'जैसे-जैसे कोई शहर अमीर होता है, वहां के लोगों की चाल तेज हो जाती है...'
मशहूर मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट लेविन ने अपनी किताब 'ए ज्योग्राफी ऑफ टाइम' में ये दिलचस्प तर्क दिया था. लेविन ने आर्थिक विकास और उस तरक्की की रफ्तार से अपनी चाल मिलाते इंसान के बीच एक गहरा सामंजस्य देखा था. एक बैलेंस जो इंसान या किसी शहर या किसी देश को बदलते चला जाता है.
दरअसल, हकीकत यह है कि इंसानों की तरह शहरों का भी अपना एक टेम्परामेंट यानी मिजाज होता है. मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आपके पैदल चलने की गति आपके शहर की अर्थव्यवस्था, आपकी मानसिक सेहत और यहां तक कि आपके दिल की धड़कन का हाल बयां करती है. जब आप किसी मेट्रो स्टेशन पर लोगों को रेस लगाते देखते हैं, तो वह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि उस शहर का इकोनॉमिक प्रेशर होता है.
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने स्मार्टफोन डेटा के जरिए दुनिया के 111 देशों की आदतों का विश्लेषण किया, जिसके परिणाम चौंकाने वाले आए. इसके अनुसार सिंगापुर रफ्तार का बादशाह है. यहां के लोग 60 फीट की दूरी औसतन 10.55 सेकंड में तय कर लेते हैं. यहां की लाइफस्टाइल 'टाइम-इज-मनी' के सिद्धांत पर चलती है. लंदन और न्यूयॉर्क की रफ्तार भी तरक्की की तेज रफ्तार को कनेक्ट करती है. लंदन यूरोप का सबसे व्यस्त आर्थिक केंद्र है. यहां पैदल चलने की गति पेरिस या बर्लिन से कहीं अधिक है, क्योंकि यहां का वर्क-कल्चर अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है.
दूसरी ओर, इंडोनेशिया को सबसे धीमा माना गया. यहां एक औसत व्यक्ति दिन भर में मात्र 3,513 कदम चलता है. यहां की गर्म और उमस भरी जलवायु और सामाजिक ताना-बाना लोगों को 'धीरे चलो' का संदेश देता है. साथ ही वहां फुटपाथों की कमी भी लोगों को कम चलने पर मजबूर करती है. ऐसे ही अफ्रीकी देश मलावी का ब्लैंटायर शोधकर्ताओं के लिए एक प्रयोगशाला जैसा है. कहा जाता है कि इस शहर में समय थमा हुआ है. यहां जल्दी नाम का कोई शब्द नहीं है. यहां रास्ते में मिलना और बात करना काम पूरा करने से ज्यादा जरूरी माना जाता है. मनोवैज्ञानिक इसे सोशल बॉन्डिंग का उच्चतम स्तर मानते हैं, जहां इंसान मशीन नहीं बल्कि एक सामाजिक ईकाई के रूप में जीता है.
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अगर भारत में देखें तो यहां रफ्तार के दो अलग चेहरे दिखते हैं. मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में पैदल चलने की रफ्तार वैश्विक औसत के करीब यानी 12-14 सेकंड तक पहुंच रही है. महानगरों का दबाव लोगों की लाइफ पर साफ दिखता है. ऑफिस, मेट्रो और लोकल ट्रेन पकड़ने की जद्दोजहद ने भारतीयों को तेज भागना सिखा दिया है. लेकिन वहीं, भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में अभी भी लोग धीमी चाल के साथ सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं.
अगर कदमों का गणित जोड़ें तो भारतीयों का औसत दिन भर में 4,200 से 4,500 कदम है, जो वैश्विक औसत 5,000 कदम से कम है, जो बढ़ती सुस्ती की ओर भी इशारा करता है.
स्पीड का सांस्कृतिक पहलू...
सिंगापुर के पास प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, केवल मानव संसाधन हैं. वहां 'कियासु' शब्द लोकप्रिय है, जिसका अर्थ है- 'पीछे छूट जाने का डर'. यही डर उन्हें तेज चलने और हर काम समय से पहले करने के लिए प्रेरित करता है.
दूसरी ओर, इंडोनेशिया में 'नोंगक्रोंग' की परंपरा है, जिसका अर्थ है दोस्तों के साथ बिना किसी खास मकसद के घंटों बैठकर बातें करना. यह धीमापन उन्हें मानसिक शांति तो देता है, लेकिन मोटापे जैसे हेल्थ मानकों पर उन्हें पीछे धकेल रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की फीजिकल एक्टिविटी स्ट्रेटजी रिपोर्ट 2025 रफ्तार के इस खेल पर गंभीर चेतावनी देती है. कम रफ्तार के अपने खतरे हैं. इंडोनेशिया और खाड़ी देशों में बहुत कम चलने के कारण मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज एक स्वास्थ्य आपातकाल बन गया है. यहां के लोगों की सुस्ती शरीर को अंदर से खोखला कर रही है.
दूसरी ओर तेज रफ्तार के भी अपने अलग खतरे हैं. टोक्यो, ज्यूरिख या लंदन जैसे शहरों में, जहां लोग सबसे तेज चलते हैं, वहां कोरोनरी हार्ट डिजीज यानी दिल की बीमारियों का खतरा अधिक होता है. तेज चलने का मतलब अक्सर Type-A पर्सनैलिटी होता है, जो शरीर को हमेशा इमरजेंसी मोड में रखता है.
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विश्व स्वास्थ्य संगठन का निष्कर्ष है कि तेज चलना आपको फिट रख सकता है, लेकिन अत्यधिक तेज भागना आपके नर्व सिस्टम को हमेशा फाइट या फ्लाइट मोड में रखता है, जो लंबे समय में मानसिक तनाव और हार्ट फेलियर का कारण बनता है. इसलिए इतना धीमा मत चलिए कि शरीर बीमार हो जाए जैसा कि इंडोनेशिया में हो रहा है, और इतना तेज मत भागिए कि रूह पीछे छूट जाए जैसा कि सिंगापुर में हो रहा है.
सवाल है कि क्या हम बीच का रास्ता ढूंढ सकते हैं? तो जवाब है- हां. अब दुनिया 'स्लो मूवमेंट' की ओर लौट रही है. सिंगापुर जैसे शहरों में अब माइंडफुल वॉकिंग यानी ध्यानपूर्वक चलने के लिए पार्क बनाए जा रहे हैं. असली चुनौती उस मध्य मार्ग को खोजने की है, जहां हमारे कदम स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त तेज हों, लेकिन मानसिक शांति के लिए पर्याप्त धीमे.
WHO की सलाह साफ है- इतना धीमा मत चलिए कि शरीर बीमार हो जाए, और इतना तेज मत भागिए कि रूह पीछे छूट जाए.
तो अगली बार जब आप सड़क पर निकलें, तो अपनी चाल पर ध्यान दें. क्या आप वाकई कहीं पहुंचने के लिए भाग रहे हैं, या सिर्फ इसलिए क्योंकि आपके बगल वाला दौड़ रहा है? याद रखिए, जिंदगी या घड़ी की इस बहस में कोई एक विजेता नहीं है. मलावी का धीमापन अपनों के लिए रुकना सिखाता है, तो सिंगापुर की रफ्तार अनुशासन. फैसला आपके कदमों को करना है.
संदीप कुमार सिंह