यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा के आखिरी दिन बांदा में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने परीक्षा केंद्र पर मौजूद अधिकारियों को भी हैरान कर दिया. एक अभ्यर्थी ने सरकारी दस्तावेजों में अपनी उम्र 13 साल तक कम करवा ली, लेकिन जब वह परीक्षा देने पहुंचा तो उसकी असल उम्र उसके चेहरे और व्यक्तित्व से छिप नहीं सकी. केंद्र प्रभारी को संदेह हुआ, जांच शुरू हुई और फिर जो कहानी सामने आई, उसने सभी को चौंका दिया.
मामला बांदा जिले में आयोजित उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती परीक्षा से जुड़ा है. जिले में परीक्षा के लिए कुल आठ केंद्र बनाए गए थे. अंतिम दिन दूसरी पाली में एक परीक्षा केंद्र पर प्रयागराज का रहने वाला एक अभ्यर्थी परीक्षा देने पहुंचा. शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन दस्तावेजों की जांच और अभ्यर्थी की शारीरिक बनावट देखकर केंद्र प्रभारी को कुछ गड़बड़ी का एहसास हुआ. बताया जा रहा है कि प्रवेश पत्र और अन्य दस्तावेजों में दर्ज उम्र अभ्यर्थी के वास्तविक व्यक्तित्व से मेल नहीं खा रही थी. यही संदेह आगे चलकर एक बड़े खुलासे की वजह बना.
चेहरे ने बढ़ाया शक, शुरू हुई जांच
परीक्षा के दौरान केंद्र प्रभारी ने अभ्यर्थी को गौर से देखा. दस्तावेजों के अनुसार उसकी उम्र अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही थी, लेकिन उसके चेहरे और शारीरिक बनावट से उम्र कहीं अधिक लग रही थी. यही बात अधिकारियों को खटक गई. केंद्र प्रभारी ने मामले की सूचना तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों को दी. इसके बाद अभ्यर्थी से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो सामान्य सवाल पूछे गए, लेकिन जब दस्तावेजों और शैक्षणिक रिकॉर्ड की पड़ताल हुई तो मामला और गंभीर होता चला गया. जांच के दौरान जो जानकारी सामने आई, उसने अधिकारियों को भी चौंका दिया. पूछताछ में अभ्यर्थी ने स्वीकार किया कि उसने अपनी उम्र कम दिखाने के लिए दोबारा हाईस्कूल की परीक्षा दी थी.
उम्र घटाने के लिए दोबारा दी हाईस्कूल परीक्षा
पुलिस के अनुसार अभ्यर्थी ने पहली बार वर्ष 2001 में हाईस्कूल और वर्ष 2004 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की थी. यदि इन रिकॉर्डों को आधार माना जाए तो उसकी वास्तविक जन्मतिथि और उम्र वर्तमान दस्तावेजों से बिल्कुल अलग निकलती है. पूछताछ में उसने बताया कि बाद में उम्र कम कराने के उद्देश्य से वर्ष 2014 में उसने दोबारा हाईस्कूल की परीक्षा पास की. इसी नए प्रमाणपत्र के आधार पर उसने अपने अन्य दस्तावेजों में भी जन्मतिथि बदलवा ली. यहीं से पूरा मामला जालसाजी की श्रेणी में पहुंच गया. अधिकारियों को संदेह हुआ कि भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के लिए उम्र संबंधी पात्रता पूरी करने के उद्देश्य से यह बदलाव किया गया है.
1985 से सीधे 1998 तक पहुंच गई जन्मतिथि
जांच में सामने आया कि अभ्यर्थी की वास्तविक जन्म वर्ष 1985 बताई जा रही है, जबकि बाद में तैयार कराए गए दस्तावेजों में जन्म वर्ष 1998 दर्ज कराया गया. यानी कागजों पर उम्र एक झटके में लगभग 13 वर्ष कम हो गई. आमतौर पर सरकारी नौकरियों में आयु सीमा महत्वपूर्ण पात्रता शर्त होती है. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति उम्र कम दिखाकर आवेदन करता है तो यह भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. परीक्षा केंद्र पर सामने आए इस मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सरकारी भर्तियों में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया कितनी अहम है.
परीक्षा केंद्र से ही हिरासत में लिया गया
पूछताछ के दौरान जब अभ्यर्थी के बयान और दस्तावेजों के बीच विसंगतियां स्पष्ट हो गईं तो पुलिस को सूचना दी गई. इसके बाद उसे हिरासत में ले लिया गया. परीक्षा समाप्त होने के बाद आरोपी को कोतवाली लाया गया, जहां उससे विस्तृत पूछताछ की गई. केंद्र प्रभारी की तहरीर के आधार पर पुलिस ने उसके खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और अन्य संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. अब पुलिस यह भी जांच कर रही है कि दस्तावेजों में बदलाव की प्रक्रिया कैसे पूरी की गई और क्या इसमें किसी अन्य व्यक्ति की भी भूमिका रही है.
एसपी पलाश बंसल ने क्या बताया?
बांदा के पुलिस अधीक्षक पलाश बंसल ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि परीक्षा के दौरान एक अभ्यर्थी की भौतिक आयु और प्रवेश पत्र पर दर्ज आयु में अंतर दिखाई दिया था. इसी आधार पर केंद्र प्रभारी को संदेह हुआ और पूछताछ शुरू की गई. एसपी के अनुसार पूछताछ में अभ्यर्थी ने स्वीकार किया कि उसने पहली बार वर्ष 2001 में हाईस्कूल और 2004 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की थी. बाद में उम्र कम दिखाने के उद्देश्य से उसने 2014 में दोबारा हाईस्कूल परीक्षा पास की और उसी के आधार पर आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों में जन्मतिथि बदलवा ली. पुलिस अधीक्षक ने बताया कि केंद्र प्रभारी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है.
भर्ती परीक्षाओं में बढ़ी सतर्कता
हाल के वर्षों में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में फर्जी दस्तावेज, प्रतिरूपण और आयु संबंधी गड़बड़ियों के मामले सामने आते रहे हैं. इसी वजह से परीक्षा केंद्रों पर निगरानी व्यवस्था पहले से अधिक सख्त की गई है. बांदा में सामने आया यह मामला भी अधिकारियों की सतर्कता का परिणाम माना जा रहा है. यदि केंद्र प्रभारी को संदेह न होता तो संभव है कि यह मामला दस्तावेजों के बीच ही दबकर रह जाता. विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्ड और आधार आधारित सत्यापन के बावजूद दस्तावेजों में हेराफेरी की कोशिशें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. ऐसे मामलों में मानवीय सतर्कता भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
अब आगे क्या होगा?
मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है. जांच में यह पता लगाया जाएगा कि अभ्यर्थी ने किन दस्तावेजों के आधार पर जन्मतिथि बदलवाई और क्या उसने किसी अन्य सरकारी भर्ती या प्रक्रिया में भी इन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था. यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और कड़ी हो सकती है. साथ ही संबंधित दस्तावेजों की वैधता की भी जांच की जाएगी. फिलहाल बांदा में सामने आया यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है. वजह सिर्फ दस्तावेजों में कथित हेराफेरी नहीं, बल्कि यह भी है कि जिस उम्र को कागजों में बदल दिया गया था, वही उम्र परीक्षा केंद्र पर चेहरे के हावभाव और व्यक्तित्व के जरिए अधिकारियों के संदेह की वजह बन गई.
सिद्धार्थ गुप्ता