जब भी ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, समुद्री नाकेबंदी या अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों से घिरता है, तो एक चर्चा दोबारा शुरू हो जाती है. वह चर्चा है चीन के साथ ईरान के नए रेल मार्ग की. कई रणनीतिकारों का दावा है कि ये रेल मार्ग तेहरान के लिए एक सुरक्षित जमीनी जीवनरेखा साबित होगा.
लेकिन क्या वाकई एक रेल लाइन उस समुद्री व्यापार की जगह ले सकती है जिस पर पूरी दुनिया टिकी है? हकीकत और गणित के आंकड़े कुछ और ही इशारा करते हैं.
सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि चीन से सीधे ईरान तक जाने वाली कोई एक नई या अलग रेल लाइन नहीं बनी है. आधिकारिक दस्तावेजों और चीनी सरकारी स्रोतों के मुताबिक, ये एक 'कॉरिडोर' है.
चर्चा में क्यों लौटा ये मुद्दा?
ये कॉरिडोर मिड एशिया के कई देशों के पुराने रेल नेटवर्क को जोड़कर बनाया गया है. 16 फरवरी 2016 को पहली बार एक मालगाड़ी 14 दिनों की यात्रा के बाद तेहरान पहुंची थी. इसलिए, यह मार्ग नया नहीं है. इस ट्रेन ने करीब 10,399 किलोमीटर की दूरी तय की थी और इसमें वाणिज्यिक सामान लदा था. साल 2016 में शुरू होने के बाद कोविड महामारी के दौरान ये मार्ग बंद हो गया था.
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साल 2024 में जब इसे दोबारा शुरू किया गया, तो ईरानी मीडिया ने इसका जमकर प्रचार किया. जून 2025 में इजरायल के साथ हुए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान जानकारों ने फिर से इस कॉरिडोर को समुद्री मार्गों के एक रणनीतिक विकल्प के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. यहीं से ये भ्रम पैदा हुआ कि ये रेल मार्ग समुद्र का मुकाबला कर सकता है.
ट्रैक गेज: सबसे बड़ी तकनीकी रुकावट
रेलवे की दुनिया में 'ट्रैक गेज'एक बहुत ही अहम शब्द है. इसका मतलब दो पटरियों के बीच की दूरी होता है. चीन और ईरान 'मानक गेज' (1,435 मिमी) का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इनके बीच में आने वाले मिड एशियाई देश (कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान) रूसी गेज (1,520 मिमी) का इस्तेमाल करते हैं.
जब ट्रेनें इन देशों की सीमाओं पर पहुंचती हैं, तो वो सीधे आगे नहीं बढ़ सकतीं. पटरियों की चौड़ाई बदलते ही माल को दूसरे वैगनों में शिफ्ट करना पड़ता है या पूरी ट्रेन की बोगियां (पहिया असेंबली) बदलनी पड़ती हैं.
'स्टॉप एंड स्वैप' का बोझ
चीन-ईरान कॉरिडोर में कम से कम चार ऐसे पाइंट्स हैं जहां ये 'ब्रेक-ऑफ-गेज' की समस्या आती है. इसका मतलब है कि ट्रेन को हर बार सीमा पर रुककर पहिये बदलने होंगे. ईरानी रेलवे के मुताबिक, सरख्स स्टेशन पर रोजाना सिर्फ 400 वैगनों की बोगियां बदलने की क्षमता है. ये तकनीकी रुकावट न सिर्फ देरी करती है, बल्कि इस पूरे रास्ते की क्षमता पर एक सख्त सीमा (सीलिंग) भी लगा देती है. कॉरिडोर की रफ्तार और क्षमता यार्डों की सुविधा पर निर्भर है.
रेल से तेल: मुमकिन है पर पैमाना क्या है?
सैद्धांतिक रूप से तेल को टैंक वैगनों के जरिए रेल से ले जाया जा सकता है. लेकिन असली सवाल इसकी मात्रा का है. एक आधुनिक टैंक वैगन की क्षमता करीब 66 टन होती है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, कच्चे तेल के एक मीट्रिक टन में लगभग 7.32 बैरल तेल आता है.
