क्या है विलायत-ए-फकीह, जिसका वास्ता देकर ईरान खुद को कहता है 'सच्चा' इस्लामी मुल्क

ईरान का शासन इस्लामिक मान्यताओं पर आधारित है. इस व्यवस्था को विलायत-ए-फकीह कहा जाता है. इसके तहत ईरान में सर्वोच्च लीडर ही सबसे ज्यादा पावर फुल होता है. माना जाता है कि इस विलायत-ए-फकीह की आवधारणा के चलते ईरान 'सच्चा' इस्लामी मुल्क है.

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ईरान हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (Photo-ITG) ईरान हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:58 PM IST

ईरान के शासक 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अब तक की सबसे गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं. भरपूर दमन के बावजूद देश के सौ से ज्यादा शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं और हुकूमत बदलने की मांग हो रही है. वो हुकूमत जो दावा करती है कि वो इस्लाम के सच्चे अर्थों से संचालित है. दुनिया में ईरान अकेला इस्लामिक देश नहीं है बल्कि कई देश है.

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सवाल उठता है कि ईरान में आखिर ऐसा क्या है जिसके आधार पर ये देश खुद के इस्लामिक आदर्शों का सच्चा अनुयायी होने का दावा करता है, आइये समझते हैं.

ईरान पर दुनिया भर की निगाहें लगी?

ईरान के विरोध प्रदर्शनों पर न सिर्फ अरब देश बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें हैं. अमेरिका और यूरोपीय देश इसे एक मौके के तौर पर देख रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिख दिया है कि ईरान इस कदर आजादी की तरफ देख रहा है, जैसे शायद पहले कभी नहीं देखा. अमेरिका मदद के लिए तैयार है. यूरोपियन कमीशन ने भी ईरान में हो रहे इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है.

वैसे बीते 17 साल में जब भी ईरान में लोग सड़कों पर उतरते हैं, तो दुनिया को लगता है कि शायद इस बार ईरान में इस्लामी गणराज्य की नींव हिल जाएगी, लेकिन धूल छंटते ही अयातुल्ला का शासन जस का तस मिलता है. उसकी वजह भी है. दरअसल इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में जो हुकूमत आई उसने खुद को धर्म के रंग में ऐसा रंगा कि आम लोगों के बीच उसकी स्वीकार्यता रातोरात बढ़ गई.

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ईरान की 90 फीसदी आबादी शिया है. हुकूमत को जनता का समर्थन भी समय-समय पर साबित होता रहा है. हाल ये है कि जब भी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठी से अमेरिका अथवा पश्चिमी देशों की साजिश के तौर पर ही देखा गया न कि जनता की जायज मांग के तौर पर. मौजूदा प्रदर्शनों के बारे में भी ईरान यही बात दोहरा रहा है.

ईरान की इस्लामी क्रांति कैसे आई

लगभग पांच दशक पहले ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी. शाह मोहम्मद रजा पहलवी को उखाड़ फेंकने के इरादे से पहला बड़ा प्रदर्शन जनवरी 1978 में शुरू हुआ था. दिसंबर 1979 में एक नए इस्लाम-आधारित लोकतांत्रिक संविधान को मंजूरी दी गई जिसने राजशाही को समाप्त कर दिया. ईरानियों ने आयतुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी का स्वागत किया. खुमौनी ईरान का अंतिम मार्गदर्शक और इस्लाम के चेहरा बनकर उभरे. उन्होंने ही इसे इस्लामिक क्रांति नाम दिया.

रुहुल्लाह खुमैनी ने बाद में समझाया था कि इस्लाम सभी मुसलमानों का है और सभी के लिए समान है, इसलिए यह क्रांति सभी के लिए है और उनमें सभी को एकजुट करने की क्षमता है. धर्मगुरु अल्लाह के बंदे होते हैं. वे इसी विश्वास के साथ राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में काम करते हैं. इसलिए, जब उन्होंने ईरान में सत्ता संभाली, तो उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जो अपनी प्रकृति में पूरी तरह से धार्मिक थी.

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ईरान में विलायत-ए-फकीह क्या है?

ईरान की शासन व्यवस्था को विलायत-ए-फकीह भी कहा जाता है. विलायत-ए-फकीह का सिद्धांत बारह शिया इमामों में 12वें इमाम मेहदी के प्रतिनिधि का राज्याभिषेक है. यह राज्य पर धर्मगुरु के शासन को उचित ठहराता है. विलायत-ए-फकीह की अवधारणा सभी राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों को इस्लाम के धर्मगुरु को हस्तांतरित करती है. इसके तहत सभी प्रमुख निर्णयों को लेने का अधिकार सर्वोच्च धार्मिक नेता यानी वली-ए-फकीह को मिलता है.

