रूसी तेल पर भारत को अचानक मिलने लगा इतना डिस्काउंट, क्या है इसका चीन फैक्टर

रूस का कच्चा तेल मार्च से महंगा बिक रहा था, लेकिन अब इसमें छूट मिलने लगी है. भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों की मांग में कमी आई है, जिससे रूस के तेल ग्रेड यूराल्स की कीमतें ब्रेंट क्रूड से सस्ती हो गई हैं.

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रूसी तेल पर डिस्काउंट की एक वजह चीन भी है (Photo: File/Reuters) रूसी तेल पर डिस्काउंट की एक वजह चीन भी है (Photo: File/Reuters)

आजतक इंटरनेशनल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 10 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:55 PM IST

रूस का कच्चा तेल मार्च से ही काफी महंगा बिक रहा था लेकिन अब इसमें डिस्काउंट मिलना फिर से शुरू हो गया है. रूस के प्रमुख कच्चे तेल ग्रेड यूराल्स का दाम मार्च से भारत और चीन जैसे उसके सबसे बड़े खरीदार देशों में ब्रेंट क्रूड के मुकाबले महंगा बिक रहा था. इसकी वजह मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में आई रुकावट मानी जा रही थी.

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हालांकि, अब सूत्रों के अनुसार रूसी कच्चे तेल की मांग में गिरावट आई है. ऐसा इसलिए क्योंकि एशियाई रिफाइनरियों ने पहले से जमा भंडार का इस्तेमाल किया है, दूसरे विकल्प तलाश लिए हैं और कुछ ने अपनी रिफाइनिंग क्षमता भी कम कर दी है.

सूत्रों के मुताबिक, भारत में जुलाई और अगस्त डिलीवरी वाले यूराल्स कार्गो इस महीने वैश्विक क्रूड बेंचमार्क ब्रेंट के मुकाबले 2 से 3 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर बिक रहे हैं. जबकि अप्रैल और मई में यही तेल 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल महंगा बिक रहा था.

उत्तरी गोलार्ध के सर्दियों के महीनों में यूराल्स पर 7 से 8 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट था, क्योंकि अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के चलते रूस का तेल उत्पादन प्रभावित हुआ था. वहीं, पिछले साल जून से अगस्त के दौरान यह छूट करीब 1 से 3 डॉलर प्रति बैरल थी.

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भारत और चीन के बाजार आमतौर पर एक-दूसरे के रुझान को फॉलो करते हैं, लेकिन चीन की खरीद में कमी का असर कई अन्य रूसी तेल ग्रेड पर भी पड़ता है. चीन भारत की तुलना में यूराल्स कम खरीदता है, लेकिन ESPO ब्लेंड, आर्कटिक और सखालिन जैसे हल्के रूसी कच्चे तेल की खरीद अधिक करता है.

रूसी तेल के सस्ता होने के पीछे का 'चीन फैक्टर'

एक सूत्र ने बताया कि कुछ मामलों में चीनी खरीदारों ने जून डिलीवरी वाले रूसी तेल कार्गो लेने से इनकार कर दिया. इससे रूसी तेल कंपनियों की मोलभाव करने की स्थिति कमजोर हो गई है, क्योंकि ऐसा न होने पर तेल की खेप समुद्र में फ्लोटिंग स्टोरेज में फंस सकती है.

इसके अलावा, चीन की छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियां, जिन्हें 'टीपॉट रिफाइनरी’ कहा जाता है, कम मुनाफे के कारण तेल की रिफाइनिंग में कमी ला रही हैं. इससे कच्चे तेल की मांग और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है.

भारत की तेल खरीद में बढ़ी रूस की हिस्सेदारी

पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच तेल को लेकर रूस पर भारत की निर्भरता लगातार बढ़ रही है. अप्रैल 2026 में भारत के कुल तेल आयात के मूल्य में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 38% पहुंच गई. पिछले 11 महीने में भारत की तेल खरीद में रूसी तेल की हिस्सेदारी पहली बार इतनी ऊपर गई है.

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द हिंदू के एक विश्लेषण के अनुसार, मात्रा (वॉल्यूम) के हिसाब से अप्रैल में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 34.3% रही.

वाणिज्य मंत्रालय के विदेशी व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अप्रैल 2026 में रूस से 5.79 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया, जबकि मार्च में यह आंकड़ा 3.25 अरब डॉलर था. रुपये में देखें तो रूस से तेल आयात का मूल्य मार्च के 30,138 करोड़ रुपये से बढ़कर अप्रैल में 54,179 करोड़ रुपये हो गया.

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, रूस से कच्चे तेल के आयात का यह मूल्य कम से कम जनवरी 2025 के बाद का सबसे ऊंचा मासिक स्तर है. ऐसा इसलिए क्योंकि मध्य पूर्व संकट के बीच रूसी तेल काफी महंगा हो गया है.

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