महात्मा गांधी का यह कथन वर्तमान दौर मैं बिल्कुल सत्य प्रतीत हो रहा है कि "पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं" जिस पृथ्वी ने मानव को जीवन, जल, जंगल और जैव-विविधता का अनमोल उपहार दिया, उसी पृथ्वी पर आज विकास की अंधी दौड़ और जनसंख्या के निरंतर विस्तार ने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है.
हर वर्ष 11 जुलाई को मनाया जाने वाला विश्व जनसंख्या दिवस केवल जनसंख्या वृद्धि के आंकड़ों का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस गंभीर प्रश्न पर विचार करने का भी दिन है कि क्या पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन बढ़ती मानव आबादी का भार अनंतकाल तक वहन कर सकेंगे?
आज जब जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट, वायु प्रदूषण, जैव-विविधता का क्षरण और प्राकृतिक आपदाएं मानव सभ्यता को चुनौती दे रही हैं, तब यह स्वीकार करना होगा कि इन समस्याओं की जड़ में अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि भी एक महत्वपूर्ण कारण है. यदि समय रहते जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को हरित भविष्य नहीं, बल्कि संसाधनों के लिए संघर्षरत संसार विरासत में मिलेगा.
विश्व की जनसंख्या ने बीते सौ वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है. वर्ष 1900 में विश्व की आबादी लगभग 1.6 अरब थी. 1950 तक यह 2.5 अरब हुई और वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व की जनसंख्या 8 अरब के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गई.
अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह लगभग 9.7 अरब तक पहुंच सकती है. भारत, जिसने वर्ष 2023 में चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बनने का स्थान प्राप्त किया, आज लगभग 1.46 अरब लोगों का घर है.
भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जो एक विशाल जनसांख्यिकीय शक्ति है. किंतु यही जनसंख्या तब चुनौती बन जाती है जब उसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, स्वच्छ जल और स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराना कठिन हो जाए.
जनसंख्या अपने आप में समस्या नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब संसाधनों की उपलब्धता और जनसंख्या वृद्धि के बीच संतुलन बिगड़ जाता है. यही असंतुलन आज पर्यावरणीय संकट का सबसे बड़ा कारण बन चुका है.प्रत्येक नया व्यक्ति भोजन, पानी, ऊर्जा, आवास और परिवहन की आवश्यकता लेकर आता है.
इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जंगल काटे जाते हैं, नदियों का दोहन होता है, खनिज निकाले जाते हैं और जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है.
भारत में शहरीकरण तीव्र गति से बढ़ रहा है. महानगरों का विस्तार कृषि भूमि और वनों को निगल रहा है. कंक्रीट के जंगल प्राकृतिक जंगलों का स्थान ले रहे हैं. परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वर्षा चक्र असंतुलित हो रहा है और जैव-विविधता तेजी से समाप्त हो रही है.
विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष लगभग एक करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो जाता है. जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं; वे जलवायु के संतुलन, वर्षा, भूजल संरक्षण और लाखों जीवों के प्राकृतिक आवास हैं. इनके विनाश का अर्थ है सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का कमजोर होना.
कहा जाता है कि अगला विश्व युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पानी के लिए होगा. बढ़ती जनसंख्या ने जल संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव डाला है.भारत के पास विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या है, जबकि ताजे जल संसाधनों का केवल लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध है. यह असंतुलन भविष्य की गंभीर चुनौती का संकेत है.
नदियां सिकुड़ रही हैं, भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, झीलें समाप्त हो रही हैं और शहरों में जल संकट सामान्य घटना बनती जा रही है. अनेक क्षेत्रों में पेयजल के लिए लंबी कतारें लगती हैं, जबकि दूसरी ओर उद्योगों और शहरी जीवनशैली में जल का अत्यधिक दुरुपयोग जारी है. जनसंख्या जितनी तेजी से बढ़ेगी, जल संकट उतना ही गहरा होगा.
अक्सर लोग जलवायु परिवर्तन को केवल "ग्लोबल वॉर्मिंग" या तापमान का बढ़ना मान लेते हैं, लेकिन यह उससे कहीं अधिक विनाशकारी और व्यापक है. यह एक ऐसी श्रृंखला है जो पृथ्वी के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ रही है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन और वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि हाल के वर्षों में वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा है.
अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़, समुद्री तूफान और जंगलों की आग अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है. बढ़ती आबादी ऊर्जा की मांग बढ़ाती है. ऊर्जा की यह मांग अभी भी बड़े पैमाने पर कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से पूरी होती है.
इनके दहन से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है, जिससे पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है.जनसंख्या वृद्धि का एक और गंभीर परिणाम ठोस अपशिष्ट का विस्फोट है. शहरों में प्रतिदिन हजारों टन कचरा उत्पन्न होता है.
