मिडिल ईस्ट में फंस गया अमेरिका? इजरायल पर ईरान के अटैक से पहले अरब देशों ने दी थी सख्त चेतावनी

इजरायल ने 1 अप्रैल को सीरिया में ईरान के एंबेसी को ड्रोन अटैक में ध्वस्त कर दिया था, जिसमें एक ईरानी कमांडर की मौत हो गई थी. अब इसका जवाब ईरान ने 300 मिसाइलों से दिया, जिसके बाद क्षेत्र में हालात बिगड़ने की आशंका है. हालांकि, इससे पहले ही खाड़ी मुल्कों ने अमेरिका को एक सख्त चेतावनी दी थी, जिससे मिडिल ईस्ट में अमेरिका फंसा हुआ नजर आ रहा है.

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F16 (सांकेतिक तस्वीर) (Photo: Reuters) F16 (सांकेतिक तस्वीर) (Photo: Reuters)

एम. नूरूद्दीन

  • नई दिल्ली,
  • 14 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 10:07 PM IST

इजरायल-हमास की जंग अब क्षेत्रीय संघर्ष में तब्दील होता नजर आ रहा है. इजरायल लगातार ईरान के खिलाफ 'उकसावे वाली कार्रवाई' कर रहा है. इजरायल ने सीरिया में ईरानी एंबेसी को भी ध्वस्त कर दिया. इसका जवाब अब ईरान ने 300 मिसाइलों से दिया. साथ ही चेतावनी दी कि अगर इस जवाबी कार्रवाई का जवाब दिया जाता है तो वे भी शांत नहीं बैठेंगे. हालांकि, इससे पहले ही खाड़ी मुल्कों ने अमेरिका को एक सख्त चेतावनी दी.

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सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, ओमान और कुवैत ने अमेरिका के सामने स्पष्ट कर दिया था कि ईरान पर जवाबी हमले के लिए उनकी टेरिटरी का इस्तेमाल ना किया जाए. वे ईरान पर संभावित रूप से जवाबी हमले के लिए भी अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने क्षेत्र में उड़ान भरने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

खाड़ी मुल्कों की चिंता इस बात को लेकर है कि अगर अमेरिका ईरानी पर जवाबी कार्रवाई के लिए अपने खाड़ी एयर या नवल बेस का इस्तेमाल करता है, तो वे भी उस संभावित हमले में उसके एक सहयोगी बन जाएंगे - जिससे वे बचना चाहते हैं.

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'टेरिटरी में बने मिलिट्री बेस का इस्तेमाल ना करें'

मिडिल ईस्ट पर नजर रखने वाली मीडिया ऑर्गेनाइजेशन मिडिल ईस्ट आई की 13 अप्रैल की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अरब मुल्कों ने अपील की थी कि ईरान पर कार्रवाई के लिए अमेरिका उनके क्षेत्रों में बने मिलिट्री बेस का इस्तेमाल ना करें. गौरतलब है कि अमेरिका अरब मुल्कों का सबसे बड़ा सिक्योरिटी प्रोवाइडर है. सऊदी से लेकर यूएआई और ओमान तक में उसके मिल्ट्री बेस हैं, जहां ईरान को ध्यान में रखकर उसने दशकों से भारी निवेश किया है.

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खाड़ी मुल्क अमेरिका का लॉन्चिंग पैड

रिपोर्ट की मानें तो अमेरिका भी मानता है कि ईरान पर जवाबी हमले के लिए नजदीक होने के नाते खाड़ी मुल्कों में बने मिलिट्री बेस ईरान पर अटैक के लिए कारगर लॉन्चिंग पैड साबित हो सकते हैं. मिडिल ईस्ट में अमेरिका ने कमोबेश 40 हजार सैनिकों की तैनाती कर रखी है. इनमें से अधिकांश सैनिकों की तैनाती खासतौर पर खाड़ी मुल्कों में हैं, जहां अमेरिका के कई रणनीतिक एयर और नवल बेस भी हैं.

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खाड़ी मुल्कों में अमेरिकी एयर-नवल बेस

सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस, कतर के अल उदीद, यूएई के अल धफरा और कुवैत के अली अल-सलेम एयर बेस शामिल हैं.  यहां अमेरिका ने F-16 और F-35 फाइटर जेट्स से लेकर रीपर ड्रोन तक की तैनाती कर रखी है. कतर में अमेरिकी एयर बेस पर लंबे समय तक इजरायली सैन्य अधिकारियों की भी तैनाती रही है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक अभी स्पष्ट नहीं है कि इजरायली सेना के अधिकारी अब भी वहां तैनात हैं या नहीं.

जब यूएई ने अमेरिकी कार्रवाई को रोका

यह पहली बार नहीं है जब किसी खाड़ी मुल्क ने अमेरिका को उसके अपने ही एयर बेस का इस्तेमाल करने से रोका है. ईरान के सहयोगी, मसलन लेबनान के हिज्बुल्लाह, यमन के हूती और इराक के शिया समूह इजरायल पर लगातार या तो हमले या हमले की चेतावनी दे रहे हैं, जिसपर अमेरिका के जवाबी हमले को यूएआई ने फरवरी महीने में वीटो कर दिया था.

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सऊदी-यूएई और ईरान के संबंध

खाड़ी मुल्कों, खासतौर पर सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात की वर्षों से शिकायत रही है कि अमेरिका ने ईरानी हमलों से उन्हें बचाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया है और पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं. मसलन, सऊदी और यूएई का कहना है कि हूती की तरफ से उनपर अक्सर ड्रोन या मिसाइल हमले किए जाते हैं, जिसे रोक पाने में बाइडेन प्रशासन सुस्त रहा. कहा जाता है कि यही वजह रही कि वे अब ईरान के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश में लगे हैं.

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