T20 World Cup 2026 में ICC की 'सेटिंग' ने जिम्बाब्वे का जोश और खेल दोनों बिगाड़ दिया

टी-20 वर्ल्ड कप में जिम्बाब्वे ने वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. मैदान पर पसीना बहाकर उन्होंने टॉप की कुर्सी हासिल की, लेकिन ICC के किताबी नियमों ने उनके हक पर डाका डाल दिया. पेश है इस नाइंसाफी पर एक तीखी चोट.

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टी-20 वर्ल्ड कप के प्री-सीडिंग फॉर्मेट ने रोमांच थोड़ा गड़बड़ कर दिया है. टी-20 वर्ल्ड कप के प्री-सीडिंग फॉर्मेट ने रोमांच थोड़ा गड़बड़ कर दिया है.

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 21 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:30 AM IST

कहते हैं कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है, लेकिन ICC ने इसे 'निश्चितताओं' का धंधा बना दिया है. जिम्बाब्वे की टीम ने इस वर्ल्ड कप में जो किया, उसे देखकर बरबस ही फिल्म लगान का वो डायलॉग याद आता है-  'तुम जीते तो दोगुना लगान माफ, और हम जीते तो...' लेकिन यहां तो जिम्बाब्वे जीत गया, फिर भी उसे इनाम के बदले 'पुराना हिसाब' थमा दिया गया. जब जिम्बाब्वे ने मैदान पर ऑस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीम को धूल चटाई और अपने ग्रुप में सीना तानकर टॉप पर रहा, तो दुनिया को लगा कि अब इस 'जायंट किलर' को उसका हक मिलेगा. कायदे से ग्रुप टॉपर को सुपर-8 में कुछ सहूलियत मिलनी चाहिए थी, लेकिन ICC की 'प्री-सीडिंग' वाली फाइल ने खेल शुरू होने से पहले ही जिम्बाब्वे की किस्मत लिख दी थी.

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ICC का ये 'प्री-सीडिंग' सिस्टम किसी पुराने ढर्रे की सरकारी फाइल जैसा है. इन्होंने पहले ही तय कर लिया था कि 'X1' इंडिया होगा और 'X2' ऑस्ट्रेलिया. अब चाहे जिम्बाब्वे खून-पसीना एक करके टॉप पर आ जाए, उसे 'X2' की ही जर्सी पहननी पड़ेगी.

क्योंकि ब्रॉडकास्टर्स को डर है कि अगर शेड्यूल बदला तो विज्ञापन के रेट गिर जाएंगे. ICC का तर्क साफ रहता है -  लॉजिस्टिक्स, ब्रॉडकास्ट कमिटमेंट्स और फैन्स की सुविधा. बड़े टूर्नामेंट महीनों पहले प्लान होते हैं- टिकट, वेन्यू, ट्रैवल, टीवी स्लॉट सब फिक्स रहते हैं. ऐसे में X1, Y1 जैसे स्लॉट अक्सर टूर्नामेंट से पहले ही तय कर दिए जाते हैं.

यह तो वही बात हुई कि क्लास में टॉप कोई और करे, और मेडल उस लड़के को मिले जो पहले से 'फेवरेट' था. जिम्बाब्वे के साथ यह बर्ताव सिर्फ एक टीम के साथ नाइंसाफी नहीं है, बल्कि उस जज्बे का अपमान है जो छोटी टीमें बड़े मंच पर लेकर आती हैं.

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जिम्बाब्वे का यहां तक पहुंचना कोई तुक्का नहीं है. पिछले कुछ सालों में इस टीम ने वो मंजर देखे हैं जो किसी भी क्रिकेट बोर्ड की कमर तोड़ दें. कभी बोर्ड सस्पेंड हुआ, तो कभी फंड्स की कमी से खिलाड़ियों के पास जूते तक नहीं थे. 2024 के वर्ल्ड कप में तो ये टीम क्वालिफाई तक नहीं कर पाई थी. युगांडा जैसी टीम से हारकर बाहर होना किसी सदमे से कम नहीं था. लेकिन 'मुकद्दर का सिकंदर' रजा और उनकी टोली ने हार नहीं मानी. मुजराबानी की रफ्तार और ब्रायन बेनेट जैसे युवाओं ने दिखा दिया कि जब पेट खाली हो और सीने में आग, तो दुनिया की बड़ी से बड़ी टीम बौनी नजर आती है. ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका को उन्हीं के घर जैसे माहौल में हराना बताता है कि ये टीम अब सिर्फ 'भागीदारी' करने नहीं, बल्कि 'राज' करने आई है.

शायरी की जुबान में कहें तो:

मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है,
पर यहां तो मंजिलें पहले से ही किसी और के नाम होती हैं!

ICC तर्क देती है कि यह सब लॉजिस्टिक्स और फैन्स की सुविधा के लिए है. लेकिन भाईसाहब, अगर फैन्स को सिर्फ 'फिक्स शेड्यूल' ही देखना है, तो फिर मैदान पर इस जंग की जरूरत ही क्या है? फिर तो टॉस से पहले ही बता दीजिए कि सेमीफाइनल कौन खेलेगा. अगर आज भारत या इंग्लैंड जैसी टीम ग्रुप में टॉप करती, तो पूरा सिस्टम उनके स्वागत में खड़ा होता. लेकिन जब जिम्बाब्वे जैसा 'अंडरडॉग' उलटफेर करता है, तो उसे नियमों की बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है. यह सिस्टम छोटी टीमों को आगे बढ़ने का मौका नहीं, बल्कि सिर्फ 'संख्या पूरी करने' का जरिया समझता है.

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मिसाल के तौर पर, 1983 में जब भारत ने वेस्टइंडीज को हराया था, तब किसी ने ये नहीं कहा था कि 'शेड्यूल तो वेस्टइंडीज के हिसाब से बनेगा.' आज खेल पर 'मार्केट' का कब्जा है. जिम्बाब्वे को वही मैच खेलने पड़ रहे हैं जो ऑस्ट्रेलिया के लिए तय थे. यानी मेहनत जिम्बाब्वे की, और मलाई काटने की तैयारी किसी और की. जिम्बाब्वे ने तो अपना काम कर दिया. उन्होंने बता दिया कि बल्ला जब बोलता है, तो रैंकिंग की गूंज दब जाती है. अब बारी ICC की है कि वो अपनी इस 'प्री-सीडिंग' वाली दुकान को बंद करे और खेल को मैदान के प्रदर्शन के हिसाब से चलने दे. वरना याद रखिये, जब छोटी टीमें बागी होती हैं, तो बड़े-बड़े साम्राज्यों के सिंहासन हिल जाते हैं.

जिम्बाब्वे या उस जैसी छोटी टीम को लड़ते रहना होगा. क्यूंकि शेड्यूल भले ही तुम्हारे हक में न हो, लेकिन कई क्रिकेटप्रेमी उनके हक में ज़रूर रहते हैं. क्योंकि इतिहास गवाह है, "सुलतान" वही होता है जो अपनी किस्मत खुद लिखता है, किसी की छोड़ी हुई कुर्सी पर नहीं बैठता.

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