अब अगर सरख्स स्टेशन की 400 वैगन रोजाना की सीमा को पूरा तेल परिवहन में लगा दिया जाए, तो भी रोज सिर्फ 1,93,000 बैरल प्रति दिन (लगभग 0.2 मिलियन बैरल प्रति दिन) तेल ही भेजा जा सकता है.
समुद्र बनाम रेल: एक प्रतिशत का फासला
अब इसकी तुलना समुद्री व्यापार से कीजिए. साल 2024 में स्ट्रेस ऑफ हॉर्मुज से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल का प्रवाह हुआ. रेल मार्ग की अधिकतम क्षमता हॉर्मुज के मुकाबले मात्र 1 प्रतिशत है. इसमें भी तब जब हम मान लें कि ट्रेन में सिर्फ तेल होगा और कोई अन्य सामान नहीं.
इसके अलावा, रेल से तेल भेजने के लिए विशेष लोडिंग सुविधाओं और कई देशों के बीच समन्वय की जरूरत होती है. समुद्री मार्ग भले ही धीमे हों, वो एक साथ भारी मात्रा में माल बहुत कम लागत में ढोते हैं.
हथियारों की सप्लाई: एक सुरक्षा चुनौती
युद्ध के समय इस कॉरिडोर का इस्तेमाल हथियारों और गोला-बारूद के लिए करना भी बहुत मुश्किल है. ये मार्ग कई देशों की सीमाओं से होकर गुजरता है. हर सीमा पर अलग कानून, कागजी कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया होती है. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों (जैसे UNSC संकल्प 2231) के तहत प्रमुख हथियारों के हस्तांतरण के लिए सुरक्षा परिषद की अग्रिम मंजूरी की जरूरत होती है. कई पारगमन राज्यों से गुजरने की वजह से ये प्रक्रिया बेहद मुश्किल हो जाती है.
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युद्ध के समय की कमजोरी
रेलवे कॉरिडोर की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी 'प्रेडिक्टेबिलिटी' (पूर्वानुमान) है. क्योंकि ट्रेनों को गेज बदलने के लिए निर्धारित स्टेशनों या यार्डों में रुकना ही पड़ता है, इसलिए वो दुश्मन के लिए एक आसान निशाना बन जाती हैं. हवाई हमलों के खतरे के बीच, इन यार्डों में जमा हुआ माल या खड़ी ट्रेनें बहुत असुरक्षित होती हैं. एक बहु-देशीय रेल कॉरिडोर चौकियों को खत्म नहीं करता, बल्कि उन्हें बढ़ा देता है.
आर्थिक पहलू: रेल बनाम जहाज
परिवहन की लागत के मामले में भी गणित ट्रेन के पक्ष में नहीं है. समुद्री जहाज एक बार में लाखों टन सामान ले जाते हैं, जिससे प्रति यूनिट लागत बहुत कम हो जाती है. रेल मार्ग समय जरूर बचा सकता है, लेकिन ईंधन, ट्रांजिट शुल्क और तकनीकी बदलावों के कारण ये काफी महंगा पड़ता है. व्यापारिक दृष्टिकोण से ये एक पूरक रास्ता तो हो सकता है, लेकिन मुख्य मार्ग कभी नहीं.
अंतिम निष्कर्ष क्या निकलता है?
कुल मिलाकर नतीजा ये है कि चीन-ईरान कॉरिडोर एक उपयोगी माल ढुलाई मार्ग है जो मध्य एशिया को जोड़ता है. ये समय बचा सकता है और व्यापार बढ़ा सकता है, लेकिन ये समुद्री तेल व्यापार का विकल्प नहीं है. युद्ध के समय यह कोई "पिछला दरवाजा" नहीं बन सकता जहां से चुपके से भारी मात्रा में रसद पहुंचाई जा सके.
नक्शे पर ये रास्ता सीधा और सरल दिख सकता है, लेकिन रेलवे रसद की गणितीय वास्तविकता इसे एक सीमित क्षमता वाला मार्ग ही साबित करती है.
अंकित कुमार