बड़ी चुनौती है. भले ही IRGC अयातुल्ला अली खामेनेई की जगह उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को सर्वोच्च नेता नियुक्त कर दिया हो, लेकिन उन्हें अभी तक सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है और न ही ये साबित हुआ है कि वो होश में हैं. ईरानी सरकार इस समझौते के जरिए खुद को सुरक्षित करने और अपनी अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने की कोशिश में जुटा है, ताकि भविष्य के लिए संभल सके.

रिपोर्ट ये भी बताया गया है कि शांति समझौते में भले ही ट्रंप परमाणु बम बनाने की क्षमता कम करने वाला समझौता कर लें, लेकिन युद्ध की तबाही ने ईरान के कट्टरपंथियों के धड़े के अंदर ये धारणा मजबूत हो गई है कि सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार ही एकमात्र रास्ता है.

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