मनुष्य की 72 नाड़ियों में सुषुम्ना नाड़ी को शरीर की सबसे महत्वपूर्ण सूक्ष्म ऊर्जा धाराओं में माना जाता है. योग शास्त्र के अनुसार, शरीर में तीन प्रमुख नाड़ियां होती हैं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना. इड़ा नाड़ियों को चंद्र स्वर और पिंगला को सूर्य स्वर कहा जाता है. जबकि सुषुम्ना नाड़ी दोनों के मध्य स्थित मानी जाती है. जब सुषुम्ना सक्रिय होती है, तब मन स्थिर, शांत और ध्यान के लिए उपयुक्त अवस्था में पहुंच जाता है. इसलिए योग, साधना और तप के लिए यह सबसे उपयुक्त है.
जब दोनों नासिका से सांस बराबर आ रही है तो इसका मतलब सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय है. ऐसे में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए. अगर किसी यात्रा पर जाना है या कोई मंगल कार्य संपन्न करना है तो सुषुम्ना नाड़ी के सक्रिय होने पर उसे शुरू नहीं करना चाहिए. और इड़ा या पिंगला नाड़ी के सक्रिय होने का इंतजार करना.
अलग काम के लिए अलग नाड़ी का सक्रिय होना जरूरी
सामान्यतः व्यक्ति की सांस एक समय में किसी एक नासिका से अधिक प्रवाहित होती है. इसे ही स्वर कहा जाता है. यदि बाईं नासिका सक्रिय हो तो उसे चंद्र स्वर कहा जाता है. और दाईं नासिका सक्रिय हो तो सूर्य स्वर माना जाता है. योग और स्वर विज्ञान में माना जाता है कि अलग-अलग कार्यों के लिए अलग स्वर लाभकारी होता है. उदाहरण के लिए मानसिक कार्यों, अध्ययन और ध्यान के लिए चंद्र स्वर को उपयुक्त माना गया है. जबकि शारीरिक कार्य, निर्णय क्षमता और ऊर्जा से जुड़े कार्यों के लिए सूर्य स्वर को लाभदायक है.
स्वर बदलने की कई पारंपरिक विधियां प्रचलित हैं. सबसे सामान्य तरीका शरीर की स्थिति बदलना माना जाता है. यदि किसी व्यक्ति को दायां स्वर चलाना हो तो वह बाईं ओर करवट लेट सकता है. कुछ समय बाद दाईं नासिका सक्रिय होने लगती है. इसी प्रकार दायां स्वर बंद पर बायां स्वर चलाने के लिए दाईं ओर करवट लेटना चाहिए. या फिर एक ओर की नासिका को बंद कर सांस लेने से भी दूसरी ओर के स्वर को सक्रिय किया जा सकता है.
योग साधना और तप के लिए अच्छी है सुषुम्ना नाड़ी
इसके अलावा, अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम को स्वर संतुलन का प्रभावी माध्यम माना जाता है. नियमित अभ्यास से सांस की गति नियंत्रित होती है और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है. ध्यान के समय दोनों स्वरों के संतुलन को सुषुम्ना जागरण की प्रारंभिक अवस्था माना जाता है. सुषुम्ना नाड़ी का सक्रिय होना साधना और ध्यान में महत्वपूर्ण माना जाता है. जब दोनों नासिकाओं से समान रूप से सांस चलने लगे, तब सुषुम्ना प्रवाहित होती है. यह अवस्था थोड़े समय के लिए आती है और गहन ध्यान के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है. योग परंपरा में इसे मानसिक संतुलन और चेतना के उच्च स्तर से जोड़कर देखा जाता है.
अंशु पारीक