50 अरब डॉलर का नुकसान... सऊदी-UAE पर ईरानी हमलों से भारत पर पड़ रही दोहरी मार

अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान के खिलाफ युद्ध ने मध्य-पूर्व को प्रभावित किया है, जिससे तेल और गैस की कीमतें बढ़ रही हैं. भारत, जो खाड़ी क्षेत्र पर ऊर्जा और रेमिटेंस के लिए निर्भर है, इस संघर्ष से आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा संकट का सामना कर सकता है.

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खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों से भारत को दोतरफा नुकसान हो रहा है (File Photo: Reuters) खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों से भारत को दोतरफा नुकसान हो रहा है (File Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:49 PM IST

अमेरिका-इजरायल का ईरान के खिलाफ युद्ध लगभग दो हफ्ते से चल रहा है और इस संघर्ष ने पूरे मध्य-पूर्व को अपनी चपेट में ले लिया है. युद्ध की वजह से तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं और पूरी दुनिया इसकी मार झेल रही है.

भारत पर भी इस संघर्ष का असर देखा जा रहा है जहां तेल और गैस की कीमतें बढ़ती जा रही हैं. अगर युद्ध लंबा चलता है तो भारत को इसकी दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है. दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है. भारत की अर्थव्यवस्था कुछ हद तक मध्य-पूर्व में काम कर रहे भारतीयों की तरफ से भेजे गए रेमिटेंस यानी विदेश से आने वाले पैसे पर भी निर्भर है.

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भारत खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन में काम कर रहे अपने करीब 91 लाख नागरिकों को लेकर चिंतित है. ये लोग हर साल लगभग 50 अरब डॉलर की रकम भारत भेजते हैं.

खाड़ी देशों से आने वाले पैसे में आएगी गिरावट

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हर्ष वी पंत का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो 'रेमिटेंस में कमी आएगी… और इसका असर व्यापार संतुलन पर भी पड़ेगा.'

उन्होंने कहा, 'इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती प्रभावित होगी. भारत की तेज आर्थिक वृद्धि की उम्मीदों को भी झटका लगेगा. यह सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है.'

खाड़ी के कई देशों में काम कर रहे भारतीय मजदूरों और पेशेवरों ने अल जजीरा से कहा कि अगर युद्ध और बढ़ा तो उनकी नौकरी जाने का खतरा है. ईरानी हमलों के कारण कई तेल और गैस कंपनियों ने कामकाज बंद कर दिया है.

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एक भारतीय कंस्ट्रक्शन मजदूर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'मुझे उम्मीद है कि यह युद्ध लंबा नहीं चलेगा, क्योंकि मैं इसी नौकरी से अपने परिवार का खर्च चलाता हूं.'

सऊदी अरब में भारत के पूर्व राजदूत तलमीज अहमद कहते हैं, 'खाड़ी में काम करने वाला हर भारतीय कम से कम चार से पांच लोगों का खर्च चलाता है. खाड़ी में रोजगार से सीधे तौर पर 4 से 5 करोड़ भारतीयों को फायदा मिलता है.'

ईरानी हमलों के बीच खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ती जा रही है. खाड़ी क्षेत्र में हुए हमलों में भारतीयों समेत कई एशियाई मजदूरों की मौत हो चुकी है.

क्या भारत 90 लाख लोगों को खाड़ी से निकाल सकता है?

अगर युद्ध कंट्रोल से बाहर हो जाता है तो भारत के सामने अपने नागरिकों को निकालने की बड़ी चुनौती होगी. खाड़ी देशों में भारतीय सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय हैं. इन देशों से पश्चिमी देशों ने पहले ही अपने नागरिकों को निकाल लिया है लेकिन भारतीय आबादी इतनी बड़ी है कि उन्हें निकालना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती बन सकती है.

खाड़ी देशों में करीब 3.5 करोड़ विदेशी रहते हैं, जो तेल क्षेत्र में काम करने के साथ-साथ इन देशों को आर्थिक और विमानन केंद्र बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इनमें से 91 लाख भारतीय हैं जो यहां सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है. इसके बाद पाकिस्तान का नंबर है जो भारतीय समुदाय की तुलना में लगभग आधा (49 लाख) हैं.

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तलमीज अहमद ने कहा, 'युद्ध की स्थिति में कोई भी देश, भारत भी 90 या 100 लाख लोगों को एक साथ नहीं निकाल सकता.'

उन्होंने खाड़ी में रहने वाले भारतीयों से कहा, 'हम अच्छे समय में अपने खाड़ी भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं, और बुरे समय में भी उनके साथ खड़े रहेंगे.'

वहीं, भारत के विदेश मंत्रालय ने स्थिति की निगरानी और सवालों के जवाब देने के लिए एक विशेष कंट्रोल रूम बनाया है. साथ ही दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों ने भारतीय नागरिकों की मदद के लिए 24 घंटे हेल्पलाइन शुरू की है. भारतीय दूतावासों ने फंसे हुए यात्रियों को वाणिज्यिक और विशेष उड़ानों के जरिए वापस भेजने की व्यवस्था भी की है.

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