नवरात्र का नौवां और अंतिम दिन देवी सिद्धिदात्री का होता है. देवी सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों को देने वाली हैं और भगवती के शक्ति स्वरूपा का संपूर्ण स्वरूप हैं. नवरात्रि की नवमी पर ही व्रत को पूरा करके 9 कन्याओं की पूजा की परंपरा है. उन्हें देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है और फिर भोजन कराया जाता है. भोजन बहुत साधारण होता है. जिसमें प्रसाद के रूप में हलवा-पूरी, चना, खीर और कोई फल शामिल होते हैं.
कन्या भोज में बैठाते हैं लांगुर?
लेकिन जब आप कन्या भोजन कराते हैं तो इस दौरान उनके साथ एक बालक भी बिठाया जाता है. जो कन्याओं की उम्र का ही होता है. इस बालक को लांगुर कहा जाता है. यूं तो लांगुर को हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है, लेकिन सवाल है कि हनुमान जी श्रीराम के भक्त हैं तो उनका स्थान नौ देवियों के साथ कैसे बन जाता है.
हनुमान जी या हनु भैरव
असल में नौ देवियों की परंपरा में लांगुर का जिक्र होता है,कई तांत्रिक परंपराओं में लांगुर को हनु भैरव का रूप माना जाता है, जबकि सामान्य तौर पर इसे हनुमान जी से जोड़ा जाता है.
हनु भैरव और हनुमान भी वैसे अलग-अलग नहीं हैं और दोनों में समानता ही है. क्योंकि दोनों ही रुद्र के अवतार हैं. जब देवी का लगातार असुरों से युद्ध होता रहा तो इस दौरान वह जितने भयंकर रूप लेती थीं, सभी के साथ एक रुद्र के अंश भैरव भी युद्ध करते थे.
इस दौरान माता की ठुड्डी (हनु) से बालरूप भैरव प्रकट हुए. वह देवी की ही रक्षा के लिए और उनके साथ रहे. हनु भैरव देवी की मूल चेतना शक्ति हैं और तंत्र में हनु भैरव को ऊंचा दर्जा मिला हुआ है.
मन की चंचलता का प्रतीक हैं हनु भैरव
हनु भैरव मन की चंचलता का प्रतीक हैं. अगर चंचल मन को नियंत्रित कर लिया जाए तो वही वीरता में बदल जाता है. इसीलिए प्रतीक रूप में हनु भैरव बंदर के स्वरूप में हैं, लेकिन असल में उनके भीतर गहराई से विचार करने की क्षमता है. वह बुद्धिमान हैं और सबसे पराक्रमी भी हैं. इसीलिए देवी के साथ लांगुर के रूप हनु भैरव को भी पूजा जाता है.
देवी ने दिया भैरव को वरदान
एक कथा ऐसी भी है कि, जब भगवान शिव ने माता दुर्गा की रक्षा के लिए भैरव का रूप धारण किया, तो माता दुर्गा ने वरदान दिया कि जो भी भक्त मेरी पूजा करेगा, उसे भैरव की भी पूजा करनी होगी. तभी पूजा पूर्ण मानी जाएगी. इसी परंपरा के अनुसार कन्या पूजन में लड़के को भैरव का रूप मानकर पूजा में शामिल किया जाता है.
भैरव बाबा को शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने वाला देवता माना जाता है. कन्या पूजन में बटुक या लांगूर बुलाकर उनकी पूजा और भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि आती है और घर की सुरक्षा सुनिश्चित होती है. कई प्रसिद्ध देवी-धामों में भी भैरव का मंदिर होता है, जैसे वैष्णो देवी में, जहां भैरव बाबा के दर्शन किए बिना माता के दर्शन पूरे नहीं माने जाते.
रामायण में भी मिलता है हनु भैरव का जिक्र
हनु भैरव का हनुमान रूप में जिक्र रामायण में भी मिलता है. जहां हनुमान जी राम-रावण युद्ध के दौरान अहि और महि रावण का वध करते हैं. इन दोनों ने श्रीराम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था. हनुमान जी ने देवी की प्रेरणा से देवी का ही रूप लेकर दोनों का वध कर दिया. तब देवी ने ही हनुमान जी को उनके विराट पंचमुखी रूप का ध्यान कराया था और फिर अपना द्वारपाल बना लिया था. इसलिए कन्या पूजा में लांगुर को जरूर बैठाते हैं.
राजस्थान के करौली से निकली है लांगुर परंपरा
देवी के साथ लांगुरिया (लांगुर) परंपरा मुख्य रूप से राजस्थान के करौली में शीतला अष्टमी के अवसर पर, राजशाही जमाने से चली आ रही है. इस परंपरा में शीतला माता की पूजा के बाद मिट्टी से बने लांगुरिया (माता का रक्षक) को पूजा जाता है, जिसे बच्चे और भक्त सुरक्षा और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में अपनाते हैं. लांगुरिया गीत ब्रज संस्कृति का हिस्सा हैं, जिसमें स्त्रियां लांगुरिया को अपने घर का सदस्य मानकर उनसे लाड-प्यार और जिद की बातें करती हैं. मान्यता है कि लांगुरिया के पूजन से घर के बच्चों को बीमारियां और मुसीबतें नहीं आती हैं. यह परंपरा बच्चों को बुरी नजर से बचाने और माता की कृपा पाने के लिए पारंपरिक तरीके से मनाई जाती है.
विकास पोरवाल