Chaitra Navratri 2026 Katha: इस कथा के बिना अधूरा है चैत्र नवरात्र का व्रत, यहां पढ़ें पूरी कथा

Chaitra Navratri 2026 Katha: चैत्र नवरात्र की आज से शुरुआत हो चुकी है. तो आइए अब सुनते हैं महिषासुर और मां दुर्गा से संबंधित चैत्र नवरात्र की व्रत कथा, जिसके बिना यह 9 दिन अधूरे माने जाते हैं.

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चैत्र नवरात्र पर आज पढ़ें ये विशेष कथा (Photo: ITG) चैत्र नवरात्र पर आज पढ़ें ये विशेष कथा (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:16 AM IST

Chaitra Navratri 2026: द्रिक पंचांग के अनुसार, चैत्र नवरात्र की शुरुआत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है और यह पर्व नौ दिनों तक चलता है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है और कई लोग व्रत भी रखते हैं. मान्यता है कि इस दौरान सच्चे मन से मां भगवती की उपासना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में शुभ फल मिलते हैं. नवरात्र के पहले दिन घर में कलश स्थापना (घटस्थापना) की जाती है और अखंड ज्योत जलाई जाती है. इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार पर माता रानी की कृपा बनी रहती है. इस पर्व का समापन नवमी तिथि को होता है, जिसे राम नवमी के रूप में भी मनाया जाता है. चलिए अब चैत्र नवरात्र की पौराणिक कथा सुनते हैं. 

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चैत्र नवरात्र की व्रत कथा

चैत्र नवरात्र की पौराणिक कथा के मुताबिक, शास्त्रों में एक महिषासुर नाम के राक्षस का जिक्र मिलता है, जो कि बहुत ही शक्तिशाली था. धरती पर उसने धरती पर अत्याचार बढ़ा दिए थे. उसे ऐसा वरदान मिला था कि कोई देवता या दानव उसे नहीं मार सकता है. उसके अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवताओं ने देवी पार्वती से मदद मांगी. तब मां ने अपने तेज से नौ रूप धारण किए. देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र देकर और शक्तिशाली बनाया. कई दिनों तक चले युद्ध के बाद देवी ने महिषासुर का वध किया. तभी से नवरात्र मनाने की परंपरा शुरू हुई.

चैत्र नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का महत्व

शास्त्रों के मुताबिक, साल में चार बार नवरात्र आती है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है. नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के जिन रूपों की पूजा की जाती है, उन्हें नवदुर्गा कहा जाता है. पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा होती है. अंतिम दिन कन्या पूजन किया जाता है, जिसमें छोटी बच्चियों को देवी का रूप मानकर भोजन कराया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है.

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