राजस्थान की गर्मी का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं. जून का महीना, 40 से 45 डिग्री तापमान और ऊपर से लू के थपेड़े. ऐसे मौसम में इंसान घर से निकलने से पहले दस बार सोचता है. लेकिन जयपुर के आमेर में कुछ ऐसे 'वीआईपी' रहते हैं, जिनके लिए गर्मी से बचाने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं.
हम बात कर रहे हैं आमेर के हाथी गांव की. यह कोई साधारण गांव नहीं है. यहां इंसानों से ज्यादा चर्चा हाथियों की होती है. उनके खाने का मेन्यू तय होता है, हेल्थ चेकअप होता है, कमरों में कूलर चलते हैं और जन्मदिन भी मनाए जाते हैं. सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन यह पूरी तरह सच है.
जयपुर की पहाड़ियों के बीच बसे इस हाथी गांव को भारत का पहला समर्पित हाथी गांव माना जाता है. यहां इस समय 75 हाथी रहते हैं. इनमें ज्यादातर हथनियां हैं और सिर्फ दो नर हाथी. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यहां सभी एक बड़े परिवार की तरह रहते हैं.
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सुबह का नजारा किसी स्कूल पिकनिक से कम नहीं लगता. सूरज निकलते ही हाथियों का पूरा समूह तालाब की ओर निकल पड़ता है. कोई पानी में उतरते ही सूंड से फव्वारा छोड़ता है, कोई अपने साथी पर पानी उछालता है तो कोई आराम से पानी में खड़े होकर गर्मी से राहत लेता है. दूर से देखने पर लगता है जैसे बच्चों का कोई बड़ा ग्रुप वाटर पार्क पहुंच गया हो.
तालाब से लौटने के बाद शुरू होता है उनका स्पेशल स्नान. महावत उन्हें अच्छी तरह नहलाते हैं. गर्मी ज्यादा हो तो दिन में दो से तीन बार तक नहाने की व्यवस्था की जाती है. वजह साफ है- इतने बड़े शरीर को ठंडा रखना भी कोई आसान काम नहीं.
अब बात खाने की. इंसानों की तरह हाथियों का भी समर स्पेशल मेन्यू तैयार किया गया है. गर्मी बढ़ते ही उनके खाने में तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और लौकी जैसी चीजें शामिल कर दी गई हैं. यानी वही चीजें जो गर्मियों में डॉक्टर हमें खाने की सलाह देते हैं. सिर्फ फल ही नहीं. उन्हें सत्तू का घोल दिया जाता है. नारियल पानी भी पिलाया जाता है, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो. नियमित भोजन में गन्ना, ज्वार, गेहूं का दलिया और अन्य पौष्टिक आहार शामिल रहते हैं.
मतलब साफ है... गर्मी में हाथियों की डाइट किसी फिटनेस इन्फ्लुएंसर के चार्ट से कम नहीं. जब बाहर तापमान 40 डिग्री के पार पहुंचता है तो हाथियों के रहने की जगह पर कूलर भी चलाए जाते हैं. आमेर के हाथी गांव में हाथियों के बाड़ों और कमरों में कूलर लगे हुए हैं.
वन विभाग, पर्यटन विभाग और महावत मिलकर यह देखते हैं कि उन्हें गर्मी से कोई परेशानी न हो. हाथियों के कामकाज में भी बदलाव किया गया है. पहले जहां वे नियमित रूप से आमेर किले में पर्यटकों के बीच सक्रिय रहते थे, वहीं अब उनकी ड्यूटी कम कर दी गई है. एक दिन काम और एक दिन आराम का फॉर्मूला अपनाया गया है. आखिर गर्मी इंसानों को ही नहीं, जानवरों को भी लगती है.
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स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखा जाता है. नियमित मेडिकल चेकअप होते हैं. पैरों में दरार न पड़े, त्वचा स्वस्थ रहे और शरीर में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए नीम और सरसों जैसे आयुर्वेदिक तेलों से मालिश की जाती है. लेकिन हाथी गांव की सबसे खूबसूरत कहानी इसके महावतों से जुड़ी है.
जो लोग वर्षों से इन हाथियों के साथ रहते हैं, वे उन्हें जानवर नहीं मानते. उनके लिए ये परिवार के सदस्य जैसे हैं. हर हाथी की अपनी आदत, अपना स्वभाव और अपनी पहचान है. महावत उन्हें नाम से पहचानते हैं और हाथी भी अपने महावत की आवाज पहचान लेते हैं. यही रिश्ता तब और दिलचस्प हो जाता है जब किसी हाथी का जन्मदिन आता है.
यहां जन्मदिन भी मनाया जाता है. फर्क सिर्फ इतना है कि केक की जगह फलों की दावत होती है. तरबूज, केला, गन्ना और दूसरी पसंदीदा चीजों से पूरा बर्थडे बुफे सजाया जाता है और फिर सारे हाथी मिलकर पार्टी करते हैं. आज यह हाथी गांव जयपुर आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का बड़ा केंद्र बन चुका है.
यहां का 108 रुपये का टिकट है. हाथियों को खाना खिला सकते हैं, उनके साथ तस्वीरें खिंचवा सकते हैं और उनके रोजमर्रा के जीवन को करीब से देख सकते हैं. राजस्थान की तपती गर्मी के बीच आमेर का यह हाथी गांव पर्यटन स्थल बन चुका है.
रिदम जैन