तेल ही नहीं, इंटरनेट और बिजली की सप्लाई के लिए अहम 'चोकपाइंट' है होर्मुज

होर्मुज अब सिर्फ तेल सप्लाई का नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी सबसे अहम चोकपॉइंट है. समुद्र के नीचे बिछी केबल्स के ज़रिए दुनिया का 99 फीसदी इंटरनेट ट्रैफिक गुजरता है. ऐसे में ईरान-अमेरिका तनाव के बीच इन केबल्स पर खतरा बढ़ना चिंता का विषय बन गया है.

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डिजिटल वर्ल्ड के लिए सिरदर्द बना होर्मुज संकट, समुद्री केबल्स पर मंडरा रहा खतरा. (File Photo: ITG) डिजिटल वर्ल्ड के लिए सिरदर्द बना होर्मुज संकट, समुद्री केबल्स पर मंडरा रहा खतरा. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:33 PM IST

ईरान के होर्मुज (Strait of Hormuz) में समुद्र के नीचे बिछे केबल इंफ्रास्ट्रक्चर पर संभावित हमलों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. दुनिया भर में तेल शिपमेंट के लिए अहम रास्ता माना जाने वाला होर्मुज, डिजिटल दुनिया के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इसके समुद्र तल पर कई फाइबर-ऑप्टिक केबल्स बिछी हुई हैं, जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को खाड़ी देशों और मिस्र के रास्ते यूरोप से जोड़ती हैं.

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समुद्र के नीचे बिछी ये केबल्स असल में फाइबर-ऑप्टिक या बिजली की लाइनें होती हैं, जिन्हें डेटा और बिजली संचार के लिए बिछाया जाता है. डिजिटल टेक्नोलॉजी के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी ITU के मुताबिक, दुनिया का लगभग 99 फीसदी इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं केबल्स के जरिए संचालित होता है. ये न केवल इंटरनेट, बल्कि टेलीकम्युनिकेशन और बिजली आपूर्ति का भी एक अनिवार्य जरिया हैं.

क्लाउड सेवाओं से लेकर ऑनलाइन बातचीत और वित्तीय लेन-देन तक, डिजिटल दुनिया इन पर टिकी हुई है. भू-राजनीतिक और ऊर्जा विश्लेषक माशा कोटकिन के मुताबिक, यदि इन पर हमला होता है, तो केबल्स टूट जाएंगे. इसका मतलब है इंटरनेट का धीमा या बंद हो जाना, ई-कॉमर्स में बाधा और आर्थिक गतिविधियों पर सीधा असर. UAE और सऊदी अरब डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रहे हैं. 

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खाड़ी देश अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं. इन देशों की राष्ट्रीय AI कंपनियां तेज डेटा ट्रांसफर के लिए पूरी तरह इन समुद्री केबल्स पर निर्भर हैं. होर्मुज से गुजरने वाली प्रमुख केबल्स में 'एशिया-अफ्रीका-यूरोप 1' (AAE-1) शामिल है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया को मिस्र के रास्ते यूरोप से जोड़ती है. इसके लैंडिंग पॉइंट UAE, ओमान, कतर और सऊदी अरब में हैं.

'फाल्कोन' (Falcon) नेटवर्क भारत और श्रीलंका को खाड़ी देशों, सूडान और मिस्र से जोड़ता है, जबकि 'गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल केबल सिस्टम' ईरान समेत सभी खाड़ी देशों को आपस में कनेक्ट करता है. इसके अलावा, कतर की कंपनी ओरेडू (Ooredoo) के नेतृत्व में नए नेटवर्क भी तैयार किए जा रहे हैं. हालांकि, टकराव वाले इलाकों में इन केबल्स की मरम्मत करना आसान नहीं होता. 

विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी रूप से मरम्मत मुश्किल नहीं है, लेकिन युद्ध, बारूदी सुरंगों और सुरक्षा जोखिमों के कारण मरम्मत करने वाले जहाजों को काम करने में दिक्कत आती है. बीमा कंपनियों और जहाज मालिकों के फैसले भी इस पर असर डालते हैं. इसके अलावा किसी देश के समुद्री क्षेत्र में घुसने के लिए अनुमति लेना भी एक बड़ी चुनौती है. कई बार सबसे बड़ी देरी इसी प्रक्रिया में होती है. 

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विशेषज्ञ मॉल्डिन के मुताबिक, संघर्ष खत्म होने के बाद भी समुद्र की तलहटी का दोबारा सर्वे करना पड़ेगा, ताकि केबल्स के लिए सुरक्षित रास्तों की पहचान की जा सके और युद्ध के दौरान डूबे मलबे से बचा जा सके. कुल मिलाकर, होर्मुज अब सिर्फ तेल का ही नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी एक बेहद संवेदनशील चोकपॉइंट बन चुका है. यहां टकराव वैश्विक इंटरनेट और अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है.

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