शनिवार की वो रात मिडिल ईस्ट के लिए किसी डरावने सपने जैसी थी. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के कई शहरों और तेहरान पर बम बरसाए. लेकिन ये सिर्फ मिसाइलों और रडार की जंग नहीं है. इसके पीछे छिपी है करीब 1400 साल पुरानी वो कहानी, जिसने इस्लाम को दो हिस्सों में बांट दिया था. आज जो बम चल रहे हैं, उनका सीधा कनेक्शन उसी पुरानी रंजिश से है.
दुनियाभर के मुसलमानों की आबादी पर नजर रखने वाली संस्था 'प्यू रिसर्च सेंटर' के आंकड़ों को देखें, तो पूरी दुनिया में करीब 85% सुन्नी हैं और 15% शिया. लेकिन ये 15% आबादी जहां रहती है, वही इलाका आज जंग का अखाड़ा बना हुआ है. ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया देश है, जहां 90 से 95% आबादी शिया है.
अब आप नक्शे पर ईरान से शुरू करके इराक, सीरिया और लेबनान तक एक लाइन खींचिए. ये लाइन आधे चांद जैसी दिखती है, इसीलिए इसे 'शिया अर्धचंद्र' कहा जाता है. ईरान इसी चांद का असली बॉस है. लेबनान का हिज्बुल्लाह हो या यमन के हाउथी, सबका रिमोट कंट्रोल ईरान के पास ही रहता है. इसीलिए जब इजरायल तेहरान पर हमला करता है, तो दर्द लेबनान से लेकर यमन तक होता है.
असल में ईरान की असली ताकत सिर्फ उसकी अपनी सरहदों तक नहीं है, बल्कि उसने अपनी सीमाओं के बाहर एक बहुत बड़ा धार्मिक और राजनीतिक जाल बिछा रखा है. आप लेबनान के हिज्बुल्लाह को ही देख लीजिए, जो एक शिया संगठन है और इसे तेहरान का पूरा खुला समर्थन हासिल है. वहीं इराक की बात करें, तो वह दुनिया का सबसे बड़ी अरब शिया आबादी वाला देश है. इराक की करीब दो-तिहाई जनता शिया है, यही वजह है कि ईरान और इराक के रिश्ते बहुत ज्यादा गहरे हैं.
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सिर्फ यही नहीं, बहरीन जैसे देशों में भी ईरान का गहरा असर है क्योंकि वहां की 65 से 75 प्रतिशत आबादी शिया है, हालांकि वहां राज करने वाली सरकार सुन्नी है, जिसकी वजह से वहां दशकों से तनाव और खींचतान मची रहती है. इसी तरह यमन के हाउथी विद्रोही भी शिया परंपरा से ही जुड़े हैं और यही सबसे बड़ा कारण है कि ईरान ने यमन की गृहयुद्ध वाली जंग में इनका खुलकर साथ दिया. सीधी सी बात ये है कि ईरान ने अपनी सीमाओं के बाहर एक ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार कर लिया है कि तेहरान पर हमला करना सिर्फ एक देश पर हमला नहीं माना जाता, बल्कि इसे इस पूरे अंतरराष्ट्रीय 'शिया गठबंधन' पर हमला समझा जाता है.
क्यों नहीं थमी ये लड़ाई?
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. ये पूरी लड़ाई शुरू हुई थी करीब 1400 साल पहले. जब पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु हुई, तब सवाल उठा कि इस्लाम का लीडर कौन बनेगा?
ये झगड़ा तब और बढ़ गया जब साल 680 में इराक के कर्बला में पैगंबर के पोते इमाम हुसैन की हत्या कर दी गई. बस वहीं से शिया और सुन्नी की राहें अलग हो गईं. सदियों तक ये लोग साथ भी रहे, एक ही मोहल्ले में रहे, लेकिन राजनीति ने इस जख्म को कभी भरने नहीं दिया. आज का ईरान खुद को दुनिया भर के शियाओं का रखवाला मानता है और इसी के दम पर अपनी राजनीति चलाता है.
ईरान के अंदर की आग
ईरान के लिए मुसीबत सिर्फ बाहर से नहीं है. तेहरान की सड़कों पर भी गुस्सा उबल रहा है. पिछले कुछ महीनों से ईरान में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. वजह है भयानक महंगाई और कंगाली.
ईरान की गलियों से जो खबरें आ रही हैं, वो हैरान करने वाली हैं. वहां के बाजारों में सन्नाटा है, काम-धंधा ठप है और लोग अब सिर्फ रोटी की मांग नहीं कर रहे, बल्कि सीधे 'तानाशाह मुर्दाबाद' के नारे लगा रहे हैं. कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ये प्रदर्शन इतने बड़े हैं कि प्रशासन के लिए इन्हें संभालना मुश्किल हो रहा है. अलग-अलग खबरों और मानवाधिकार संगठनों की मानें तो हिंसा में हजारों लोगों के मारे जाने और लाखों के घायल होने की बात कही जा रही है. यानी ईरान आज दोहरी मुसीबत में फंसा दिख रहा है, एक तरफ आसमान से इजरायल की मिसाइलें बरस रही हैं, तो दूसरी तरफ घर के अंदर अपनी ही जनता का जबरदस्त गुस्सा फूट रहा है.
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तेल के खेल से हिल जाएगी ग्लोबल इकोनॉमी
ईरान के पास एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे वह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला सकता है. वो है होर्मुज का समुद्री रास्ता. दुनिया का करीब 25% तेल और गैस इसी छोटे से रास्ते से होकर गुजरता है. आंकड़ों की बात करें, तो 2024 में ईरान ने तेल बेचकर करीब 51 अरब डॉलर कमाए, जो सऊदी अरब के 237 अरब डॉलर और इराक के 110 अरब डॉलर के मुकाबले काफी कम है. लेकिन इस समुद्री रास्ते पर ईरान का कब्जा उसे अपने पड़ोसियों से कहीं ज्यादा ताकतवर बना देता है. अगर ईरान ने ये रास्ता बंद करने की धमकी भी दे दी, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल के दाम रॉकेट बन जाएंगे. यही वो डर है जो बड़े-बड़े देशों को भी फूंक-फूंककर कदम रखने पर मजबूर करता है.
नक्शे की लकीरों से अलग है हकीकत
ये जो हम शिया-सुन्नी के नक्शे देखते हैं, उनकी अपनी एक सीमा है. असल जिंदगी में मिडिल ईस्ट में ये दीवारें उतनी गहरी नहीं हैं जितनी कागजों पर दिखती हैं. वहां आज भी ऐसे कई शहर और मोहल्ले हैं जहां दोनों समुदाय के लोग बरसों से साथ रहते आए हैं. उनकी मस्जिदें साझी हैं और परिवारों में शादियां भी आम बात है. सच तो ये है कि ये टकराव आम लोगों के बीच नहीं, बल्कि सरकारों और सत्ता की कुर्सियों के बीच है.
इसे समझने के लिए पाकिस्तान का उदाहरण लीजिए. वहां दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान का ईरान के साथ कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं है. वहीं ओमान को देखिए, जो नक्शे पर न शिया गुट में दिखता है न सुन्नी में. ओमान के लोग एक अलग ही परंपरा को मानते हैं और शायद यही वजह है कि ओमान हमेशा से शांति और तटस्थ रहने की नीति पर चलता आया है.
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