सर्वोच्च धार्मिक नेता (फकीह) राष्ट्र पर संरक्षकता (विलायत) प्रदान करता है. वो ऐसा करके राज्य में ऊपर से नीचे तक इस्लामीकरण को सुनिश्चित करता है. अयातुल्ला खुमैनी ने दावा किया था कि ईश्वर ने इस्लाम को इसलिए बनाया है ताकि इसे लागू किया जा सके. जैसा कि ईश्वरीय कानून (शरिया) के निर्माण से पता चलता है.

आयतुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी ने तर्क दिया था कि चूंकि मौलवियों से बेहतर इस्लाम को कोई नहीं जानता. इसलिए यह स्वाभाविक था कि वे 12वें ईश्वर द्वारा नियुक्त शिया इमाम ( इमाम अल-मेंहदी या छिपे हुए इमाम) की वापसी तक राज्य के संरक्षक के रूप में शासन करें. विलायत-ए-फकीह की आवधारणा को 1970 के दशक की शुरुआत में खुमैनी ने तैयार किया था.

खुमैनी ने यह विचार को ईरान की इस्लामी क्रांति से पहले के सालों में इराक में निर्वासन के दौरान दिया था. खुमैनी ने इसे इस्लामी सरकार का एक सिद्धांत विकसित किया, जिसका उद्देश्य ईरानी राज्य की राजनीतिक शक्ति को शिया उलेमा या धर्मगुरु को हस्तांतरित करना था.

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विलायत-ए-फकीह के तहत आयतुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी ने 1989 में अपनी मृत्यु तक सर्वोच्च नेता की भूमिका निभाने का काम किया. ईरान के फिलहाल सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई हैं. सभी राजनीतिक और धार्मिक अधिकार उनके पास हैं. वह इमाम मेहदी और अल्लाह की ओर से ईरान की देखरेख करते हैं.

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सर्वोच्च नेता सिर्फ ईश्वर के प्रति जवाबदेह

सर्वोच्च नेता के आचरण पर न तो राज्य के अधिकारियों और न ही जनता का कोई नियंत्रण है. उसका विरोध ईश्वर की अवज्ञा माना जाता है. छिपे हुए इमाम के डिप्टी के रूप में सर्वोच्च नेता को 12 ईश्वरीय नियुक्त शिया इमाम के अधिकार विरासत में मिलते हैं. सर्वोच्च नेता की नियुक्ति और बर्खास्तगी प जनता का कोई नियंत्रण नहीं है, क्योंकि इसे ईश्वरीय काम माना जाता है.

हालांकि 88 शिया न्यायविदों का एक निकाय, विशेषज्ञों की सभा, कम से कम सिद्धांत रूप में सर्वोच्च नेता का चयन करने और उसके कामों की देखरेख करने के लिए जिम्मेदार है. लेकिन सर्वोच्च नेता के वीटो ने इस निकाय को वास्तव में शक्तिहीन बना दिया है. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि विशेषज्ञों की सभा सर्वोच्च नेता के अधिकार की देखरेख करती है. विलायत-ए-फकीह के तहत सर्वोच्च नेता केवल ईश्वर के प्रति जवाबदेह होता है.

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ईरान के बाहर कई शिया इस्लामवादी राजनीतिक दल और विशेष रूप से ईरानी शासन के करीबी लोग विलायत-ए-फकीह सिद्धांत को मानते हैं. इनमें लेबनान में हिजबुल्लाह, नाइजीरिया में इस्लामिक मूवमेंट और इराक में बद्र संगठन शामिल है. मेंहदी आर्मी भी इसे मानती है. ईरान में राष्ट्रपति सर्वोच्च नेता के प्रति जवाबदेह होता है. वह देश के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में काम करता है और उनके आदेशों को लागू करता है.

ईरानी सत्ता की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना नहीं, बल्कि ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) और उसका अर्धसैनिक बल ‘बासिज’ है. बासिज कोई साधारण पुलिस बल नहीं है. यह समाज के भीतर बुना हुआ एक मजबूत नेटवर्क है. इनकी निष्ठा देश के प्रति नहीं बल्कि सर्वोच्च लीडर के प्रति होती है.

ईरान में सुन्नी मुस्लिमों की पूरी छूट

ईरान में एक धर्मतंत्र है, जहां धार्मिक नेता (मौलवी) सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति रखते हैं (जैसे सर्वोच्च नेता) और इस्लामिक न्यायविदों (faqih) के संरक्षकत्व (Guardianship) के सिद्धांत पर आधारित है. ईरान में इस्लामिक सिद्धांत गणराज्य है, जिसके तहत राजशाही नहीं बल्कि सर्वोच्च नेता के चयन से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में लोग की भागीदारी ले सकते है.

