महिला आरक्षण... बिल से बाहर निकला मुद्दा, मिलते हैं सड़क और चुनावी मंच पर

लोकसभा-विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का बिल, एक्सप्रेस स्पीड से मुद्दा बन गया. शुक्रवार शाम लोकसभा में यह विधेयक मतदान की कसौटी पार करने में चूक गया, लेकिन उतनी तत्परता से सत्ता पक्ष के बैनर-पोस्टर पर चढ़ गया. गृह मंत्री अमित शाह अपने भाषण में इसका इशारा पहले ही कर चुके थे. सोशल मीडिया कैंपेन शुरू हो गया है.

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लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल पर बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने एक देशव्यापी आंदोलन की भूमिका रख दी थी. (फोटो- पीटीआई) लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल पर बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने एक देशव्यापी आंदोलन की भूमिका रख दी थी. (फोटो- पीटीआई)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 19 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:38 AM IST

लोकसभा के गलियारों के बाद चुनावी रैलियों में 'महिला आरक्षण' के मुद्दे का सेंटर स्टेज लेना तय है. महिलाओं के लिए आरक्षण और परिसीमन सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत की दहलीज पार करने में नाकाम रहा. लेकिन इस विधायी विफलता के पीछे छिपी राजनीतिक पटकथा कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. बिल का गिरना शायद एक ’रणनीति’ का हिस्सा था, जिसने भाजपा को विपक्ष के खिलाफ एक अचूक और धारदार चुनावी हथियार थमा दिया है.

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जैसे ही बिल के गिरने की घोषणा हुई, सदन के भीतर और बाहर जो दृश्य दिखा, वह किसी सधे हुए नाटक से कम नहीं था. सत्ता पक्ष की महिला सांसद हाथों में तख्तियां और बैनर लिए विपक्ष विरोधी नारेबाजी करते हुए बाहर निकलीं. यह विरोध स्वतःस्फूर्त कम और पूर्वनियोजित अधिक लग रहा था. मानो बिल और तख्तियों पर मैसेज साथ-साथ ही छपवाए गए हों. संदेश साफ था- ’हमने महिलाओं के लिए कोशिश की, विपक्ष ने रोक दिया.’

एक घंटा 10 मिनट तक गृह मंत्री शाह का सदन में विपक्ष पर किया गया प्रहार इसी रणनीति की नींव था. उन्होंने न केवल विपक्ष की नीयत पर सवाल उठाए, बल्कि महिलाओं के हक के एकमात्र रक्षक के रूप में अपनी सरकार को पेश किया. इस आक्रामक तेवर से स्पष्ट था कि सरकार इस नतीजे के लिए पहले से मानसिक रूप से तैयार थी. अपने भाषण के बीच शाह यह भी बोल गए- ‘मैं जानता हूं कि ये वोट नहीं देंगे तो महिला आरक्षण बिल गिर जाएगा. लेकिन ये देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनके रास्ते का रोड़ा कौन है’.

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बिल की खामियां या रणनीतिक 'पेच'?

विधेयक की बनावट में कई मूलभूत कमियां थीं. सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या सरकार वास्तव में इसे इसी स्वरूप में पास कराना चाहती थी? बिल में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने का स्पष्ट प्रावधान न होना इसकी सबसे कमजोर कड़ी थी. हालांकि, बहस के दौरान अमित शाह इसे दर्ज करने के लिए तैयार दिखे, लेकिन जब बात इसे जनगणना और ठोस समय सीमा से जोड़ने की आई, तो सरकार के कदम पीछे खिंच गए.

विपक्ष का यह तर्क कि बिना जातिगत जनगणना और स्पष्ट टाइमलाइन के यह बिल केवल ’चुनावी शिगूफा’ है, अपनी जगह वजन रखता है. लेकिन भाजपा ने इस तर्क को भी ’महिला विरोधी’ रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सरकार का रुख ऐसा था, जैसे ’हम जो दे रहे हैं उसे बिना शर्त स्वीकार करो’. यह दर्शाता है कि उसका लक्ष्य बिल पास कराना नहीं, बल्कि एक नैरेटिव सेट करना था.

परिसीमन और जनगणना का अंतहीन जाल

विधेयक में महिला आरक्षण को परिसीमन और अगली जनगणना से जोड़ना इसे भविष्य के गर्भ में धकेलने जैसा था. विपक्ष ने जब इसे तुरंत लागू करने की मांग की, तो सरकार ने तकनीकी पेच फंसाकर इसे टाल दिया. यह वही बिंदु है जहां भाजपा की तीखी रणनीति उजागर होती है. बिल पास हो जाता तो श्रेय मिलता, लेकिन बिल गिर जाने से भाजपा को ’विक्टिम’ और ’अन्याय’ का वह कार्ड खेलने का मौका मिल गया है, जो चुनावी रैलियों में ज्यादा कारगर साबित होता है.

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भाजपा के लिए यह हार दरअसल एक बड़ी जीत की भूमिका है. आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अब भाजपा का मुख्य नारा ’विपक्ष का महिला विरोधी चेहरा’ होगा. पार्टी का कैडर अब गांव-गांव जाकर यह बताएगा कि प्रधानमंत्री मोदी तो आधी आबादी को उनका हक देना चाहते थे, लेकिन 'घमंडिया' गठबंधन ने उसे गिरा दिया.

सत्ता पक्ष की रणनीति का 'पोस्टमॉर्टम' करें तो यह स्पष्ट होता है कि इस पूरे घटनाक्रम में महिलाएं और उनका प्रतिनिधित्व केवल एक जरिया थे, असली मकसद विपक्ष की घेराबंदी करना था. गुरुवार को लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके थे कि यदि विपक्ष चाहता है कि मुझे इसका क्रेडिट न मिले तो वह बिल को समर्थन देकर ये कर सकता है. 

भाजपा ने बहुत चतुराई से गेंद को विपक्ष के पाले में डाल दिया है. अब विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में आकर यह सफाई देनी होगी कि उन्होंने बिल क्यों गिराया, जबकि भाजपा आक्रामक होकर इसे महिलाओं के साथ 'विश्वासघात' के रूप में प्रचारित करेगी.

संसद में हार, चुनावी मैदान में जीत

यह बिल लोकसभा के संख्याबल के गणित में भले ही हार गया हो, लेकिन भाजपा के लिए यह राजनीतिक 'बूस्टर डोज' साबित होने जा रहा है. भाजपा ने एक ऐसा मुद्दा 'पास' करा लिया है जिसका इस्तेमाल वह आने वाले चुनावों में बेधड़क करेगी.

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अब चुनावी रैलियों में गूंजने वाला यह जुमला तैयार है- ’विपक्ष ने देश की माताओं-बहनों के साथ धोखा किया है.’ भाजपा की यह रणनीति उसे उन महिला मतदाताओं के करीब ले जा सकती है, जो भावनात्मक रूप से इस मुद्दे से जुड़ी हैं. आखिरकार, सदन की यह हार भाजपा की चुनावी बिसात पर एक बड़ा मोहरा बनकर उभरी है, जिसका मुकाबला करना विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. राहुल गांधी कह रहे हैं- ‘उन्होंने महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया है, परिसीमन का विरोध किया है’. लेकिन भाजपा उनकी ये सफाई जनता, खासकर महिलाओं को सुनने देगी?

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