नेपाल में बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ जन आक्रोश तेजी से बढ़ रहा है. बालेन शाह को अभी सत्ता संभाले एक महीना भी नहीं हुआ लेकिन उनके खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ना शुरू हो गया है. काठमांडू समेत कई शहरों में छात्र, राजनीतिक दल और आम लोग सड़कों पर उतरकर प्रोटेस्ट कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या बालेन शाह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जैसी गलती कर रहे हैं.
बालेन शाह की नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी है. नेपाल सरकार ने 100 रुपये से ज्यादा कीमत वाले सामान पर शुल्क लगा दिया है. इससे रोजमर्रा के सामान की कीमतें प्रभावित हो रही हैं. प्रोटेस्ट कर रहे लोगों का कहना है कि इस फैसले से आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ने लगा है.
नेपाल में जनता सिर्फ कस्टम ड्यूटी बढ़ाने के फैसले पर ही नाराज नहीं है. छात्रों में भी बड़े पैमाने पर नाराजगी है. बालेन शाह सरकार के कड़े रुख की वजह से छात्र संगठनों में नाराजगी चरम पर है. छात्र संगठनों का कहना है कि सरकार हमसे सीधे बातचीत करने के बजाए दबाव की रणनीति अपना रही है. इससे देशभर में छात्र सड़कों पर उतरे हैं. बालेन शाह सरकार में गृहमंत्री सुदन गुरुंग पर आय से अधिक संपत्ति और वित्तीय लेनदेन के आरोपों से भी जनता में नाराजगी है. प्रोटेस्ट कर रहे लोग गुरंग के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
नेपाल में बड़े पैमाने पर चल रहे इन प्रोटेस्ट को देखकर सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या बालेन शाह कहीं डोनाल्ड ट्रंप की राह पर तो आगे नहीं बढ़ गए? डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद अमेरिकाज फर्स्ट की पॉलिसी पर आगे बढ़ते हुए देश में इंपोर्ट होने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगा दिया था. लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसके साइड इफेक्ट्स देखने को मिले. देश में बेतहाशा महंगाई बढ़ी. कुछ ऐसा ही नेपाल में भी दिखने लगा है, खासकर कस्टम ड्यूटी बढ़ने से भारतीय सामान की कीमतों पर असर पड़ेगा.
नेपाल में कस्टम ड्यूटी बढ़ने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर साफ दिख रहा है, खासकर तब जब बाजार पहले से ही भारतीय सामान पर काफी निर्भर रहा है. पहले जो सामान भारत से सस्ता और आसानी से मिल जाता था, अब उस पर कई स्तर के टैक्स लगने से कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं. सामान्य तौर पर 1000 रुपये का कोई सामान नेपाल पहुंचते-पहुंचते 1500 से 1600 रुपये तक का हो जाता है, क्योंकि उस पर 15 से 30 फीसदी कस्टम ड्यूटी, लगभग 13 फीसदी वैट और अन्य चार्ज जुड़ जाते हैं. इसका मतलब है कि एक औसत उपभोक्ता को रोजमर्रा की चीजों के लिए 30 से 60 फीसदी तक ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है.
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि 100 रुपये की सीमा इतनी कम है कि राशन का मामूली सामान लाने पर भी उन्हें टैक्स चुकाना पड़ रहा है. स्थानीय लोग इसे नाकेबंदी करार दे रहे हैं क्योंकि इससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा है.
वहीं, बालेन शाह इस फैसले को स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने से जोड़ रहे हैं. नेपाल सरकार का तर्क है कि इंपोर्टेड सामान महंगा होगा, तो स्थानीय उत्पादन को मौका मिलेगा और नेपाल आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा. टैरिफ को लेकर ट्रंप प्रशासन की भी यही सोच थी लेकिन सवाल यह है कि क्या नेपाल की अर्थव्यवस्था इतनी तैयार है कि वह इस बदलाव को संभाल सके?
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