प्लास्टिक प्रदूषण पृथ्वी के लिए नया अभिशाप बन चुका है. नदियां, समुद्र, खेत और यहाँ तक कि मानव शरीर में भी सूक्ष्म प्लास्टिक की उपस्थिति वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है. इलेक्ट्रॉनिक कचरा, जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट और रासायनिक प्रदूषण भी तेजी से बढ़ रहे हैं. यदि उपभोग की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में कचरे का प्रबंधन स्वयं एक वैश्विक संकट बन जाएगा. धरती केवल मनुष्यों की नहीं है.
लाखों पशु-पक्षी, कीट, वनस्पतियाँ और सूक्ष्म जीव इस ग्रह की जीवन-श्रृंखला का हिस्सा हैं.लेकिन बढ़ती आबादी के कारण जंगलों का विनाश, अवैध खनन, प्रदूषण और शहरी विस्तार ने असंख्य प्रजातियों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है. अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं और हजारों विलुप्ति के कगार पर हैं.यदि जैव-विविधता समाप्त होती है तो खाद्य सुरक्षा, परागण, जल संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन भी खतरे में पड़ जाएगा.
भारत आज विकास के नए युग में प्रवेश कर रहा है. विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भारत विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है. लेकिन यह विकास तभी सार्थक होगा जब वह पर्यावरणीय संतुलन के साथ आगे बढ़े.सड़कें, उद्योग, स्मार्ट शहर और आधारभूत संरचना आवश्यक हैं, किन्तु इनके साथ वृक्षारोपण, हरित ऊर्जा, जल संरक्षण और टिकाऊ विकास की नीति भी उतनी ही आवश्यक है.भारत ने सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहन, स्वच्छ ऊर्जा, जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, मिशन लाइफ ( पर्यावरण के लिए जीवनशैली ) और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी पहलों के माध्यम से सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाए हैं.
इन पहलों की सफलता जनसहभागिता पर निर्भर करेगी. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है. यदि यही युवा पर्यावरण संरक्षण को जनांदोलन बना दें तो आने वाले दशकों में भारत विश्व के सामने टिकाऊ विकास का आदर्श प्रस्तुत कर सकता है.
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, पंचायतों, नगर निकायों, स्वयंसेवी संगठनों और डिजिटल माध्यमों के द्वारा पर्यावरण शिक्षा को जनचेतना का हिस्सा बनाना होगा. पेड़ लगाना केवल फोटो खिंचवाने का अभियान न होकर उनके संरक्षण का आजीवन संकल्प बनना चाहिए.
भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति-पूजक रही है. हमारे वेदों, उपनिषदों और पुराणों में पृथ्वी को माता, नदियों को देवी, वृक्षों को देवतुल्य और पर्वतों को जीवनदाता माना गया है. अथर्ववेद में भूमि को माता और स्वयं को उसका पुत्र ('माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः') कहा गया है. लेकिन दुर्भाग्य से आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में हमने इस सांस्कृतिक चेतना को कहीं पीछे छोड़ दिया.
आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान और संस्कृति दोनों मिलकर विकास का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करें जिसमें आर्थिक प्रगति भी हो और पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे. 'विकास बनाम पर्यावरण' का द्वंद्व समाप्त कर 'विकास के साथ पर्यावरण' की सोच अपनानी होगी.
विश्व जनसंख्या दिवस हमें केवल बढ़ती आबादी के आँकड़ों से परिचित नहीं कराता; यह हमें हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का बोध भी कराता है. पृथ्वी की सीमाएं हैं, संसाधनों की सीमाएं हैं, लेकिन मानव की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं.
यदि हमने आज संयम, संतुलन और सतत विकास का मार्ग नहीं अपनाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी. हर जन्म लेने वाले बच्चे को केवल जीवन का अधिकार ही नहीं, बल्कि स्वच्छ वायु, निर्मल जल, हरे-भरे वन, संतुलित जलवायु और जैव-विविधता से परिपूर्ण पृथ्वी का अधिकार भी है.
यह अधिकार तभी सुरक्षित रहेगा जब जनसंख्या, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित होगा.विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि मानव संख्या की वृद्धि तभी वरदान है, जब उसके साथ पर्यावरणीय उत्तरदायित्व भी बढ़े. अन्यथा बढ़ती आबादी, घटते संसाधन और बिगड़ता पर्यावरण मिलकर विकास की समस्त उपलब्धियों को अर्थहीन बना देंगे. आज आवश्यकता किसी भय की नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, नीति, जनजागरूकता और सामूहिक संकल्प की है.
यदि प्रत्येक नागरिक यह संकल्प ले कि वह प्रकृति से उतना ही लेगा जितनी आवश्यकता है और जितना संभव हो उतना उसे लौटाएगा, तो हरित भविष्य केवल एक स्वप्न नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जीवंत वास्तविकता बनेगा. "धरती हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली है; हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है". यही विचार विश्व जनसंख्या दिवस का सबसे बड़ा संदेश और मानवता का सबसे बड़ा दायित्व है.
डॉ सुशील द्विवेदी