ठोस हिंदू, बिखरा मुस्लिम वोटः क्या बंगाल ने भारत की चुनावी राजनीति को उलट दिया है?

जिस मुस्लिम वोट बैंक को 'सेक्युलर' पार्टियों द्वारा लगभग पक्का मान लिया गया था, उसने ताजा बंगाल चुनावों में पारंपरिक व्यवहार से हटकर एक चौंकाने वाला बदलाव दिखाया है. बीजेपी की प्रचंड जीत, और मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की हार कई ट्रेंड ध्वस्त कर रही है.

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बंगाल चुनाव में इस बार वोटिंग का अलग पैर्टन देखने को मिला (Photo-ITG) बंगाल चुनाव में इस बार वोटिंग का अलग पैर्टन देखने को मिला (Photo-ITG)

अमित भारद्वाज

  • नई दिल्ली,
  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:59 PM IST

भारत की चुनावी लड़ाइयां जाति और धार्मिक विभाजन से तय होती रही हैं. इसमें एक बड़ी सच्चाई यह है कि हिंदू वोट जाति विभाजन के कारण बिखरा हुआ होता है जबकि मुस्लिम वोट एक चट्टान की तरह ठोस ब्लॉक होता है. दशकों तक, वोटर व्यवहार की इस बुनियादी समझ ने भारत की चुनावी राजनीति को आकार दिया है. इसने यह सुनिश्चित किया कि खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां हर चुनाव में पक्के वोटों के एक बड़े हिस्से के साथ उतरें. दूसरे शब्दों में, इसका मतलब था कि बीजेपी हर चुनाव में 20% से 40% वोट शेयर के ’सेक्युलर’ नुकसान के साथ जाती थी. किसी भी पार्टी के लिए यह एक बहुत कठिन चढ़ाई थी, भले ही वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी क्यों न हो.

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लेकिन वह 2014 तक और राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेंद्र मोदी के आगमन तक था. उस साल, मोदी ने 282 सीटें जीतकर देश को चौंका दिया. यह 25 से अधिक वर्षों में पहली बार था जब किसी पार्टी ने बहुमत जीता था. वह जातियों से ऊपर उठकर हिंदू वोटों के सफल एकीकरण का पहला संकेत था. तब से मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने चुनाव दर चुनाव अधिक जातियों को हिंदू छतरी के नीचे लाने की अपनी क्षमता दिखाई है.

लेकिन यह कभी भी उतना साफ तौर पर नहीं दिखा जितना कि अभी खत्म हुए बंगाल चुनावों में. इस चुनाव में, बीजेपी ने हिंदू वोटों को पहले की तरह एकजुट करने में कामयाबी हासिल की, जबकि राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर वो हुआ जो सोचा भी नहीं जा सकता था. किसी भी चुनाव में जहां बीजेपी एक बड़ी दावेदार होती है, यह मान लिया जाता था कि मुसलमान उस पार्टी के लिए एकजुट होकर वोट करेंगे जो बीजेपी को हराने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में हो. इस मामले में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC). मुसलमान लंबे समय से इस रणनीतिक ’बीजेपी को हराना ही है’ वाले बोझ को ढो रहे हैं. और कमोबेश ममता इसी पर भरोसा कर रही थीं. या इसे पक्का मानकर चल रही थीं.

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लेकिन एक चौंकाने वाला उलटफेर हुआ. मुस्लिम वोट टूट गया. यह शायद कुछ पिछले चुनावों में भी हुआ हो लेकिन बंगाल 2026 में यह टूटन बहुत बड़े पैमाने पर थी. जिन पार्टियों के पास बीजेपी को रोकने की कोई उम्मीद नहीं थी, जैसे कांग्रेस (INC), AJUP, CPM, AIMIM आदि, उन्होंने मुस्लिम वोटों का जमकर स्वाद चखा, जिसे ममता अपना राजनीतिक अधिकार मानती थीं. इन पार्टियों ने ममता के इस सिक्योरिटी नेट की मुस्लिम वोटों की गांठ को एक-एक करके खोल दिया.

आइए मैं कुछ उदाहरणों के जरिए बताता हूं, एक-एक मुस्लिम बहुल सीट के हिसाब से. लेकिन चूंकि यह एक गहरा विश्लेषण है, तो एक लंबी रीडिंग के लिए तैयार रहें. अगर आप जल्दी में हैं, तो आप इस संक्षिप्त वर्जन को देख सकते हैं जिसे मैंने दो दिन पहले पब्लिश किया था.

