फारस की खाड़ी में इस छोटे द्वीप पर US-इजरायल की नजर... ट्रंप ने 40 साल पहले दी थी कब्जे की धमकी

फारस की खाड़ी में स्थित ईरान का खार्ग द्वीप अचानक वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है. अमेरिका और इजरायल इस रणनीतिक तेल टर्मिनल पर कब्जे के विकल्प पर चर्चा कर चुके हैं. दिलचस्प बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने 1988 में भी खार्ग द्वीप पर हमला कर कब्जा करने की बात कही थी.

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ट्रंप ने 1988 में कहा था कि वह होते तो खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लेते. (Photo- Google Earth) ट्रंप ने 1988 में कहा था कि वह होते तो खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लेते. (Photo- Google Earth)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:09 AM IST

फारस की खाड़ी में स्थित ईरान का छोटा सा खार्ग द्वीप इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नया केंद्र बन गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और इजरायल इस रणनीतिक द्वीप पर कब्जा करने की संभावना पर चर्चा कर चुके हैं. यह वही द्वीप है जहां से ईरान अपने करीब 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात करता है.

दिलचस्प बात यह है कि इस द्वीप पर कब्जा करने का विचार बिल्कुल नया नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने करीब 40 साल पहले, यानी 1988 में ही इस तरह की मंशा जाहिर की थी.

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ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने उस समय कहा था, “मैं ईरान के साथ सख्ती से पेश आता. वे हमें मनोवैज्ञानिक रूप से परेशान करते हैं और हमें मूर्ख दिखाने की कोशिश करते हैं.” उन्होंने आगे कहा था, “अगर हमारे किसी आदमी या जहाज पर एक भी गोली चलती, तो मैं खार्ग द्वीप पर बड़ा हमला करता. मैं वहां जाता और उसे अपने कब्जे में ले लेता.”

खार्ग द्वीप को कब्जा करने पर US-इजरायल की बातचीत

अब जब अमेरिका और इजरायल के बीच इस द्वीप को लेकर चर्चा की खबरें सामने आई हैं, तो ट्रंप के पुराने बयान फिर से सुर्खियों में आ गए हैं. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में अमेरिका और इजरायल के अधिकारियों ने खार्ग द्वीप पर कब्जा करने के विकल्प पर बातचीत की थी.

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खार्ग द्वीप फारस की खाड़ी में ईरान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यह देश का सबसे बड़ा तेल निर्यात टर्मिनल है और ईरान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इसी पर टिका हुआ है. अगर इस द्वीप को नुकसान पहुंचता है या यह बंद हो जाता है, तो ईरान के तेल निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है.

ट्रंप का 1988 का बयान उस समय आया था जब ईरान-इराक युद्ध अपने आखिरी दौर में था. यह युद्ध ईरान और इराक के शासक सद्दाम हुसैन के बीच लड़ा गया था और इसमें करीब पांच लाख लोगों की जान गई थी. उस दौर में अमेरिका की नौसेना फारस की खाड़ी में जहाजों की सुरक्षा कर रही थी और उसने कई बार ईरान के तेल ठिकानों और समुद्री सुरंगों पर हमले भी किए थे.

जब ईरान में आई इस्लामी सत्ता

अमेरिका और ईरान के रिश्तों में तनाव की जड़ें काफी पुरानी हैं. 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के दौरान अमेरिका समर्थित शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता गिरा दी गई थी और इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई थी. उसी साल तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया और 66 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया गया. इनमें से 52 लोगों को 400 से ज्यादा दिनों तक कैद में रखा गया था. इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया.

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अमेरिका-इजरायल ने ईरान को बेचे हथियार

इतिहास में ऐसे मौके भी आए जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान को हथियार बेचे. ईरान-कॉन्ट्रा कांड के दौरान कुछ गुप्त हथियार सौदों के जरिए निकारागुआ के विद्रोहियों को मदद दी गई थी.

आज जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, तो खार्ग द्वीप की रणनीतिक अहमियत और भी बढ़ गई है. फारस की खाड़ी का होर्मुज स्ट्रेट भी इसी इलाके में है, जहां से दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई गुजरती है.

रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही तक ईरान खार्ग द्वीप से तेल लोड कर रहा था, लेकिन यह साफ नहीं है कि अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद वहां का संचालन सामान्य रूप से जारी है या नहीं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस द्वीप को निशाना बनाया गया, तो इसका असर सिर्फ ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है.

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