इस स्टेशन पर रोज टिकट खरीदते हैं लोग, लेकिन ट्रेन में कभी नहीं बैठते

साल 1954 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विशेष प्रयास से इस स्टेशन को बनाने की मंजूरी मिली थी. इसका उद्घाटन उस समय के रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था.

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रेलवे की फाइलों से अपनी यादें छीन लाए गांव वाले ( साकेंतिक फोटो: Pexels) रेलवे की फाइलों से अपनी यादें छीन लाए गांव वाले ( साकेंतिक फोटो: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 11 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:51 PM IST

आपने आज तक सुना होगा कि बिना टिकट ट्रेन में चढ़ने पर जुर्माना लगता है या जेल हो जाती है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे रेलवे स्टेशन के बारे में सुना है, जहां लोग रोज लाइन लगाकर टिकट तो खरीदते हैं, पर ट्रेन में सवार तक नहीं होते.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में यह हकीकत है. यहां के दयालपुर रेलवे स्टेशन को बचाने के लिए गांव वालों ने एक ऐसी अनोखी मुहिम छेड़ रखी है, जो उनके लिए किसी मिशन से कम नहीं है. लोग अपनी जेब से चंदा जुटाते हैं और सिर्फ इसलिए टिकट खरीदते हैं ताकि यह स्टेशन दोबारा बंद न हो जाए. आखिर क्यों यहां के लोग बिना ट्रेन में चढ़े टिकट खरीदते हैं? जानिए इस अनोखे स्टेशन की पूरी कहानी.

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प्रयागराज जंक्शन से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित इस दयालपुर रेलवे स्टेशन का इतिहास बहुत पुराना और खास है. पंडित जवाहरलाल नेहरू के विशेष प्रयास से इस स्टेशन को बनाने की मंजूरी मिली थी. इसका उद्घाटन उस समय के रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था. करीब पांच दशकों तक यह स्टेशन आसपास के दर्जनों गांवों की लाइफलाइन बना रहा. लोग यहां से ट्रेनों में आते-जाते थे और स्टेशन हमेशा गुलजार रहता था.

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जब रेलवे ने जड़ दिया था ताला

वक्त बदला और धीरे-धीरे इस स्टेशन पर यात्रियों की संख्या कम होने लगी. रेलवे के नियमों के मुताबिक, अगर किसी स्टेशन पर टिकट बिक्री एक तय सीमा से नीचे चली जाए, तो उसे बंद किया जा सकता है. दयालपुर स्टेशन के साथ भी यही हुआ. साल 2006 में रेलवे ने इसे बंद कर दिया. स्टेशन बंद होते ही इलाके के लोगों का संपर्क शहर से कट गया और उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

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मजबूरी में शुरू हुई गांव वालों की अनोखी ड्यूटी

ग्रामीणों के लंबे इंतजार और संघर्ष के बाद आखिरकार जनवरी 2022 को रेलवे ने स्टेशन के गेट दोबारा खोले तो सही, लेकिन इस बार इसे सिर्फ एक 'हॉल्ट' का दर्जा दिया गया. यानी अब यहां पहले की तरह सारी ट्रेनें नहीं, बल्कि सिर्फ गिनी-चुनी गाड़ियां ही रुकती हैं. स्टेशन तो खुल गया, पर गांव वालों के मन में एक गहरा डर भी था. डर इस बात का कि अगर टिकटों की बिक्री फिर से कम हुई, तो रेलवे फिर से घाटे का हवाला देकर इस पर ताला लटका देगा.

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बस, इसी डर ने एक ऐसी पहल को जन्म दिया जो शायद ही कहीं और देखने को मिले. गांव वालों ने मिलकर तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, हर दिन टिकट बिक्री का जो न्यूनतम टारगेट है, उसे पूरा किया जाएगा. इसके लिए गांव में आपस में चंदा जुटाया जाता है और रोज कुछ लोग बारी-बारी से स्टेशन की टिकट खिड़की पर पहुंचते हैं. वे वहां से टिकट खरीदते हैं और बिना ट्रेन में चढ़े चुपचाप अपने घर लौट आते हैं. उनके लिए ये टिकट सफर का जरिया नहीं, बल्कि अपने स्टेशन की सांसें चलाने की एक औपचारिकता है, ताकि रेलवे के रिकॉर्ड में बिक्री दर्ज रहे और उनकी ये ऐतिहासिक विरासत हमेशा के लिए जिंदा रहे.
 

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