अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कानूनी और राजनीतिक सवालों के घेरे में आ गए हैं. मादुरो को पकड़ने के लिए की गई अमेरिकी कार्रवाई को लेकर जहां दुनिया भर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, वहीं अब ट्रंप प्रशासन के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के ताजा बयान ने इस पूरे ऑपरेशन को और विवादास्पद बना दिया है.
मार्को रुबियो ने ट्रंप के उस दावे से दूरी बना ली, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका वेनेजुएला को "चलाएगा" जब तक वहां सत्ता का संक्रमण पूरा नहीं हो जाता. रुबियो ने कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को नहीं चला रहा, बल्कि सिर्फ "भविष्य की दिशा तय कर रहा है." उनके शब्दों में, "हम जो चला रहे हैं, वह यह है कि आगे चीजें किस दिशा में जाएंगी. हमारे पास दबाव बनाने की ताकत है."
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई एक सैन्य आक्रमण थी और क्या इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी जरूरी थी? रुबियो ने साफ कहा कि यह कोई आक्रमण नहीं था और न ही यह कोई लंबा सैन्य अभियान था, इसलिए कांग्रेस की अनुमति की जरूरत नहीं पड़ी. उन्होंने इसे "लॉ एनफोर्समेंट ऑपरेशन" बताया, जिसका मकसद एक अभियुक्त ड्रग तस्कर को गिरफ्तार करना था लेकिन यह दलील खुद ट्रंप प्रशासन के पुराने बयानों से टकराती दिख रही है.
वेनेजुएला की जमीन पर हमला 'युद्ध' माना जाएगा
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर में व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स ने कहा था कि अगर वेनेजुएला की जमीन पर हमला होता है तो उसे युद्ध माना जाएगा और इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी. इसी तरह, ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने उस वक्त सांसदों को निजी तौर पर बताया था कि उनके पास वेनेजुएला में जमीनी हमले का कानूनी आधार नहीं है.
इसके बावजूद, महज दो महीने बाद अमेरिका ने वही कर दिखाया, जिसे वह पहले असंभव और गैरकानूनी बता रहा था. ट्रंप ने खुद इसे "वेनेजुएला के खिलाफ बड़े पैमाने पर हमला" बताया और इसी ऑपरेशन के तहत मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर न्यूयॉर्क लाया गया. मादुरो पर ड्रग तस्करी, आतंकवाद और अवैध हथियारों से जुड़े आरोप लगाए गए हैं और वे फिलहाल ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में बंद हैं.
जेडी वेंस, पीट हेगसेथ और रुबियो के एक बयान
इस कार्रवाई को लेकर कानूनी आधार भी लगातार बदलता दिख रहा है. रिपब्लिकन सीनेटर माइक ली ने कहा कि रुबियो ने उन्हें बताया था कि यह हमला अरेस्ट वारंट को लागू करने वाले अमेरिकी कर्मियों की सुरक्षा के लिए जरूरी था. बाद में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और खुद रुबियो ने भी यही तर्क दोहराया.
हालांकि आलोचकों का कहना है कि दुनिया भर में कई ऐसे लोग हैं, जिन पर अमेरिका में आरोप तय हैं, लेकिन उन्हें पकड़ने के लिए अमेरिका आमतौर पर किसी संप्रभु देश पर सैन्य कार्रवाई नहीं करता. यही वजह है कि ट्रंप की यह कार्रवाई न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून, बल्कि अमेरिकी संविधान और संसद की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है.
शनिवार को की गई अमेरिकी कार्रवाई को ट्रंप प्रशासन "लॉ एनफोर्समेंट ऑपरेशन" यानी कानून लागू करने की कार्रवाई बता रहा है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अपने बयान इस दावे पर सवाल खड़े कर रहे हैं. ट्रंप का कहना है कि अमेरिका अब कुछ समय के लिए वेनेजुएला को चलाने में भी भूमिका निभाएगा. उन्होंने बार-बार वेनेजुएला के तेल का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका वहां के तेल ढांचे को दोबारा खड़ा करेगा और देश को "ठीक तरीके से चलाएगा."
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इन बातों से साफ संकेत मिलता है कि मामला सिर्फ राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की मंशा भी इसमें शामिल हो सकती है. इसी वजह से इस कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानून और अमेरिकी संविधान से जुड़े गंभीर सवाल उठने लगे हैं.
मादुरो की गिरफ्तारी पर क्या कह रहे एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही ट्रंप प्रशासन एक मजबूत और साफ कानूनी तर्क देता, तब भी इस तरह की कार्रवाई को सही ठहराना आसान नहीं होता. अमेरिका ने इससे पहले सत्ता परिवर्तन के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल इराक में किया था, लेकिन उस युद्ध को 2002 में अमेरिकी संसद की मंजूरी मिली थी. 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को भी कांग्रेस ने हरी झंडी दी थी लेकिन वेनेजुएला के मामले में ऐसा नहीं करने के लिए कई तर्क भी दिए जा रहे हैं.
कुछ लोग इसकी तुलना इराक से कर रहे हैं, लेकिन कई जानकारों के मुताबिक 1989 के पनामा ऑपरेशन जैसा है, जब अमेरिका ने ड्रग तस्करी के आरोपों में राष्ट्रपति मैनुएल नोरिएगा को अरेस्ट किया था. उस समय भी कार्रवाई सीमित बताई गई थी लेकिन अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने माना था कि एफबीआई को इस तरह के ऑपरेशन का अधिकार नहीं था.
गौर करने वाली बात यह है कि पहले अमेरिकी कानून में विदेशी नागरिक को जबरन अमेरिका लाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन 1989 में सरकार ने अपनी कानूनी राय बदल दी थी. अब वेनेजुएला के मामले में वही बहस फिर सामने आ गई है.
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