Uttar Pradesh News: मऊ निवासी चतुरी गुप्ता करीब 40 वर्ष पहले पत्नी से हुई कहासुनी के बाद घर छोड़कर निकल गए थे. वे कानपुर के शास्त्री नगर में गुमनाम जिंदगी जी रहे थे. हाल ही में तबीयत बिगड़ने पर उन्हें पनकी के नारायणा मेडिकल कॉलेज के आईसीयू में भर्ती कराया गया. सामाजिक कार्यकर्ता मुन्ना चौहान के प्रयासों से उनके बेटों, राजमंगल और राजू को सूचना दी गई. अस्पताल पहुंचने पर जब पहचान का संकट खड़ा हुआ, तब मां की दी हुई एक पुरानी धुंधली तस्वीर काम आई. चेहरे का मिलान होते ही 40 साल का फासला खत्म हो गया और बेटों ने अपने पिता को पहचान लिया.
पुरानी तस्वीर बनी पहचान का इकलौता आधार
चतुरी गुप्ता की हालत काफी गंभीर थी और वे जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे. जब उनके बेटे अस्पताल पहुंचे, तो वक्त की मार और बढ़ती उम्र के कारण वे अपने पिता को पहचान नहीं पा रहे थे.
ऐसे में उनके पास मौजूद परिवार की एक पुरानी फोटो ही उम्मीद की आखिरी किरण बनी. जैसे ही बेटों ने फोटो से आईसीयू में लेटे शख्स के चेहरे का मिलान किया, उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. अस्पताल का पूरा स्टाफ इस भावुक पल का गवाह बना.
पलों की नाराजगी और दशकों का इंतजार
40 साल पहले एक छोटी सी नाराजगी ने हंसते-खेलते परिवार को बिखेर दिया था. चतुरी के जाने के बाद उनकी पत्नी ने अकेले ही बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन मन में हमेशा पति के लौटने की आस बनी रही.
उधर, कानपुर में 'काका हलवाई' के नाम से मशहूर चतुरी अपनों के होते हुए भी अकेले रह रहे थे. आर्थिक तंगी और बीमारी ने उन्हें लाचार कर दिया था, लेकिन किस्मत को शायद उनका आखिरी समय अपनों के साथ ही मंजूर था.
मुन्ना चौहान की कोशिशों से मिला परिवार
इस मिलन के पीछे सामाजिक कार्यकर्ता मुन्ना चौहान की बड़ी भूमिका रही. उन्होंने चतुरी की नाजुक हालत को देखते हुए स्थानीय लोगों की मदद ली और मुंबई में रहने वाले एक रिश्तेदार अशोक गुप्ता के जरिए मऊ में उनके परिवार तक संदेश पहुंचाया. शुरुआत में हिचकिचाहट के बाद, जब बेटों को पिता की गंभीर स्थिति का पता चला, तो वे अपनी सारी नाराजगी भूलकर कानपुर दौड़े आए. फिलहाल, 40 साल के लंबे इंतजार के बाद अब यह परिवार फिर से एक हो गया है.
सिमर चावला