भारत संग डील... कनाडा और EU ने बढ़ा दिया ट्रंप का सिरदर्द, भरोसेमंद नहीं रहा अमेरिका!

भारत-ईयू के बीच की डील को मदर ऑफ ऑल डील कहा जाना महज अलंकार नहीं है. भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक GDP का 25 फीसदी प्रतिनिधित्व करते हैं और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इन्हीं के खाते में आता है.

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ईयू और कनाडा ने दिया ट्रंप को झटका (Photo: AP) ईयू और कनाडा ने दिया ट्रंप को झटका (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:03 PM IST

दशकों तक जिन देशों की अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका पर निर्भर रही हैं, वे अब व्हाइट हाउस में बैठे उस शख्स से निपटने की रणनीतियां बनाने में जुटे हैं. ट्रंप की टकरावपूर्ण कूटनीति और टैरिफ को हथियार बनाने की रणनीति ने मित्र देशों तक को अलग-थलग कर दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी है. लेकिन इस हफ्ते यूरोप और कनाडा ने ट्रंप को टका सा जवाब दे दिया है. लेकिन दिलचस्प ये है कि ट्रंप को आईना दिखाने की इस स्ट्रैटेजी के केंद्र में भारत है. 

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यूरोपीय संघ (EU) ने भारत के साथ जिस मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील पर साइन किए हैं. उससे ट्रंप को कड़ा झटका लगा है. अमेरिका को अब यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि उसकी जोर-जबरदस्ती वाली व्यापार नीति और टैरिफ ने उसे एक असहज स्थिति में ला खड़ा किया है, ठीक ऐसे समय में जब वैश्विक आर्थिक गठबंधन तेजी से नए सिरे से आकार ले रहे हैं.

भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान से पता चलता है कि अमेरिका अब खुद को कितना अलग-थलग महसूस कर रहा है. उन्होंने कहा कि मुझे यूरोपीय लोग बेहद निराशाजनक लगते हैं. वे हमारे साथ आने को तैयार नहीं थे क्योंकि वे यह व्यापार समझौता करना चाहते थे.

ट्रंप प्रशासन के इस शीर्ष अधिकारी ने यूरोप पर यह आरोप भी लगाया कि उसने यूक्रेन युद्ध से ऊपर व्यापारिक हितों को रखा. भारत के रूस के साथ घनिष्ठ संबंधों और रूसी तेल की खरीद का हवाला भी दिया. लेकिन बेसेंट शायद इस स्याह सच्चाई को नजरअंदाज कर गए कि कोई भी देश धमकाया जाना या किसी अनिश्चित साझेदार पर निर्भर रहना पसंद नहीं करता. यही अविश्वास और ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकियां यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ उस व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की एक बड़ी वजह बनीं, जिस पर लगभग दो दशकों से बातचीत चल रही थी.

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दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने ट्वीट कर कहा कि ट्रंप फैक्टर ने साफ तौर पर वर्षों की बातचीत के बाद उन्हें फिनिश लाइन पार करने में मदद की. यह सिर्फ अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने की बात नहीं है, बल्कि एक व्यापक तेजी से बढ़ती साझेदारी को मजबूत करने का संकेत भी है.

लेकिन भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत-ईयू के बीच की डील को मदर ऑफ ऑल डील कहा जाना महज अलंकार नहीं है. भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक GDP का 25 फीसदी प्रतिनिधित्व करते हैं और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इन्हीं के खाते में आता है.

यह समझौता भारत को उन श्रम-प्रधान उत्पादों के निर्यात में बढ़त देगा जो ट्रंप के 50 फीसदी तक के आसमान छूते टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिनमें कपड़े, रत्न, आभूषण और फुटवियर शामिल हैं. दूसरी ओर, यूरोपीय संघ को भारत द्वारा अपने 27 सदस्य देशों के 96.6 फीसदी निर्यात पर टैरिफ खत्म या कम किए जाने का लाभ मिलेगा.

EU ने भारत के डेयरी और कृषि क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर इस समझौते से बाहर रखा है. भारत की उन लाल रेखाओं का सम्मान करते हुए जो इन राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ी हैं.

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यह इस बात का संकेत है कि भारत-ईयू समझौता महज लेन-देन का सौदा नहीं, बल्कि आपसी सम्मान में लिपटा हुआ एक रणनीतिक कदम है. इसने ट्रंप को साफ संदेश दे दिया है कि अमेरिकी व्यापार नीति की अस्थिरता के बीच वैश्विक शक्तियां अब अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विविध और जोखिम मुक्त करने की दिशा में बढ़ चुकी हैं.

यहीं पर भारत ने मौके पर चौका मारा है. भारत ने तेजी से ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ व्यापार समझौते किए. अब देश भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर व्यापारिक साझेदार के रूप में देखने लगे हैं. ट्रंप जिस मरी हुई अर्थव्यवस्था और टैरिफ किंग की छवि भारत की बनाना चाहते थे, वह टिक नहीं पाई.

इसी बीच, कनाडा भी भारत की ओर बढ़ता दिख रहा है. ट्रंप ने पिछले साल अधिकांश समय तेल और ऊर्जा को लेकर कनाडा को धमकाया था. उसे कभी अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात की तो कभी यह दावा कि अमेरिका को कनाडा के तेल-गैस की जरूरत नहीं है जबकि हकीकत यह है कि कनाडा, अमेरिका का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है.

कनाडा अब भारत को अधिक कच्चा तेल, एलएनजी और पीएलजी भेजेगा. इसके बदले में भारत, कनाडा को अधिक परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद भेजेगा. यह फैसला मंगलवार को केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन की बैठक में लिया गया.

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यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब मार्क कॉर्नी के नेतृत्व में कनाडा, भारत के साथ अपने रिश्तों को फिर से पटरी पर ला रहा है, जो 2022 में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप निज्जर की हत्या में भारत की कथित भूमिका को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के आरोपों के बाद बुरी तरह बिगड़ गए थे.

यहां भी, ट्रंप की बढ़ती आक्रामकता ने कनाडा को भारत से रिश्ते सुधारने और अपने बाजारों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है. हाल ही में कॉर्नी की चीन यात्रा से भी ट्रंप चिढ़ गए. इस दौरान कॉर्नी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ टैरिफ कम करने पर सहमति जताई. इसके बाद ट्रंप ने धमकी दी कि अगर कनाडा ने चीन के साथ व्यापार समझौता किया तो उस पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया जाएगा.

कॉर्नी आने वाले हफ्तों में भारत की यात्रा पर आने वाले हैं. इस दौरान वह यूरेनियम आपूर्ति, परमाणु सहयोग, ऊर्जा और अहम खनिजों से जुड़े समझौतों का पिटारा लेकर भारत आएंगे. इस बीच, ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा भी 19 से 21 फरवरी के बीच भारत आएंगे और कारोबारियों से मुलाकात करेंगे.

अमेरिका की अनिश्चितता ने ब्रिटेन को भी चीन के साथ रिश्ते सुधारने की ओर धकेला है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर बीजिंग के तीन दिवसीय दौरे पर हैं. आठ साल में किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की यह पहली चीन यात्रा है. 

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