ईरान फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है. दशकों से राज कर रहे धार्मिक लीडर अली खामेनेई के खिलाफ जन-बगावत हो चुकी. सैन्य बल और लोगों के बीच संघर्ष में छह सौ से ज्यादा मौतें हो चुकीं. अगर हालात बिगड़े तो सर्वोच्च लीडर खामेनेई को तेहरान छोड़कर भागना पड़ सकता है. ज्यादातर देशों से संबंध बिगाड़ चुके ईरान के पास एक ही ठिकाना है- मॉस्को.
ईरान में पिछले दो हफ्ते से सरकार-विरोधी प्रोटेस्ट चल रहे हैं. तेहरान से शुरू हुई ये आग अब 180 शहरों तक फैल चुकी. मौजूदा धार्मिक लीडर अली खामेनेई से लोग नाराज हैं क्योंकि उनके राज में न महंगाई घटी, न कोई व्यवस्था सुधरी. महिलाओं पर दमन की खबरें आम हैं ही. लोग डेथ टू द डिक्टेटर की भी मांग कर रहे हैं. इसमें सीधे नाम नहीं दिखता, लेकिन नाराजगी खामेनेई से ही है.
सत्तापलट में खामेनेई की सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है. ऐसे में वे परिवार के कुछ करीबी सदस्यों के साथ रूस में शरण ले सकते हैं, या फिर ले चुके हैं, ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं. ब्रिटिश मीडिया द टाइम्स ने एक खुफिया स्त्रोत के हवाले से यह जानकारी दी.
अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता है, जो किसी भी शासन से ऊपर हैं. ऐसे में अगर वे देश छोड़ कर कहीं शरण लेने की कोशिश करें, तो यह शरण दे रहे देश के लिए भी उतना सीधा मामला होगा नहीं. तेहरान में उनकी सुरक्षा में पुलिस और ईरान रिवॉल्यूशनरी गार्ड जैसी मजबूत लेयर है. इसी स्तर की सुरक्षा किसी और देश में मिलेगी या नहीं, पहले तो ये तय करना होगा.
दूसरी बात ये है कि ईरान के रिश्ते कई देशों से खराब रहे. परमाणु प्रोग्राम के चलते अमेरिका उससे नाराज रहता आया. इजरायल से उसकी तनातनी है ही. मुस्लिम मुल्कों से भी उसकी खास बनती नहीं. जैसे पिछले दशकों में ईरान और सऊदी अरब के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संघर्ष रहा. बहरीन से भी उसके संबंध लगभग खत्म हो चुके. अरब लीग के कई देश उससे दूर रहते हैं. यूरोप में भी ईरानी कट्टरता को लेकर दूरी दिखती है.
चारों तरफ दुश्मनों से घिरे ईरान को होस्ट के तौर पर ऐसा देश चाहिए, जो मजबूत हो और लंबा समय तक टिका रहे. यहीं नाम आता है रूस का. मॉस्को और तेहरान दोनों का साझा दुश्मन है- अमेरिका. अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं. इधर रूस पर भी यूक्रेन युद्ध के बाद भारी पाबंदियां लग गईं. ऐसे में दोनों देश एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं.
दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट की राजनीति. सीरिया इसका उदाहरण है. रूस और ईरान, दोनों ने बशर अल-असद की सरकार को बचाने के लिए साथ काम किया. रूस ने हवाई ताकत दी, ईरान ने ग्राउंड नेटवर्क और मिलिशिया का सहारा दिया. इससे दोनों के बीच सैन्य और रणनीतिक भरोसा बढ़ा.
आर्थिक मजबूरी भी दोनों को जोड़ती है. प्रतिबंधों की वजह से दोनों देश पश्चिमी बाजारों से कटे हुए हैं. इन हालात में वे तेल-गैस, हथियार से लेकर तकनीक तक में आपसी सहयोग कर रहे हैं.
पश्चिमी देशों से टकराव, प्रतिबंधों का दबाव और ग्लोबल राजनीति में पकड़ बनाए रखने की चाह, इन सबने पुतिन और खामेनेई को एक-दूसरे के क़रीब ला दिया है. दोनों ने कई मौकों पर एक-दूसरे की सार्वजनिक तौर पर तारीफ की. यह निजी दोस्ती भले न हो, लेकिन डिप्लोमेटिक संबंध जरूर है. इतना काफी है कि खामेनेई रूस में शरण ले सकें.
माना जा रहा है कि खामेनेई के पास पूरी योजना बनी हुई है. भागने से पहले विदेशों में मौजूद संपत्तियां और प्रॉपर्टी जुटाई जाएगी ताकि एग्जिट आसान हो जाए. सुप्रीम लीडर के बारे में माना जाता है कि उनके पास संपत्ति का एक बहुत बड़ा नेटवर्क है. इसका एक बड़ा हिस्सा ईरान की सबसे ताकतवर संस्थाओं में से एक सेताद के तहत आता है. सेताद एक चैरिटेबल फाउंडेशन सिस्टम का हिस्सा है. इस पर लंबे समय से करप्शन का आरोप लगता रहा.
रॉयटर्स की लगभग दस साल पहले हुई जांच के मुताबिक, खामेनेई से जुड़ी कुल दौलत की कीमत करीब 95 अरब डॉलर हो सकती है. इसमें जमीन और मकान, कंपनियां और दूसरे कारोबारी शेयर हो सकते हैं. दिलचस्प बात ये है कि ये सारी प्रॉपर्टी सीधे खामनेई के नाम नहीं, बल्कि दूसरे नामों पर है, जिनकी डोर खामेनेई के हाथ में ही है.
द टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार, अगर खामेनेई को लगे कि उनकी सुरक्षा एजेंसियां उनके ही आदेश नहीं मान रहीं, तो उनका भागने का प्लान तुरंत एक्टिव हो सकता है. वैसे तो ईरान में सेना या सुरक्षा बलों का बगावत करना आसान नहीं. खामेनेई ने सिस्टम को इस तरह बनाया है कि अहम पदों पर उनके ही करीबी बैठे हुए हैं. इसके बाद भी अगर कभी वफादारी की दीवार दरकती लगे तो एग्जिट प्लान लागू हो जाएगा.
अगर भागने की नौबत आ ही जाए तो खामेनेई अकेले नहीं जाएंगे, बल्कि उनके साथ परिवार के कई करीबी लोग होंगे. इनमें उनका बेटा और संभावित उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई हो सकता है. उनके साथ ही भरोसेमंद राजनीतिक और सुरक्षा सलाहकार भी जाएंगे जो खामेनेई के निजी निर्णयों में सीधे शामिल रहे हों. खुफिया तंत्र के चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें हो सकते हैं जिनके पास देश और सुप्रीम लीडर से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां हों.
रूस भले विकल्प के तौर पर देखा जा रहा हो लेकिन अब तक वहां से इसपर कोई संकेत नहीं मिला. हालांकि रूस पहले भी दिखा चुका है कि वह पश्चिम से टकराव की कीमत पर भी सहयोगियों को पनाह दे सकता है. सीरिया में बशर अल-असद इसका बड़ा उदाहरण हैं. लेकिन ईरान का मामला ज्यादा संवेदनशील है. उन्हें शरण देने पर अमेरिका रूस पर और आक्रामक भी हो सकता है, जबकि यूक्रेन युद्ध को लेकर दोनों के रिश्ते पहले से खराब हैं.
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