चीन का डबल स्टैंडर्ड... ईरान के ब्लॉकेड पर साइलेंट, अमेरिकी नाकेबंदी पर जता रहा आपत्ति

मिडल ईस्ट की जंग में चीन का दोहरा चेहरा सामने आया है. जब ईरान समुद्र का रास्ता रोक रहा था तब चीन खामोश था, लेकिन अब अमेरिका की नाकेबंदी पर उसे शांति की याद आ रही है. दरअसल, चीन को डर है कि अगर उसने ईरान की मदद की तो अमेरिका उस पर टैक्स लगा देगा. इसके बावजूद चीन ने साफ कर दिया है कि वह अपनी तेल की जरूरतों के लिए अमेरिका के आगे नहीं झुकेगा और हॉर्मुज के रास्ते ईरान से व्यापार जारी रखेगा.

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प की धमकी का चीन पर असर नहीं? हॉर्मुज में तनातनी. (Photo: Reuters) प की धमकी का चीन पर असर नहीं? हॉर्मुज में तनातनी. (Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:20 PM IST

दुनिया की डिप्लोमेसी में इस वक्त क्या हो रहा है किसी को समझ में नहीं आ रहा. एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को किसी भी सूरत में बख्शने को तैयार नहीं हैं और होर्मुज स्ट्रेट में ब्लॉकेड के जरिए तेल के व्यापार को पूरी तरह रोकने को तैयार दिख रहे हैं तो दूसरी ओर चीन के साथ तल्खी बढ़ती जा रही है अमेरिका की. लेकिन चीन के डबल स्टैंडर्ड की सबसे ज्यादा चर्चा है. जो चीन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 40 दिन से चल रहे ईरानी ब्लॉकेड और टोल पर चुप था अचानक अमेरिका के ब्लॉकेड पर तमतमा उठा है. चीन ने अमेरिका से कहा है कि होर्मुज के अमेरिकी ब्लॉकेड से ईरान के साथ उसके द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन हो रहा है और खत्म होना चाहिए. लेकिन यही चीन 40 दिन से ईरान के ब्लॉकेड पर चुप था. ईरानी ब्लॉकेड के कारण पूरी दुनिया में तेल और एलपीजी का संकट उत्पन्न हो रहा था लेकिन चीन तब कुछ भी नहीं बोल रहा था.

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न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, वॉशिंगटन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता लियू पेंग्यु ने साफ-साफ कहा कि दुनिया में जो तेल और पेट्रोल-डीजल की कमी हो रही है, उसकी असली वजह मिडल ईस्ट की जंग है. 

ये सारा मामला तब और बढ़ गया जब अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने चीन की आलोचना की. उन्होंने चीन को अविश्वसनीय पार्टनर बताते हुए आरोप लगाया कि चीन जानबूझकर तेल का स्टॉक जमा कर रहा है और जरूरी सामानों के एक्सपोर्ट पर रोक लगा रहा है. इसके जवाब में चीन अब खुद को शांति चाहने वाला देश दिखाने की कोशिश कर रहा है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तो शांति के लिए एक 'चार सूत्री प्रस्ताव' पेश किया है, जिसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों और देशों की आजादी का हवाला दिया है. सीधी बात यह है कि ये पावर की लड़ाई है, जहां हर देश अपना फायदा देख रहा है.

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दरअसल, चीन की इस घबराहट के पीछे डोनाल्ड ट्रंप की वो कड़ी चेतावनी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर चीन ने ईरान की सैन्य मदद की, तो उसे इसके बुरे नतीजे भुगतने होंगे. उन्होंने साफ लहजे में कहा था कि अगर चीन ऐसा करते पकड़ा गया, तो उस पर 50 प्रतिशत का भारी-भरकम टैक्स लगा दिया जाएगा. यह एक ऐसी चोट है जो चीन के व्यापार को पूरी तरह बर्बाद कर सकती है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि चीन अब इन धमकियों के बावजूद खुलकर ईरान के साथ खड़ा नजर आ रहा है.

चीन के रक्षा मंत्री डोंग जून ने सख्त लहजे में अमेरिका को चेतावनी दी है कि उनके जहाज हॉर्मुज के रास्ते से लगातार आते-जाते रहेंगे. उनका कहना है कि ईरान के साथ चीन के व्यापार और तेल के समझौते हैं और वे उन्हें हर हाल में पूरा करेंगे. चीन ने सीधे-सीधे कह दिया है कि हॉर्मुज का रास्ता चीन के लिए खुला है और कोई दूसरा उनके काम में दखल न दे. जिस वक्त सोमवार शाम को अमेरिका ने अपनी समुद्री नाकेबंदी शुरू की, ठीक उसी वक्त चीन की यह धमकी भी सामने आ गई.

बता दें कि चीन का यह तरीका पुराना है. जब फरवरी में यह झगड़ा शुरू हुआ था, तब चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा था कि किसी देश के नेता की हत्या करना और वहां की सरकार बदलने की कोशिश करना गलत है. अब हॉर्मुज में जारी इस तनातनी के बीच चीन ने साफ कर दिया है कि वह अपनी तेल की जरूरतों के लिए अमेरिका के आगे नहीं झुकने वाला. कुल मिलाकर बात यह है कि चीन एक तरफ तो शांति की अपील कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ वह मिडल ईस्ट में अमेरिका को कमजोर कर अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है.

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