साल 2025 में हुए अहमदाबाद एयर इंडिया विमान हादसे में अपनी पत्नी और दो साल की मासूम बेटी को खोने वाले एक भारतीय को ब्रिटेन से निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है. पीड़िता का नाम मोहम्मद सेठवाला बताया जा रहा है. ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने उन्हें देश छोड़ने के लिए बुधवार (22 अप्रैल) तक का समय दिया है. आदेश का पालन नहीं करने पर गिरफ्तारी की धमकी दी गई है.
मोहम्मद सेठवाला ब्रिटेन में अपनी पत्नी के 'स्टूडेंट वीज़ा' पर एक 'डिपेंडेंट' के तौर पर रह रहे थे. एयर इंडिया फ़्लाइट 171 के हादसे के बाद उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ान भरने के चंद सेकंड बाद ही विमान क्रैश हो गया, जिसमें 260 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में उनकी पत्नी सादिकाबानू टापेलीवाला और दो साल की बेटी फ़ातिमा भी शामिल थीं.
UK के मीडिया आउटलेट 'मेट्रो' की रिपोर्ट के अनुसार, मोहम्मद सेठवाला ने ब्रिटेन के गृह मंत्रालय से 'मानवीय' और 'दयालुता' के आधार पर 'आगे रहने की अनुमति' (FLR) मांगी थी, जिसे ठुकरा दिया गया. फिलहाल उन्हें 'इमिग्रेशन बेल' पर रखा गया है. सेठवाला ने भरे मन से कहा, "मैं सरकार के फैसले को स्वीकार नहीं करता. इस वजह से मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मैं इसे नहीं मान सकता."
जानकारी के मुताबिक, साल 2022 में मो. सेठवाला मार्च अपनी पत्नी के साथ ब्रिटेन आए थे. सादिकाबानू लंदन के अल्स्टर यूनिवर्सिटी कैंपस में पढ़ाई कर रही थीं. भविष्य में 'स्किल्ड वर्कर' के तौर पर वहीं बसने की योजना बना रही थीं. 'द इंडियन एक्सप्रेस' से बात करते हुए सेठवाला ने बताया कि वे दोनों बहुत ही कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं. पड़ोसियों ने पैसे जुटाकर उनको ब्रिटेन भेजा था.
एयर इंडिया ने सेठवाला को लंदन में ताज ग्रुप के साथ नौकरी की पेशकश भी की थी, लेकिन वीजा की समय-सीमा खत्म होने के कारण वे इसे स्वीकार नहीं कर सके. उनके दोस्तों का कहना है कि यदि उनकी पत्नी या बेटी आज जिंदा होतीं, तो उन्हें कानूनन ब्रिटेन में रहने का हक मिल जाता. लेकिन इस दुखद स्थिति में भी ब्रिटेन का प्रशासन उन्हें 'शोक-संतप्त पति/पत्नी' की श्रेणी में नहीं मान रहा है.
'द सन' द्वारा देखे गए दस्तावेजों के मुताबिक, होम ऑफिस ने अपने पत्र में तर्क दिया है कि चूंकि मोहम्मद सेठवाला का परिवार भारत में रहता है. वो अपनी मातृभाषा बोलना जानते हैं, इसलिए उन्हें वहां दोबारा बसने में कोई दिक्कत नहीं होगी. इसी आधार पर उन्हें 22 अप्रैल तक देश छोड़ने का अल्टीमेटम दिया गया है. ब्रिटिश सरकार के इस कदम की चौतरफा निंदा हो रही है.
माइग्रेंट्स राइट्स नेटवर्क की CEO फ़िजा कुरैशी ने इसे 'संवेदनहीनता' करार दिया है. वहीं, इतिहासकार पैट्रिक वर्नन ने इसे 'नैतिक नाकामी' बताया है. 110 प्रभावित परिवारों का पक्ष रख रहे आयुष एस राजपाल ने भी इसे एक सच्चा मानवीय मामला बताते हुए पुनर्विचार की मांग की है. फिलहाल, मामला अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है, लेकिन ब्रिटेन का गृह मंत्रालय अपने रुख पर कायम है.
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