इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में दागी मिसाइलें, रूस-ईरान के हथियार सप्लाई लाइन पर अटैक का दावा

मिडिल ईस्ट जंग के बीच इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में हमला कर रूस-ईरान की हथियार सप्लाई लाइन को निशाना बनाया है. यह रूट ड्रोन, गोला-बारूद और सैन्य तकनीक की सप्लाई के लिए बेहद अहम था. इस स्ट्राइक से जंग का दायरा और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.

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इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में हमले किए हैं. (File Photo) इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में हमले किए हैं. (File Photo)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:24 AM IST

मिडिल ईस्ट की जंग अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इसकी सीमाएं लगातार टूटती नजर आ रही हैं. इजरायल ने पहली बार कैस्पियन सागर में हमला कर रूस और ईरान के बीच चल रही एक बेहद अहम हथियार सप्लाई लाइन को निशाना बनाया है. यह हमला सिर्फ एक सैन्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक बड़ा स्ट्रैटेजिक मैसेज भी है, अब जंग पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकल चुकी है.

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कैस्पियन सागर, जो दुनिया का सबसे बड़ा इनलैंड वाटर बॉडी माना जाता है, लंबे समय से रूस और ईरान के बीच एक सुरक्षित कॉरिडोर बना हुआ था. यह इलाका अमेरिकी नौसेना की पहुंच से भी बाहर माना जाता है, जिससे दोनों देशों को यहां बिना ज्यादा खतरे के हथियारों और सामान की सप्लाई करने की छूट मिलती थी.

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इसी रूट का इस्तेमाल कर ड्रोन, आर्टिलरी शेल्स और लाखों राउंड गोला-बारूद भेजे जा रहे थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 3 लाख से ज्यादा आर्टिलरी शेल्स और करीब 10 लाख राउंड इसी रास्ते से ट्रांसफर किए गए.

रूस-ईरान के बीच अहम सप्लाई लाइन पर हमला

खास तौर पर ईरान के "शाहेद ड्रोन" इस सप्लाई चेन की सबसे अहम कड़ी बन चुके थे. रूस इन ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के शहरों पर हमले में कर रहा है, जबकि ईरान इन्हें खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर निशाना बनाने में इस्तेमाल कर रहा है.

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इसी नेटवर्क को तोड़ने के लिए इजरायल ने ईरान के कैस्पियन तट पर स्थित बंदरगाह बंदर अंजली पर हमला किया. इस हमले में वॉरशिप, नेवल कमांड सेंटर, शिपयार्ड और रिपेयर फैसिलिटीज समेत दर्जनों सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. विजुअल सबूतों में कई जहाजों के तबाह होने और नेवल इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान दिखा.

रूस जंग में ईरान को कर रहा सपोर्ट

इस पूरे घटनाक्रम ने रूस और ईरान के बढ़ते सैन्य गठजोड़ को भी उजागर कर दिया है. जंग के दौरान रूस ने ईरान को सैटेलाइट इंटेलिजेंस और एडवांस ड्रोन टेक्नोलॉजी दी, जिससे हमलों की सटीकता और ताकत दोनों बढ़ी. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले का मकसद सिर्फ सप्लाई रोकना नहीं, बल्कि ईरान की समुद्री सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर करना भी था.

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इस स्ट्राइक का असर सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक भी हो सकता है. यही रूट गेहूं और अन्य जरूरी सामान के व्यापार से भी जुड़ा था. ऐसे में ड्रोन सप्लाई के साथ-साथ फूड सिक्योरिटी पर भी असर पड़ सकता है. रूस ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और इसे एक सिविलियन ट्रेड हब पर हमला बताया है. मॉस्को ने चेतावनी दी है कि इस तरह की कार्रवाई जंग को और ज्यादा फैलाएगी.

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हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह असर पूरी तरह स्थायी नहीं होगा. रूस और ईरान वैकल्पिक रास्ते तलाश सकते हैं. लेकिन इतना तय है कि इज़रायल ने यह दिखा दिया है कि वह दूर और अप्रत्याशित इलाकों में भी हमला करने की क्षमता रखता है. अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक चेतावनी थी, या आने वाले दिनों में ऐसे और हमले देखने को मिल सकते हैं.

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