सर्वोच्च नेता का पद छोड़तर बाकी के सभी पद के लिए सुन्नी मुसलमानों को चुनाव लड़ने की छूट है. इतना ही नहीं यहूदी धर्म के लोग भी चुनाव में हिस्सेदारी ले सकते हैं. हालांकि, सर्वोच्च लीडर के लिए शिया मुस्लिम होने की शर्त है और वो भी 12इमामों का मानने वालों से हो.

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ईरान में शिया मुस्लिमों की आबादी 80 से 90 फीसदी के बीच है, उसके बावजूद सुन्नी मुसलमानों को अपने धर्म के लिहाज से इबादत और क्रिया क्लाप करने की पूरी आजादी है. यही नहीं सुन्नी समुदाय की मस्जिदें है और वहां पर अपने सिद्धांतों के लिहाज धार्मिक कार्य करते हैं. ईरान में सुन्नी मुस्लिमों के साथ धार्मिक भेदभाव नहीं है.

सुन्नी देश कितने इस्लाम के करीब

ईरान के अलावा सुन्नी इस्लामिक देशों की बात की जाए तो वो हैं सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन जैसे देश में राजशाही व्यवस्था है. यहां एक वंशानुगत राजतंत्र है, जहां राजा निरपेक्ष शक्ति रखता है और धार्मिक नेता उनके अधीन रहते हैं. सुन्नी मु्स्लिम देश घोषित रूप से इस्लामिक देश हैं, लेकिन उनकी कार्य प्रणाली इस्लाम की शिक्षाओं से मेल नहीं खाती.

सऊदी से लेकर कतर तक सभी देशों के पास अपनी जनता के लिए शरिया-निर्देशित कानून हैं, लेकिन उनके खुद के आचरण में ये दिखाई नहीं देता. सुन्नी इस्लाम देश वहाबीवाद सिद्धांतों से जुड़ा हुआ. सुन्नी इस्लामी देशों में शिया मुस्लिमों और यहूदी धर्म के लोगों को धार्मिक आजादी नहीं है. शिया मुसलमान न ही मोहर्रम में मातम कर सकते हैं और न ही अपने धार्मिक स्थल बना सकते हैं. सऊदी से लेकर कतर और बहरीन तक शिया मुस्लिमों को अपने घरों में खामोशी के साथ इबादत करनी पड़ती है.

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ईरान और अन्य देशों में क्या अंतर है?

सुन्नी मुस्लिम और ईरान के शिया मुस्लिमों की नीतियों में एक बड़ा अंतर है. ईरान केवल उत्पीड़ितों के मुद्दे का प्रचार और समर्थन कर रहा है. इस सिद्धांत की जीवनधारा पैगंबर मुहम्मद के पोते, इमाम हुसैन की शहादत से प्रेरणा है, जिन्हें तत्कालीन राजा (खलीफ़ा) यज़ीद बिन मुआविया की सेनाओं के हाथों मार दिया गया था.

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वहीं, अरब सुन्नी राज्यों ने बड़े पैमाने पर 18वीं सदी के धर्मगुरु अब्दुल वहाब नजदी की कट्टर धार्मिक मान्यताओं से प्रेरणा ली है, जिन्होंने इस्लामी राज्य को स्थापित करने के कर्तव्य के रूप में जिहाद (सशस्त्र संघर्ष) की वकालत की थी. पश्चिमी देशों की मदद से अब्दुल वहाब और इब्ने सऊद ने मिलकर 1924 में अरब से खिलाफत-ए-उस्मानिया (उस्मानी खिलाफत) के खिलाफ बगावत की थी और उसका अंत कर दिया था.

दुनियाभर में सुन्नी मुस्लिम देश जो खुद को इस्लामी देश बताते हैं, वो अब्दुल वहाब नजदीती के सिद्धांतों पर चलते हैं. इसके चलते ही शिया मुस्लिमों को किसी भी सुन्नी मुस्लिम में न ही सरकार में कई अहम पद दिया जाता है और नही उनकी राजनीतिक भागीदारी होती है.

पूर्व विदेश मंत्री और देश के जाने-माने पत्रकार-लेखक एमजे अकबर ने ईरान और दूसरे मुस्लिम देशों (सुन्नी अरब देशों) के बीच फर्क बताते हुए कहा था कि ईरान ने दुनिया के किसी भी हिस्से में कभी भी आतंकी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया है जबकि सुन्नी देशों की बातें सार्वजनिक हैं. यह ईरान और दूसरे मुस्लिम देशों के बीच एक बड़ा अंतर है.

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