मिडिल ईस्ट में महायुद्ध और भीषण होता जा रहा है. ईरानी गैस फील्ड पर इजरायली हमले और ईरानी काउंटर अटैक के बाद अब यह तेल युद्ध में तब्दील हो गया है. इस बीच ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में हजारों अमेरिकी सैनिक भेज रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि अब यह जंग किस ओर जाएगी. राष्ट्रपति ट्रंप इस युद्ध को कहां तक ले जाएंगे और कब खत्म करेंगे... इसका जवाब अब तक नहीं मिल पा रहा है.
अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, युद्ध शुरू हुए दो हफ्तों से अधिक समय बीत चुका है. डोनाल्ड ट्रंप को अब फैसला लेना है. उनके सामने दुविधा है- महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लड़ाई जारी रखें या जीत का दावा करके पीछे हट जाएं.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों ऑप्शन में रिस्क हैं. शायद ट्रंप के सलाहाकारों ने युद्ध के नतीजों को शुरुआत में कम आंका था. जंग जारी रखने से अधिक अमेरिकी सैनिकों की जान खतरे में पड़ सकती है. साथ ही आर्थिक और सैन्य खर्च बढ़ सकता है.
पूरी दुनिया में तेल संकट
इसके अलावा अमेरिकी सहयोगियों के रिशते और वैश्विक स्थिरता पर असर पड़ सकता है. गैस फील्ड पर हमले और होर्मुज स्ट्रीट में नाकेबंदी से दुनिया में तेल संकट बढ़ गया है.
हालांकि अमेरिका–इज़राइल के हमलों ने ईरान को भी भारी चोट पहुंचाई है. ईरान के मिसाइल सिस्टम, एयरफोर्स और नेवी को जबरदस्त नुकसान हुआ है.
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के पीछे हटने से खतरा भी है. जंग में अमेरिका इतना आगे बढ़ चुका है कि अचानक कदम पीछे करने से मुख्य उद्देश्यों को पूरा न कर पाने का खतरा है. जैसे- ईरान को परमाणु क्षमता विकसित करने से रोकना, क्षेत्रीय सुरक्षा लक्ष्यों को सुनिश्चित करना शामिल है.
अमेरिका में जंग पर बहस
इस युद्ध ने अमेरिका की भी चिंता बढ़ा दी है. जंग की बढ़ती लागत और जनमत के दबाव को ट्रंप प्रशासन के लिए अनदेखी करना मुश्किल होगा.
ऐसे में ट्रंप जोखिम भरे युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीतिक सफलता के बिना बाहर निकलने के बीच फंसे हुए हैं. यह उनके दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के सबसे कठिन फैसलों में माना जा रहा है.
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