वापस विश्लेषण पर आते हैं. हम नतीजों को तीन हिस्सों में बांटेंगे: 
1. वो सीटें जो ममता बीजेपी से हार गईं; 
2. वो सीटें जो उन्होंने गैर-बीजेपी पार्टियों से खो दीं
3. वो सीटें जो उन्होंने जीतीं, लेकिन बहुत कम मार्जिन के साथ.

वो सीटें जो ममता बीजेपी से हार गईं
पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी है. मुर्शिदाबाद का हिस्सा बेलडांगा विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों की संख्या बहुत ज्यादा है. यहां बीजेपी के टिकट पर भरत कुमार झवर ने जीत हासिल की. यह सीट आपको एक झलक देती है कि कई क्षेत्रों में क्या हुआ-ममता के लिए एक दोहरी मार, बीजेपी के लिए हिंदू वोटों का एकजुट होना और उनके अपने मुस्लिम वोटों का बिखर जाना.

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2021 में, बीजेपी को यहां 28.9 प्रतिशत वोट मिले थे. तृणमूल ने 55 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ सीट जीती थी. कांग्रेस-जो लेफ्ट-ISF गठबंधन का हिस्सा थी-को 13 प्रतिशत से थोड़ा अधिक वोट मिले थे. इस साल, बीजेपी ने अपना वोट शेयर सिर्फ तीन प्रतिशत बढ़ाकर 31.88 कर लिया. यह बेलडांगा की लगभग पूरी हिंदू वोटिंग आबादी है क्योंकि हुमायूं लगभग 63% मुसलमान माने जाते हैं. लेकिन TMC का वोट शेयर 55% से गिरकर 26% रह गया, जिसमें से 20.4% हुमायूं कबीर की AJUP को और 4.5% कांग्रेस को चले गए (जो 13% से बढ़कर 17.5% हो गई). हिंदू वोट मजबूत हुआ और मुस्लिम वोट बिखर गया.

मुर्शिदाबाद के ही कांदी में, TMC के मौजूदा विधायक अपूर्वा सरकार बीजेपी से हार गए. कांदी में मुस्लिम वोटरों की अच्छी संख्या है. लेकिन सरकार का वोट शेयर 2021 के 51% से गिरकर 2026 में 31% रह गया. बीजेपी की गार्गी दास घोष को 36.7% के साथ सिर्फ 5% अधिक वोट मिले. TMC को सबसे बड़ी चोट AIMIM ने पहुंचाई, जिसे 15.62% वोट मिले. कांग्रेस भी 10.5% से बढ़कर 11.5% पर पहुंच गई.

जांगीपुर एक और मुस्लिम बहुल सीट (लगभग 49%) है जिसे बीजेपी ने TMC से छीन लिया. बीजेपी का वोट शेयर 2021 के 22% से बढ़कर 42% हो गया और कांग्रेस ने अपना शेयर 15% (लगभग 31,000 वोट) तक बढ़ा लिया. TMC के वोट लेफ्ट गठबंधन में भी चले गए. नतीजा: TMC 10,542 वोटों से हार गई.

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यही कहानी उत्तर दिनाजपुर की करणदिघी में दोहराई गई, जहां लेफ्ट गठबंधन ने TMC को नुकसान पहुंचाया और अपना वोट शेयर 2021 के चार प्रतिशत से बढ़ाकर 18% कर लिया. बीजेपी 20,000 के मार्जिन से जीत गई. TMC के मौजूदा विधायक गौतम पाल का हिस्सा 55% से गिरकर 35% रह गया. बीजेपी के लिए हिंदू वोट एकजुट होने और TMC के खिलाफ बिखराव का एक और मामला.

उत्तर 24 परगना के अशोकनगर में, बीजेपी ने TMC के मौजूदा विधायक नारायण गोस्वामी को 9,000 से थोड़े अधिक वोटों से हराया. यहां ISF को लगभग 29,000 वोट मिले. बीजेपी ने हरिपाल विधानसभा क्षेत्र में TMC को 3500 से कम वोटों से हराया. ISF उम्मीदवार मुजफ्फर अली ने 12,000 से थोड़े अधिक वोट हासिल किए.

