जब सबकी नजरें खालिदा जिया और शेख हसीना की सियासी टक्कर पर टिकी थीं, तभी बांग्लादेश में एक और बड़ा खेल चल रहा था. एक तरफ थीं प्रधानमंत्री शेख हसीना, दूसरी तरफ नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस जिनके पास कुर्सी नहीं थी लेकिन असर था. अब खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है लेकिन बीते 18 महीनों में अगर कोई सबसे बड़ा विजेता बनकर उभरा है, तो वो हैं यूनुस.
दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति में जो उथल-पुथल जुलाई-अगस्त 2024 में शुरू हुई, छात्रों का एंटी-कोटा आंदोलन, फिर वही आंदोलन सरकार बदलने की मुहिम में बदला, हिंसा हुई, शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और अचानक मोहम्मद यूनुस अंतरिम प्रशासन के मुखिया बनकर सामने आए, ये सब बहुत तेजी से हुआ. सितंबर 2024 में यूनुस ने खुद कहा था कि हसीना को हटाने का आंदोलन 'बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया' था.
यूनुस की 18 महीनों की पारी
85 साल के यूनुस ने 18 महीनों तक अंतरिम प्रशासन की कमान संभाली. इस दौरान उन्होंने कई बड़े फैसले किए जैसे राष्ट्रपति अध्यादेशों के जरिए कानून पास कराए, अमेरिका के साथ ट्रेड डील साइन की, फरवरी 2026 में चुनाव कराने का ऐलान किया (जबकि सेना प्रमुख दिसंबर 2025 चाहते थे) और आखिरकार चुनाव करा भी दिए.
12 फरवरी के चुनाव में बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने जीत दर्ज की और अब तारिक रहमान प्रधानमंत्री बन गए हैं. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि यूनुस ने ये चुनाव शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को बाहर रखकर कराया और पश्चिमी देशों से इसे 'इनक्लूसिव' यानी समावेशी चुनाव की मान्यता भी दिला दी.
वरिष्ठ पत्रकार स्वदेश रॉय के मुताबिक, 'यूनुस की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने ऐसे चुनाव कराए, जिसमें कम से कम 40% वोट शेयर वाली ताकत को बाहर रखा गया और फिर भी पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने उसे स्वीकार कर लिया.'
हसीना से दशकों पुरानी दुश्मनी
मोहम्मद यूनुस और शेख हसीना की टक्कर नई नहीं थी. 2007 में जब सेना समर्थित अंतरिम सरकार आई थी, तब 'माइनस टू फॉर्मूला' के तहत हसीना और खालिदा जिया, दोनों को सियासत से दूर रखने की कोशिश हुई थी. तब यूनुस को संभावित प्रधानमंत्री चेहरा माना जा रहा था लेकिन वो योजना आगे नहीं बढ़ी.
साल 2009 में हसीना सत्ता में लौटीं और उसके बाद यूनुस पर कानूनी कार्रवाई शुरू हुई. जनवरी 2024 में उन्हें ग्रेमीन टेलीकॉम मामले में छह महीने की सजा भी सुनाई गई. आलोचकों ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया.
क्या यूनुस सफल रहे?
यूनुस ने अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की और चुनाव कराए लेकिन कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठे. अल्पसंख्यकों पर हमले, भीड़ हिंसा और राजनीतिक हत्याएं जारी रहीं. महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर भी उन्होंने इस्लामी संगठनों के दबाव में समझौते किए.
ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आसिफ मोहम्मद शाहन कहते हैं, 'यूनुस तीन मकसद चुनाव, सुधार और न्याय लेकर आए थे. चुनाव कराने में वे सफल रहे, लेकिन सुधारों का भविष्य अनिश्चित है.'
जुलाई चार्टर पर सस्पेंस
यूनुस का बड़ा एजेंडा था 'जुलाई चार्टर'. इस पर जनमत संग्रह भी हुआ जिसमें 62% लोगों ने समर्थन दिया. इसका मकसद संसद को 180 दिनों के लिए संविधान सभा की तरह काम करने की ताकत देना था ताकि संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बदलाव किए जा सकें.
लेकिन बीएनपी, जिसे दो-तिहाई बहुमत मिला है, इस चार्टर की कई धाराओं से सहमत नहीं है. मंगलवार को बीएनपी सांसदों ने संवैधानिक सुधार आयोग के सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली. जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजंस पार्टी (NCP) ने चेतावनी दी है कि अगर जुलाई चार्टर को ठंडे बस्ते में डाला गया तो वे सड़कों पर उतरेंगे.
यूनुस ने कैसे मनवाया अपनी बात?
यूनुस की अपनी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी. उन्हें छात्र नेताओं ने अंतरिम सरकार का मुखिया बनने के लिए बुलाया था. फिर भी उन्होंने बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी संगठनों को कई मुद्दों पर साथ लाने में कामयाबी पाई.
उन्हें युवाओं का समर्थन भी मिला. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यूनुस ने अपने भरोसेमंद सलाहकारों की छोटी टीम के जरिए तेजी से फैसले लिए जैसे डेटा सिक्योरिटी, डेटा प्राइवेसी और क्लाउड कंप्यूटिंग से जुड़े अध्यादेश.
अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील को भी बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिसमें अमेरिकी कच्चे माल से बने बांग्लादेशी उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ शून्य कर दिया गया.
आगे क्या करेंगे यूनुस?
अब जब निर्वाचित सरकार ने शपथ ले ली है तो यूनुस ने अंतरिम प्रमुख का पद छोड़ दिया है. कुछ लोगों ने कयास लगाए कि वे राष्ट्रपति बन सकते हैं, लेकिन बीएनपी की सरकार में इसकी संभावना कम है.
संभावना यही है कि यूनुस अब सार्वजनिक जीवन से कुछ दूरी बनाएं. प्रोफेसर शाहन कहते हैं, 'अगर सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता है, तो ये उनकी बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी. लेकिन उनका रिकॉर्ड मिला-जुला रहेगा.' वरिष्ठ पत्रकार स्वदेश रॉय का कहना है, 'यूनुस खुद को अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बताते थे. उन्होंने दिखा दिया कि वे बाकी नेताओं से अलग हैं.'
फिलहाल, ढाका की सत्ता के गलियारों से दूर जाते हुए भी ये वक्त मोहम्मद यूनुस का ही है. लेकिन क्या इतिहास उनके साथ नरमी बरतेगा? जैसा कि एक विश्लेषक ने कहा कि इतिहास सबको जगह देता है लेकिन हर विजेता को गले नहीं लगाता.
युद्धजीत शंकर दास