ईरान जंग के बीच एक ऐसा दौर चल रहा है, जहां हर कुछ दिनों में कोई बड़ा चेहरा इतिहास बनता जा रहा है. पहले अली खामेनेई की मौत ने पूरे सिस्टम को हिला दिया, और अब अली लारिजानी की मौत ने उस झटके को और गहरा कर दिया है. यह सिर्फ एक नेता की मौत नहीं है, बल्कि उस संतुलन का अंत है जो सालों से ईरान की सत्ता को संभाले हुए था.
अली लारिजानी को समझना, दरअसल ईरान की राजनीति को समझना है. वह उन गिने-चुने नेताओं में थे जो एक साथ कई दुनिया में चलते थे. एक तरफ उनका गहरा संबंध इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC से था, जो ईरान की असली ताकत मानी जाती है, तो दूसरी तरफ वह कूटनीति की भाषा भी उतनी ही अच्छी तरह समझते थे. चीन और रूस जैसे देशों के साथ उनके संबंध सिर्फ औपचारिक नहीं थे, बल्कि भरोसे पर टिके हुए थे.
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यही वजह थी कि जब भी ईरान पर कोई बड़ा संकट आता, तो लारिजानी उस संकट को संभालने वाले चेहरों में सबसे आगे होते. उनकी खासियत यह थी कि वह कट्टरपंथियों को भी स्वीकार थे और सुधारवादियों को भी. आज की ईरानी राजनीति में ऐसा संतुलन बहुत कम लोगों के पास था.
अगर हम पीछे जाएं, तो 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या ने ईरान की सैन्य ताकत को झटका दिया था, लेकिन लारिजानी की मौत उससे अलग और शायद ज्यादा गहरी चोट है. सुलेमानी मैदान के योद्धा थे, जबकि लारिजानी दिमाग के खिलाड़ी. वह उन लोगों में थे जो युद्ध को रोकने, बातचीत शुरू करने और संकट को राजनीतिक तरीके से हल करने की क्षमता रखते थे.
दिलचस्प बात यह है कि लारिजानी को अक्सर उस नेता के रूप में देखा जाता था जो अगर कभी ईरान को किसी "ट्रांजिशन" यानी बदलाव के दौर से गुजरना पड़े, तो वह उसे संभाल सकते हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ऐसे किसी "इंटरनल फेस" की तलाश में रहे हैं, जो ईरान के अंदर से निकलकर एक स्थिर नेतृत्व दे सके. लेकिन अब वह संभावना खत्म हो चुकी है.
अली लारिजानी की हत्या यह भी संकेत देती है कि इजरायल और उसके सहयोगी उन्हें किसी संभावित समाधान के रूप में नहीं, बल्कि एक बाधा के रूप में देखते थे. वह ऐसे व्यक्ति थे जो युद्ध को बातचीत में बदल सकते थे, और शायद यही बात उन्हें खतरनाक बनाती थी.
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लारिजानी की राजनीति सिर्फ पदों तक सीमित नहीं थी. वह एक विचारक भी थे. उन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी की थी. वह इस्लामी विचारधारा को पश्चिमी दर्शन के तर्कों के हिसाब से समझने की कोशिश किया करते थे. यही उनके लेखन में भी झलकता था. वह मानते थे कि समाज सिर्फ लोगों का समूह नहीं, बल्कि एक सामूहिक आत्मा है, जिसकी अपनी पहचान और अधिकार होते हैं.
लेकिन उनकी यही जटिल सोच उन्हें ईरान के अंदर भी विवादों में ले आई. समय के साथ वह कट्टरपंथियों से दूर होते गए और पूर्व राष्ट्रपति हसन रुहानी के करीब आए. उन्होंने कई बार कोशिश की कि ईरान एक संतुलित रास्ता अपनाए. न पूरी तरह पश्चिम के खिलाफ जाए और न ही अपनी आंतरिक राजनीति को पूरी तरह कठोर बनाए.
यही कारण था कि उन्हें कई बार चुनाव लड़ने से भी रोका गया. गार्जियन काउंसिल ने उन्हें अयोग्य घोषित किया, लेकिन असली वजह राजनीतिक थी. सत्ता के भीतर मौजूद कुछ ताकतें नहीं चाहती थीं कि लारिजानी फिर से शीर्ष नेतृत्व में आएं.
फिर भी, अगस्त 2025 में उनकी वापसी हुई, जब उन्हें सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का सचिव बनाया गया. यह पद बेहद अहम है, क्योंकि यही संस्था सेना और सरकार के बीच कड़ी का काम करती है. उस समय ईरान एक नए युद्ध के खतरे से जूझ रहा था, और लारिजानी को इसीलिए वापस लाया गया क्योंकि उनके अनुभव की जरूरत थी. उन्होंने खाड़ी देशों को साफ संदेश दिया कि अगर अमेरिका उनके इलाके से ईरान पर हमला करता है, तो उनके देश में मौजूद अमेरिकी ठिकाने भी निशाने पर होंगे. यह एक सख्त लेकिन रणनीतिक चेतावनी थी, जो सिर्फ कोई अनुभवी नेता ही दे सकता था.
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लारिजानी की एक और अहम भूमिका उस समय सामने आई जब मोजतबा खामेनेई को अगला सुप्रीम लीडर बनाने की चर्चा चल रही थी. कहा जाता है कि लारिजानी और हसन रूहानी इस प्रक्रिया को टालना चाहते थे. उनका मानना था कि युद्ध के माहौल में जल्दबाजी में लिया गया फैसला ईरान के भविष्य को सीमित कर सकता है. हालांकि अंत में यह कोशिश नाकाम रही, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि लारिजानी सिर्फ सिस्टम का हिस्सा नहीं थे, बल्कि उसे दिशा देने की कोशिश भी कर रहे थे.
आज ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसके पास सैन्य ताकत तो है, लेकिन राजनीतिक संतुलन कमजोर होता जा रहा है. लारिजानी जैसे नेता इस संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते थे. उनकी मौजूदगी में उम्मीद रहती थी कि हालात चाहे जितने भी खराब हों, बातचीत का रास्ता खुला रहेगा. अब जब वह नहीं हैं, तो यह रास्ता और संकरा हो गया है.
इतिहास में अक्सर देखा गया है कि जब किसी देश के मध्यम मार्गी नेता खत्म हो जाते हैं, तो राजनीति ज्यादा कठोर और टकरावपूर्ण हो जाती है. ईरान के साथ भी कुछ ऐसा ही होने का खतरा है. कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो सकती हैं और फैसले ज्यादा आक्रामक हो सकते हैं, जहां लारिजानी उसको बैलेंस करने वाले नेता के तौर पर जाने जाते थे.
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