अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अभी हाल ही में चीन का दौरा करके गए हैं. लेकिन इसके तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन बीजिंग पहुंच रहे हैं. इन दो बड़े ग्लोबल लीडर का मिलना वैश्विक राजनीति में बड़ा संकेत माना जा रहा है. मंगलवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय दौरे में पुतिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे. दोनों नेता सुरक्षा, ऊर्जा, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे.
आज दुनिया रूस और चीन को 'बेहद करीबी साझेदार' के रूप में देखती है, लेकिन इन दोनों देशों का इतिहास हमेशा इतना सहज नहीं रहा. कभी दोनों साम्यवादी महाशक्तियां वैचारिक नेतृत्व के लिए एक-दूसरे से भिड़ीं, सीमा विवाद में सैनिक मारे गए और हालात परमाणु युद्ध की आशंका तक पहुंच गए थे.
...जब पहली बार सोवियत संघ के दौरे पर गए थे माओत्से तुंग
1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद माओ जेडांग (माओत्से तुंग) ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की. उस दौर में दुनिया शीत युद्ध की राजनीति में बंटी हुई थी. अमेरिका ने राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई शेक का समर्थन किया, जबकि सोवियत संघ ने माओ की कम्युनिस्ट पार्टी का साथ दिया. चीन गृहयुद्ध में कम्युनिस्टों की जीत के बाद माओ को अपने तबाह हो चुके देश को फिर से खड़ा करने और विकास के लिए आर्थिक व सैन्य मदद की जरूरत थी. इसी कारण वह पहली बार सोवियत संघ पहुंचे. लेकिन वहां उनका स्वागत वैसा नहीं हुआ जैसा आज शी जिनपिंग का रूस में होता है.
सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन ने माओ को मॉस्को के बाहरी इलाके के एक गेस्ट हाउस में कई हफ्तों तक इंतजार कराया. उनकी गतिविधियों पर भी पाबंदियां थीं. उस समय सोवियत संघ खुद को बड़ी शक्ति मानता था और चीन को अपेक्षाकृत कमजोर सहयोगी की तरह देखता था. हालांकि बाद में दोनों देशों ने 1950 में “साइनो-सोवियत ट्रीटी ऑफ फ्रेंडशिप, अलायंस एंड म्यूचुअल असिस्टेंस” पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद सोवियत संघ ने चीन को तकनीकी सहायता, हथियार, स्कॉलरशिप और बड़ी संख्या में इंजीनियर मुहैया कराए. चीन के औद्योगीकरण में सोवियत मदद की बड़ी भूमिका रही.
चीन और सोवियत संघ में दरार की कहानी
1953 में स्टालिन की मौत के बाद सोवियत संघ की सत्ता निकिता खुर्श्चेव के हाथों में आई. ख्रुश्चेव हालांकि उदारवादी माने जाते थे और पश्चिमी देशों के साथ 'शांतिपूर्ण संबंध' की नीति चाहते थे, लेकिन माओ की सोच बिल्कुल अलग थी. उन्होंने 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' जैसी कट्टर आर्थिक नीति लागू की, जिसका उद्देश्य तेजी से औद्योगीकरण था. इस नीति ने चीन में भयानक अकाल पैदा किया और लाखों लोगों की मौत हुई.
माओ को लगा कि सोवियत संघ साम्यवाद के मूल सिद्धांतों से भटक रहा है. उन्होंने ख्रुश्चेव पर 'संशोधनवाद' (Revisionism) का आरोप लगाया. दूसरी तरफ मॉस्को को लगा कि चीन अत्यधिक कट्टर और अस्थिर दिशा में जा रहा है. यहीं से दोनों देशों के रिश्तों में बड़ी दरार शुरू हुई. 1960 के दशक तक हालात इतने बिगड़ गए कि दोनों देशों ने एक-दूसरे को वैचारिक दुश्मन मानना शुरू कर दिया.
सोवियत संघ और चीन के बीच सीमा विवाद
सोवियत संघ और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से मौजूद था. 1969 में यह तनाव खुली सैन्य झड़प में बदल गया. दोनों देशों की सेनाएं उसूरी नदी के पास मौजूद झेनबाओ द्वीप पर भिड़ गईं. इस संघर्ष में दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिक मारे गए. यह शीत युद्ध के दौरान साम्यवादी दुनिया के भीतर सबसे बड़ा सैन्य टकराव माना जाता है. उस समय चीन में सांस्कृतिक क्रांति चल रही थी और देश भारी राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था. कई इतिहासकार मानते हैं कि माओ इस टकराव के जरिए चीन के भीतर राष्ट्रवादी एकता पैदा करना चाहते थे.
परमाणु युद्ध की थी आशंका
सोवियत संघ ने चीन को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाया. ऐसी आशंकाएं तक पैदा हो गईं कि मॉस्को चीन पर परमाणु हमला कर सकता है. इसके बाद चीन ने अपने औद्योगिक ढांचे को देश के अंदरूनी हिस्सों में शिफ्ट करना शुरू किया ताकि संभावित युद्ध की स्थिति में नुकसान कम हो. 1960 और 70 के दशक में चीन को एहसास हुआ कि वह एक साथ अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से मुकाबला नहीं कर सकता. ऐसे में उसने रणनीतिक बदलाव किया.
अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस मौके को समझा और चीन के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की. 1972 में निक्सन की ऐतिहासिक चीन यात्रा हुई. इसके बाद अमेरिका और चीन के संबंध तेजी से सुधरे. इस बदलाव का सबसे बड़ा नुकसान सोवियत संघ को हुआ. चीन और अमेरिका की नजदीकी ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति का संतुलन बदल दिया.
1976 में माओ की मौत के बाद डेंग जिओपिंग के नेतृत्व में चीन ने बाजार आधारित आर्थिक सुधार शुरू किए. चीन धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा केंद्र बन गया.
1991, सोवियत संघ का टूटना और चीन से करीबी
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस आर्थिक और राजनीतिक संकट में फंस गया. दूसरी ओर चीन तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति बन चुका था. 2001 में रूस और चीन ने “ट्रीटी ऑफ गुड-नेबरलिनेस एंड फ्रेंडली कोऑपरेशन” पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत होते गए. बीते दो दशकों में अमेरिका और चीन के रिश्तों में जहां तनाव बढ़ा दिखाई दिया. वहीं यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगे. ऐसे में रूस को चीन की और ज्यादा जरूरत पड़ने लगी.
आज चीन रूस के लिए बड़ा व्यापारिक साझेदार है. चीन रूस से तेल और गैस खरीद रहा है, जबकि रूस चीन को रक्षा और विमानन तकनीक उपलब्ध करा रहा है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी दबाव झेल रहे रूस के लिए चीन आर्थिक सहारा बन गया है. 70 साल पहले माओ मॉस्को गए थे और उन्हें इंतजार करवाया गया था. आज हालात बिल्कुल उलट हैं. अब रूस को चीन की जरूरत ज्यादा है. जब शी जिनपिंग हाल ही में रूस पहुंचे तो वहां रेड कार्पेट बिछा था, भव्य स्वागत हुआ और दोनों नेताओं ने 'सीमाहीन दोस्ती' की बात की.
हालांकि इतिहास बताता है कि रूस और चीन की दोस्ती हमेशा स्थायी नहीं रही. दोनों देश वैचारिक टकराव, सीमा युद्ध और वैश्विक प्रभुत्व की लड़ाई भी लड़ चुके हैं. लेकिन मौजूदा दौर में अमेरिका और पश्चिमी देशों के बढ़ते दबाव ने दोनों को फिर एक-दूसरे के करीब ला दिया है.
विकास पोरवाल