FIFA वर्ल्ड कप पर संकट, भारत-चीन में अटका टेलीकास्ट, अब कैसे और कहां देखेंगे फैन्स?

FIFA वर्ल्ड कप 2026 शुरू होने में सिर्फ 32 दिन बचे हैं, लेकिन भारत और चीन समेत कई एशियाई देशों में अब तक ब्रॉडकास्ट डील फाइनल नहीं हुई है. FIFA की भारी कीमतों के कारण ब्रॉडकास्टर्स पीछे हट रहे हैं. भारत में रिलायंस-डिज्नी ने ऑफर ठुकराया, जबकि चीन में CCTV से बातचीत जारी है. इससे अरबों फुटबॉल फैन्स की चिंता बढ़ गई है.

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वर्ल्ड कप से पहले बड़ा झटका, FIFA को नहीं मिले खरीदार, एशिया में हंगामा (Photo: PTI) वर्ल्ड कप से पहले बड़ा झटका, FIFA को नहीं मिले खरीदार, एशिया में हंगामा (Photo: PTI)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:08 PM IST

FIFA World Cup 2026: FIFA वर्ल्ड कप 2026 शुरू होने में अब सिर्फ 32 दिन बाकी हैं, लेकिन दुनिया के दो सबसे बड़े बाजार भारत और चीन में अब तक टूर्नामेंट के ब्रॉडकास्ट राइट्स तय नहीं हो पाए हैं. हालात ऐसे हैं कि करीब 3 अरब लोगों को अभी तक यह नहीं पता कि वे फुटबॉल के सबसे बड़े टूर्नामेंट का लाइव प्रसारण देख पाएंगे या नहीं.

अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा की मेजबानी में 11 जून से शुरू होने वाले  फुटबॉल वर्ल्ड कप 2026 के लिए FIFA लगातार ब्रॉडकास्टर्स से बातचीत कर रहा है, लेकिन उसकी भारी-भरकम मांग कई देशों को मंजूर नहीं हो रही.

रिपोर्ट के मुताबिक FIFA की एक बड़ी टीम इस समय बीजिंग में डेरा डाले हुए है. इसमें FIFA (Federation Internationale de Football Association /International Federation of Association Football) के सेक्रेटरी जनरल मैटियास ग्राफस्ट्रॉम और मीडिया राइट्स डायरेक्टर जीन-क्रिस्टोफ पेटिट शामिल हैं. उनका मकसद चीन के सरकारी ब्रॉडकास्टर CCTV को किसी तरह डील के लिए राजी करना है.

बताया गया कि FIFA ने शुरुआत में चीन से करीब 300 मिलियन डॉलर की मांग की थी, जबकि CCTV सिर्फ 80 मिलियन डॉलर तक खर्च करने को तैयार था. बाद में बातचीत 120 से 150 मिलियन डॉलर के बीच पहुंची, लेकिन अब तक सहमति नहीं बन सकी है.

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि FIFA अब अपनी मांग में 50 प्रतिशत से ज्यादा कटौती करने को तैयार है ताकि मई के आखिर तक समझौता हो सके. चीन में यह भी चर्चा है कि 2026 के साथ-साथ 2030 वर्ल्ड कप पैकेज पर भी बातचीत चल रही है.

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भारत में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है. Reuters की रिपोर्ट के अनुसार रिलायंस-डिज्नी जॉइंट वेंचर ने 2026 वर्ल्ड कप के लिए करीब 20 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव दिया था, जिसे FIFA ने अपनी अपेक्षा से काफी कम माना. इसके बाद डील फिलहाल रुक गई.

इस बीच भारत में यह चर्चा भी तेज हो गई कि कहीं एक बार फिर दूरदर्शन वर्ल्ड कप के प्रसारण अधिकार हासिल ना कर ले. हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

एशियाई देशों में सबसे बड़ी समस्या मैचों का समय भी माना जा रहा है. चीन में मुकाबले तड़के करीब 3 बजे प्रसारित होंगे, ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स को डर है कि दर्शकों की संख्या उम्मीद से कम रह सकती है. ऊपर से चीन की टीम टूर्नामेंट में क्वालिफाई भी नहीं कर पाई है, जिससे टीवी कंपनियां इतने बड़े निवेश को लेकर सवाल उठा रही हैं.

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भारत और चीन के अलावा थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों में भी FIFA की कीमतों को लेकर विवाद जारी है. थाईलैंड में तो हालात ऐसे हो गए कि वहां के प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल को खुद दखल देना पड़ा. उन्होंने फैन्स को भरोसा दिलाया कि देश के लोग वर्ल्ड कप देखने से वंचित नहीं रहेंगे.

दरअसल, थाईलैंड में पिछले साल फुटबॉल वर्ल्ड कप को 'Must Have' सूची से हटा दिया गया था. इसका मतलब था कि टूर्नामेंट फ्री-टू-एयर टीवी पर दिखाना जरूरी नहीं रहेगा. इसके बाद लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली.

2022 वर्ल्ड कप से पहले भी थाईलैंड को आखिरी समय में करीब 33 मिलियन डॉलर की डील करनी पड़ी थी. उस समय सरकार और निजी कंपनियों ने मिलकर फंड जुटाया था.
एशियाई बाजारों में पाइरेसी भी FIFA के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. 2018 और 2022 वर्ल्ड कप के दौरान अवैध स्ट्रीमिंग काफी बढ़ गई थी, जिससे ब्रॉडकास्ट राइट्स की वैल्यू प्रभावित हुई.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Weibo पर कथित ब्रॉडकास्ट डील्स की रकम भी वायरल हुई. इसमें जापान के लिए 200 मिलियन डॉलर, हॉन्गकॉन्ग के लिए 25 मिलियन डॉलर, जर्मनी के लिए 120 मिलियन डॉलर और इंग्लैंड के लिए दो वर्ल्ड कप के 350 मिलियन डॉलर बताए गए.

FIFA ने हालांकि इस पूरे मामले पर चुप्पी बनाए रखी है. रॉयटर्स को जारी बयान में संगठन ने कहा कि चीन और भारत में मीडिया राइट्स को लेकर बातचीत जारी है और फिलहाल इसे गोपनीय रखा जाएगा. रॉयटर्स के आंकड़ों के मुताबिक 2022 वर्ल्ड कप की ग्लोबल टीवी रीच में चीन की हिस्सेदारी 17.7 प्रतिशत थी, जबकि भारत की हिस्सेदारी 2.9 प्रतिशत रही. डिजिटल स्ट्रीमिंग में दोनों देशों का संयुक्त योगदान 22.6 प्रतिशत था. यही वजह है कि FIFA इन बाजारों को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता.

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