भारत और ईरान के बीच पांच साल के अंतराल के बाद तेल व्यापार शुरू हो रहा है. साल 2019 के बाद पहली बार ईरानी कच्चे तेल से भरा एक कार्गो गुजरात के तट की ओर बढ़ रहा है. अमेरिकी प्रशासन द्वारा समुद्र में मौजूद ईरानी तेल पर 30 दिन की छूट दिए जाने के बाद पिंग शुन नामक जहाज करीब 6 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर गुजरात के वाडिनार की ओर बढ़ रहा है.
रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया के मुताबिक, भारत-ईरान तेल व्यापार एक बार फिर शुरू हो गया है. यह डिलीवरी मई 2019 के बाद पहली मानी जा रही है. खास बात यह है कि यह ऐसे समय हो रही है, जब भारतीय रिफाइनर कच्चे तेल की इन्वेंट्री की कमी का सामना कर रहे हैं. हालांकि, इस कार्गो का खरीदार कौन है, यह अभी साफ नहीं है.
वाडिनार में रूस की दिग्गज कंपनी रोसनेफ्ट समर्थित नयारा एनर्जी की बड़ी रिफाइनरी मौजूद है, जिसकी क्षमता 20 मिलियन टन प्रति वर्ष है. यह बंदरगाह भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड की बीना रिफाइनरी जैसी इकाइयों के लिए भी अहम आपूर्ति केंद्र है. भारत ने यह रुख अपनाया है कि ईरानी तेल की खरीद का फैसला तकनीकी आधार पर लिया जाएगा.
यदि पीछे मुड़कर देखें तो भारत कभी ईरानी कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार हुआ करता था. बेहतर रिफाइनरी अनुकूलता और अनुकूल वाणिज्यिक शर्तों के कारण भारत ईरान से हल्के और भारी दोनों तरह के क्रूड की बड़ी मात्रा में खरीद करता था. एक समय ऐसा भी था जब भारत के कुल तेल आयात में ईरानी हिस्सेदारी 11.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
साल 2018 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कड़े होने के बाद मई 2019 से यह आयात पूरी तरह बंद हो गया. उस कमी को पूरा करने के लिए भारत ने मध्य पूर्व, अमेरिका और अन्य देशों से तेल खरीद बढ़ा दी. साल 2018 में भारत रोजाना 5.18 लाख बैरल ईरानी तेल आयात करता था, जो 2019 की शुरुआत में घटकर 2.68 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया.
इसके बाद से यह सिलसिला पूरी तरह थम गया था. बताया जा रहा है कि पिंग शुन अफ्रामैक्स टैंकर मार्च की शुरुआत में खार्ग द्वीप से कच्चा तेल लेकर निकला था. इसकी अनुमानित आगमन तिथि 4 अप्रैल बताई जा रही है. यह जहाज मई 2019 के बाद पहला ऐसा टैंकर है, जिसने वाडिनार को अपनी मंजिल बताया है. इसके पीछे अमेरिकी नीति में बदलाव अहम है.
अमेरिका ने इस महीने की शुरुआत में ईरानी तेल की समुद्री खरीद पर 30 दिन के लिए छूट दी थी, ताकि वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों को काबू किया जा सके. यह छूट 19 अप्रैल तक लागू रहेगी. अनुमान है कि इस समय समुद्र में करीब 95 मिलियन बैरल ईरानी तेल मौजूद है, जिसमें से लगभग 51 मिलियन बैरल भारत के लिए उपयुक्त हो सकता है.
बाकी तेल चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों के लिए ज्यादा अनुकूल माना जा रहा है. हालांकि, छूट मिलने के बावजूद एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है और वह है भुगतान का तरीका. ईरान अभी भी SWIFT सिस्टम से बाहर है, जो वैश्विक बैंकिंग लेनदेन का प्रमुख नेटवर्क है. पहले ईरानी तेल की खरीद यूरो में की जाती थी. एक तुर्की बैंक मध्यस्थ करता था.
अब वो विकल्प उपलब्ध नहीं है. साल 2012 में यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बाद ईरान को SWIFT से अलग कर दिया गया था. इससे उसके अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन पर गंभीर असर पड़ा. साल 2018 में अमेरिका द्वारा दोबारा प्रतिबंध लगाने के बाद स्थिति और जटिल हो गई. इससे ईरान की वैश्विक व्यापार, भुगतान और विदेशी मुद्रा तक पहुंच काफी सीमित हो गई.
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