1991 के खाड़ी युद्ध जैसा हाल... नहीं थमी ईरान की जंग तो गल्फ मुल्कों में आएगी भारी आर्थिक तबाही

ईरान में जारी जंग का असर अब खाड़ी देशों पर साफ दिखने लगा है. तेल उत्पादन, पर्यटन और ट्रैवल जैसे अहम सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह जंग जल्द नहीं रुकी, तो हालात 1991 के खाड़ी युद्ध जैसे हो सकते हैं, जिससे गल्फ देशों की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.

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ईरान युद्ध का दंश झेल रहे खाड़ी मुल्क.(Photo- ITG) ईरान युद्ध का दंश झेल रहे खाड़ी मुल्क.(Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:51 AM IST

मिडिल ईस्ट में कमोबेश तीन हफ्तों से जारी जंग सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है. अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान के अलग-अलग हिस्सों में बमबारी कर रहे हैं. इस हमले का सीधा असर ईरान पर तो पड़ ही रहा है, लेकिन इसका झटका खाड़ी देशों को भी तेजी से महसूस होने लगा है. ईरान खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है. हालांकि खाड़ी देशों का कहना है कि इन हमलों से उनके अपने शहर, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है.

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दरअसल, ये वही खाड़ी देश हैं - सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान - जिनकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल उत्पादन, पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर टिकी हुई है. लेकिन जंग के चलते अब इन तीनों सेक्टर पर गहरा असर पड़ा है. हालात ऐसे हो गए हैं कि जो शहर कभी दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक और यात्रा केंद्र माने जाते थे, वहां अब सन्नाटा छाने लगा है.

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इस जंग का सबसे बड़ा असर तेल उत्पादन पर पड़ा है. आमतौर पर खाड़ी देश मिलकर रोजाना करीब 21 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करते हैं. लेकिन युद्ध शुरू होने के कुछ ही दिनों में यह घटकर करीब 14 मिलियन बैरल रह गया. होर्मुज स्ट्रेट के ठप पड़ने की वजह से सबसे ज्यादा तेल उत्पादन प्रभावित हुआ है.

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कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों के लिए बड़ी मुसीबत

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग माना जाता है, जहां से बड़ी संख्या में तेल टैंकर गुजरते हैं. लेकिन अब सुरक्षा खतरे के कारण कई जहाज इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो तेल उत्पादन घटकर सिर्फ 6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक आ सकता है, जो एक बड़ा आर्थिक झटका होगा.

हालांकि, सऊदी अरब और यूएई ने वैकल्पिक पाइपलाइन तैयार कर रखी हैं, जिससे वे कुछ हद तक तेल सप्लाई जारी रख सकते हैं. लेकिन कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं, इसलिए वे इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.

खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 10 से 15% तक सिकुड़ सकती है

आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि, अगर जंग अप्रैल के अंत तक जारी रहती है, तो कतर और कुवैत की अर्थव्यवस्था में 14% तक गिरावट आ सकती है. वहीं यूएई को 5% और सऊदी अरब को 3% तक का नुकसान हो सकता है. अगर यह संघर्ष तीन महीने तक चलता है, तो पूरे खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 10 से 15% तक सिकुड़ सकती है.

पर्यटन और ट्रैवल सेक्टर ठप

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तेल के अलावा पर्यटन और ट्रैवल सेक्टर भी लगभग ठप हो गया है. खाड़ी देशों की जीडीपी में करीब 11% हिस्सा पर्यटन का होता है, लेकिन अब हालात यह हैं कि 10 दिनों के अंदर ही 37,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द करनी पड़ीं. दुबई जैसे बड़े एयरपोर्ट को भी ड्रोन हमले के बाद कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा.

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होटल, शॉपिंग मॉल और बड़े इवेंट्स खाली पड़े हैं. वर्ल्ड ट्रैवल एंड टूरिज्म काउंसिल के मुताबिक, सिर्फ पर्यटकों के न आने से ही खाड़ी देशों को हर दिन करीब 600 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है. इस बीच इराक भी इस संकट से अछूता नहीं है. तेल उत्पादन में 70% तक की गिरावट के कारण इराक को रोजाना करीब 3 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उसकी अर्थव्यवस्था इस साल 3.5% तक सिकुड़ सकती है.

लंबी चली जंग तो 1991 के खाड़ी युद्ध जैसा होगा हाल

हालांकि, कुछ राहत की बात यह है कि खाड़ी देशों के पास पहले से जमा बड़ी आर्थिक बचत है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर जंग जल्द खत्म हो जाती है, तो ये देश इस संकट से उबर सकते हैं. लेकिन खतरा अभी भी बना हुआ है. विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर यह जंग लंबी चली, तो हालात 1991 के खाड़ी युद्ध जैसे हो सकते हैं जब पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान झेलना पड़ा था.

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फिलहाल, खाड़ी देश एक ऐसी जंग की कीमत चुका रहे हैं, जो सीधे तौर पर उनकी नहीं है. लेकिन इसका असर उनकी अर्थव्यवस्था, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी पर गहराई से पड़ रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह संकट कितना लंबा चलता है और क्या ये देश इससे जल्दी उबर पाते हैं या नहीं.

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