प्रयागराज में संगम के नीचे मिली प्राचीन नदी, कहीं ये 'सरस्वती' तो नहीं?

प्रयागराज संगम पर वैज्ञानिकों ने गंगा-यमुना के बीच जमीन के अंदर 4-5 KM चौड़ी प्राचीन नदी की खोज की है. NGRI के शोधकर्ताओं ने ड्रिलिंग से इसकी पुष्टि की. यह खोज सरस्वती नदी के विश्वास को मजबूत करती है.

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इस तस्वीर में जो काली लाइन दिख रही है वही है प्राचीन नदी. (Photo: CSIR-NGRI) इस तस्वीर में जो काली लाइन दिख रही है वही है प्राचीन नदी. (Photo: CSIR-NGRI)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:22 PM IST

प्रयागराज के संगम को सदियों से गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी के मिलन के रूप में पूजा जाता रहा है. अब वैज्ञानिकों ने इस विश्वास को मजबूत करने वाला बड़ा सबूत दिया है. हैदराबाद के CSIR-National Geophysical Research Institute (NGRI) के वैज्ञानिकों ने एडवांस तकनीक से पता लगाया है कि गंगा और यमुना के बीच जमीन के अंदर एक विशाल प्राचीन नदी (पेलियो रिवर) बहती थी. यह खोज संगम की पौराणिक कहानी को वैज्ञानिक आधार दे रही है.

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NGRI के वैज्ञानिकों ने एयरबोर्न जियोफिजिकल तकनीक (हेलीकॉप्टर से सर्वे) और कन्फर्मेटरी ड्रिलिंग (बोरिंग) का इस्तेमाल किया.  डॉ. सुबाष चंद्रा की टीम गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में 10-15 मीटर नीचे एक बड़ी नदी की घाटी का पता लगाया. उन्होंने कहा कि यह खोज पूरी तरह पुष्ट है. हमने ड्रिलिंग कर फिजिकल प्रूफ हासिल कर लिए हैं. 

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कैसी है यह प्राचीन नदी?

यह जमीन के नीचे दबी हुई नदी यानी पेलियो चैनल 4 से 5 किलोमीटर चौड़ा है, जो गंगा और यमुना जितना बड़ा है. इसकी गहराई और आधार स्तर दोनों नदियों के समान है, जो साबित करता है कि यह कोई अलग नदी थी, न कि गंगा या यमुना का पुराना रास्ता. 

नदी में घुमावदार पैटर्न भी देखे गए, जो बताते हैं कि यह गंगा-यमुना के साथ-साथ बहती थी. शुरुआत में 45 किलोमीटर लंबाई का पता चला, बाद में नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के सहयोग से इसे कानपुर तक बढ़ाकर 200 किलोमीटर कर दिया गया. वैज्ञानिकों को संदेह है कि यह और आगे पश्चिम की ओर, हिमालय की तरफ भी फैली हो सकती है.

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वैज्ञानिकों ने संगम से लगभग 25 किलोमीटर पहले तक इस नदी को साफ पहचाना है. प्रयागराज शहर के अंदर घनी आबादी, बिजली के तार और इमारतों की वजह से सर्वे करना मुश्किल था. शहर के ऊपर सर्वे नहीं हो सका, लेकिन हम यह नहीं मानते कि नदी संगम के पास नहीं पहुंचती. समय के साथ नदियों का रास्ता बदलता रहता है. 

नदी में आंशिक रूप से पानी है और आंशिक रूप से सूखी है. यह दबी हुई नदी एक आपस में जुड़े हुए एक्वीफर  सिस्टम का हिस्सा है, जो गंगा और यमुना से जुड़ा हुआ है. इससे क्षेत्र में भूजल स्तर बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

भूजल संकट के लिए बड़ी उम्मीद

गंगा के मैदान में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्राचीन नदी चैनल को रिचार्ज करके बारिश का पानी और सतही पानी को भूमिगत किया जा सकता है. इससे गर्मियों में नदियों में पानी बढ़ेगा और भूजल की गुणवत्ता भी बेहतर होगी. यह खोज जल प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और भूजल सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

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हालांकि, इस दबी हुई नदीं की लोकेशन और आकार पौराणिक सरस्वती नदी के वर्णन से काफी मेल खाता है. यह खोज इसलिए खास है क्योंकि यह नदी गंगा और यमुना जितनी बड़ी है और संगम के पास स्थित है. इससे पहले भी पेलियो चैनल मिले हैं, लेकिन इतना बड़ा, निरंतर और संगम के करीब यह पहली बार मिला है. 

प्रयागराज संगम अब सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं रहा. यह भूवैज्ञानिक इतिहास और आधुनिक विज्ञान का भी संगम बन गया है. NGRI की यह खोज साबित करती है कि गंगा और यमुना के साथ एक तीसरी बड़ी नदी भी यहां बहती थी, जो समय के साथ जमीन के अंदर दब गई. 

यह खोज जल संकट से जूझ रहे क्षेत्र के लिए नई उम्मीद जगाती है. आगे के अध्ययन और रिचार्ज प्रोजेक्ट से भूजल बढ़ाने और नदियों को जीवंत रखने में मदद मिल सकती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि डेटा, ड्रिलिंग और खोज के जरिए संगम की पूरी कहानी अब धीरे-धीरे सामने आ रही है.
 

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