पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में स्वीकार किया कि अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान उसकी जंगों में शामिल हुआ और उसका खामियाजा अब तक भुगत रहा है. उन्होंने अमेरिका पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यूएस ने पाकिस्तान का इस्तेमाल 'टॉयलेट पेपर से भी बदतर' तरीके से किया. यानी जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया.
ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान युद्ध (खासकर 2001 के बाद) का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए 'रेंटेड वॉर' लड़ी, यानी अमेरिका के हितों के लिए जंग लड़ी.
उन्होंने इसे 'Made in America jihad' बताया और माना कि पाकिस्तान ने तालिबान के खिलाफ जाकर अमेरिका का साथ दिया, लेकिन बदले में अमेरिका ने पाकिस्तान को छोड़ दिया.
उनके शब्दों में, 'अमेरिका ने पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल किया और इस्तेमाल के बाद कूड़े में फेंक दिया. इससे पाकिस्तान में हिंसा, आर्थिक अस्थिरता और लंबे समय तक नुकसान हुआ.'
उन्होंने पाकिस्तान के पूर्व तानाशाहों जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ पर भी निशाना साधा और कहा कि ये फैसले उनकी राजनीतिक मजबूती के लिए थे, न कि इस्लाम या धर्म के लिए.
आसिफ ने ये भी स्वीकार किया कि पाकिस्तान अक्सर अपने अतीत की गलतियों (आतंकवाद को सपोर्ट) से इनकार करता है, जो और ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.
क्या पाकिस्तान अमेरिका-चीन की 'बटरिंग' में फंस गया?
आसिफ का ये बयान पाकिस्तान के पुराने दर्द को उकेरने वाला है. 9/11 के बाद पाकिस्तान अमेरिका का 'मुख्य नॉन-नाटो सहयोगी' बना, लेकिन अमेरिका ने 2010 के दशक में उसे सहायता देनी बंद कर दी. पाकिस्तान के साथ होने वाले F-16 जैसे समझौते रोके, और पाकिस्तान पर आतंकवाद के आरोप लगाए.
ट्रंप से पहले जो बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान को एक तरह से अलग-थलग कर दिया था. बाइडेन ने अपने प्रशासन के पहले तीन सालों में तो पाकिस्तान की लीडरशिप के साथ कोई संबंध ही नहीं रखा और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को लगातार टार्गेट किया था.
इसी दौरान अमेरिका अफगानिस्तान से निकल गया और इस संबंध में पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत नहीं की जिससे पाकिस्तान को करारा झटका लगा.
2022 की गर्मियों में पाकिस्तान में भयंकर बाढ़ आई जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा. लेकिन तब भी जो बाइडेन ने पाकिस्तान की सरकार को फोन कर हालचाल नहीं पूछा.
फायदे का दोस्त है चीन
वहीं, चीन की बात करें तो पाकिस्तान उसे अपना सदाबहार दोस्त मानता है. लेकिन चीन के लिए पाकिस्तान प्राकृतिक संसाधनों की खान और उसके बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का मोहरा भर है. BRI चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जिसका फ्लैगशिप प्रोजेक्ट CPEC पाकिस्तान में है. चीन पाकिस्तान को अपने हथियार भी बेचता है.
पाकिस्तान को CPEC के अलावा मिलिट्री हार्डवेयर (JF-17, सबमरीन्स), और इकोनॉमिक सपोर्ट चीन से मिलता है.
अमेरिका-चीन के बीच फंस गया पाकिस्तान?
दुनिया की दो महाशक्तियों को एक साथ साधने की फिराक में पाकिस्तान फंस गया है. अमेरिका भारत के करीब आ रहा है जिससे पाकिस्तान असहज है. चीन CPEC से पाकिस्तान को बांधे रखता है, लेकिन पाकिस्तान IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, जिस पर अमेरिका का प्रभाव है) के बेलआउट के लिए अमेरिका पर निर्भर रहता है.
पाकिस्तान दोनों से बैलेंस करने की कोशिश करता है, लेकिन आर्थिक संकट में फंसकर दोनों तरफ से दबाव झेल रहा है.
नाकाम विदेश नीति पर अब भड़ास निकाल रहे आसिफ
आसिफ का 'टॉयलेट पेपर' वाला बयान पाकिस्तान की विदेश नीति की विफलता को दिखाता है. ये कोई नई बात नहीं बल्कि पाकिस्तान लंबे समय से सुपरपावरों के बीच बैलेंस करने में फंसा है.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अमेरिकी राष्ट्रपति को मक्खन लगा रहे हैं. व्हाइट हाउस पहुंचकर उन्होंने ट्रंप को पाकिस्तान के खनिज संसाधनों का तोहफा भी पेश किया है. इन सबके बीच आसिफ का अमेरिका पर नाराज होना पाकिस्तान की विदेश नीति पर बड़े सवाल खड़े करता है.
राधा कुमारी