एलन मस्क, नासा और चीन चाहकर भी चांद या मंगल पर इंसानी कॉलोनी चाहें तो नहीं बना सकते. क्योंकि स्पेस में स्पर्म भटक जाते हैं. वो सही रास्ता नहीं खोज पाते. इसलिए स्पेस में रहने वाले एस्ट्रोनॉट्स के लिए बच्चे पैदा करने में मुश्किल होगी. जब बच्चे पैदा ही नहीं होंगे तो कॉलोनी कैसे और किसके लिए बसेगी.
पृथ्वी पर ग्रैविटी की वजह से स्पर्म अंडे तक सही रास्ता ढूंढ लेते हैं. लेकिन स्पेस के माइक्रोग्रेविटी में स्पर्म भटक जाते हैं. नई स्टडी में पता चला है कि माइक्रोग्रेविटी में स्पर्म का नेविगेशन, अंडा फर्टिलाइजेशन और भ्रूण का विकास तीनों ही बुरी तरह प्रभावित होते हैं. यह खोज स्पेस में लंबे समय तक इंसानी कॉलोनी के सपने को नया खतरा बता रही है.
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स्टडी कैसे की गई और क्या पता चला?
ऑस्ट्रेलिया की एडिलेड यूनिवर्सिटी की रिसर्च निकोल मैकफर्सन की टीम ने पृथ्वी पर ही माइक्रोग्रेविटी की कॉपी करने के लिए क्लिनोस्टेट मशीन का इस्तेमाल किया. यह मशीन सेल्स को तेजी से घुमाती है ताकि ग्रैविटी की कोई दिशा न रहे. इससे स्पेस जैसी स्थिति बन जाती है.
टीम ने इंसान, चूहे और सूअर के स्पर्म को छोटे-छोटे मेज (maze) में डाला जो महिला के रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट यानी मादा के प्रजनन अंग जैसा था. नतीजा चौंकाने वाला था. माइक्रोग्रेविटी में बहुत कम स्पर्म मेज के अंत तक पहुंच पाए. पृथ्वी के सामान्य गुरुत्वाकर्षण में जितने स्पर्म सही रास्ता ढूंढ लेते थे, उससे कहीं कम स्पर्म स्पेस जैसी स्थिति में सफल हुए.
स्पर्म क्यों भटक जाते हैं?
स्पर्म की सतह पर कई प्रोटीन मैकेनोसेंसर्स की तरह काम करते हैं. ये प्रोटीन ग्रैविटी के हल्के-से खिंचाव को भी महसूस करते हैं. स्पर्म को सही दिशा दिखाते हैं. जब ग्रैविटी ही नहीं रहती ही नहीं रहता तो ये सेंसर्स कन्फ्यूज हो जाते हैं. स्पर्म इधर-उधर भटकने लगता है.
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महिला शरीर में ओवुलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन हार्मोन निकलता है जो स्पर्म को अंडे की ओर गाइड करता है. स्पेस में भी यह हार्मोन डाला गया, लेकिन काम करने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा लगानी पड़ी, जो शरीर में स्वाभाविक रूप से नहीं होती. यानी ज्यादा मात्रा में प्रोजेस्टेरोन शरीर से निकलेगा नहीं तो स्पर्म भटक जाएंगे.
फर्टिलाइजेशन और भ्रूण के विकास पर असर
स्टडी में चूहे के अंडे के फर्टिलाइजेशन की सफलता 30 प्रतिशत कम हो गई. सूअर में 15% कम. फर्टिलाइजेशन के छह दिन बाद सूअर के भ्रूण ता विकास देरी से हुआ. भ्रूण को गर्भाशय की दीवार में जुड़ने के लिए भी गुरुत्वाकर्षण की जरूरत होती है. उसके बाद भ्रूण के सेल्स को सही से व्यवस्थित होना होता है ताकि सारे अंग बन सकें. प्लेसेंटा ठीक से काम करे, इसलिए ग्रैविटी बहुत जरूरी है. स्पेस की माइक्रोग्रेविटी इन प्रक्रियाओं को बिगाड़ देती है.
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चंद्रमा और मंगल पर बसावट का क्या होगा?
चंद्रमा और मंगल पर स्थाई मानव कॉलोनी बनाने के प्रोजेक्ट चल रहे हैं. लेकिन यह स्टडी बताती है कि सिर्फ एस्ट्रोनॉट्स को जिंदा रखना काफी नहीं है. वहां बच्चे पैदा करना. भ्रूण का विकास करना. स्वस्थ पीढ़ी तैयार करना बड़ी चुनौती होगा. अगर स्पेस में गुरुत्वाकर्षण न होने से स्पर्म भटकते हैं. फर्टिलाइजेशन कम होता है. भ्रूण में देरी होती है तो भविष्य में स्पेस में रहने वाले परिवारों के लिए रिप्रोडक्शन बड़ी समस्या बन सकती है.
क्या समाधान हो सकता है?
रिसर्चर निकोल मैकफर्सन कहती हैं कि ग्रैविटी जीवन का सिर्फ बैकग्राउंड नहीं, बल्कि जीवन बनाने की हर प्रक्रिया में गहराई से शामिल है. अभी तो यह स्टडी पृथ्वी पर सिमुलेटेड माइक्रोग्रेविटी में की गई है. असली स्पेस में और लंबे समय तक परीक्षण की जरूरत है.
हो सकता है भविष्य में स्पेस स्टेशनों में आर्टिफिशियल ग्रैविटी बनाया जाए या दवाइयों से स्पर्म और भ्रूण को सपोर्ट किया जाए. लेकिन फिलहाल एक बात तो क्लियर है कि स्पेस कॉलोनाइजेशन सिर्फ रॉकेट और हाइपरस्पीड ट्रैवल की नहीं, बल्कि बुनियादी जीव विज्ञान की भी चुनौती है.
यह स्टडी 26 मार्च 2026 को जर्नल Communications Biology में छपी है. यह हमें याद दिलाती है कि पृथ्वी पर हम ग्रैविटी की अहमियत भूल जाते हैं, लेकिन स्पेस में यह हमारे अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा फैक्टर साबित होगा.
आजतक साइंस डेस्क