TMC पांडुआ सीट बीजेपी से 5,000 से अधिक वोटों से हार गई. जबकि TMC ने खुद 2021 के मुकाबले 5,000 वोट कम पाए, CPM के अमजद हुसैन एसके ने 27,500 वोट लेकर उसे और चोट पहुंचाई. और सबसे बड़ा झटका खुद बीजेपी से लगा जिसने 30,000 अधिक वोट हासिल किए. मुर्शिदाबाद ने बीजेपी को 31,000 वोटों के बढ़े हुए मार्जिन के साथ वापस भेजा. कांग्रेस, फॉरवर्ड ब्लॉक, AJUP के मुस्लिम उम्मीदवारों को इस सीट पर बीजेपी के जीत के मार्जिन से अधिक वोट मिले.

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वो सीटें जो ममता गैर-बीजेपी पार्टियों से हार गईं

ममता को सीटों का नुकसान सिर्फ बीजेपी से या सिर्फ मुर्शिदाबाद-मालदा जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में ही नहीं हुआ, बल्कि दक्षिण 24 परगना की सीटों पर भी हुआ. गैर-बीजेपी पार्टियों- कांग्रेस, CPM और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में ममता को चोट पहुँचाई. यह एक साधारण आँकड़ा इसे सबसे अच्छे से समझाता है: कांग्रेस के केवल 29 उम्मीदवार जिन्होंने पूरे राज्य में चुनाव लड़ा, वे 20,000 से अधिक वोट पाने में सफल रहे. उनमें से तेईस मुसलमान थे. यह दिखाता है कि भले ही कांग्रेस ज्यादातर जगहों पर मुकाबले में नहीं थी, लेकिन उसका सबसे मजबूत प्रदर्शन मुस्लिम इलाकों में रहा-जो ममता के लिए एक घातक झटका था.

इसी तरह, CPM के 14 मुस्लिम उम्मीदवार 20,000 का आंकड़ा पार कर गए और ISF के 23 उम्मीदवारों को 10,000 से अधिक वोट मिले. इसने केतुग्राम में 10,700 और जगतबल्लभपुर में 20,000 से थोड़े अधिक वोट हासिल किए. TMC ये दोनों सीटें बीजेपी से 6,000 वोटों से हार गई.

ISF के नौशाद सिद्दीकी ने दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट को अच्छे मार्जिन के साथ बचा लिया. CPM ने 2026 में पश्चिम बंगाल में अपना खाता फिर से खोला. डोमकल सीट से उनके एकमात्र विधायक मुस्तफिजुर रहमान हैं. कांग्रेस के मोताब शेख ने फरक्का से जीत दर्ज की और जुल्फिकार अली ने रानीनगर जीता. AJUP के संस्थापक हुमायूं कबीर ने दोनों सीटों रेजीनगर और नौदा से जीत हासिल की जहां से उन्होंने चुनाव लड़ा था.

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हुमायूं कबीर की AJUP- जिसे चुनावों से पहले गंभीर दावेदार नहीं माना जा रहा था, ने ममता को चौंका दिया. कबीर ने अपनी दोनों सीटें जीतीं. रेजीनगर लगभग 59,000 वोटों से और नौदा 27,000 से अधिक वोटों से, जहां TMC  तीसरे स्थान पर रही.

हरिहरपाड़ा में, AJUP ही TMC की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई. यहां TMC, AJUP और CPM के बीच मुस्लिम वोटों का तीन तरफा बँवारा देखा गया. 2021 में यहां TMC को 47% वोट मिले थे. फरक्का में लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी के बीच थी. TMC यहां भी तीसरे स्थान पर खिसक गई. कांग्रेस के मोताब शेख ने 8,193 वोटों के मार्जिन से सीट जीती. कांग्रेस ने रानीनगर भी TMC पर 2,701 वोटों के मामूली मार्जिन से जीत लिया. यहां भी, CPM के जमाल हुसैन को 48,587 वोट मिले. 2021 में TMC ने 60% वोट बटोरे थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

डोमकल, जो एक मुस्लिम बहुल सीट है, उसे CPM के मुस्तफिजुर रहमान ने 16,000 से अधिक वोटों के मार्जिन से जीता. कांग्रेस को लगभग 30,000 वोट मिले और AJUP को 7,000 से अधिक वोट मिले.

वो सीटें जो TMC जीती, लेकिन बस किसी तरह ममता के मुस्लिम गढ़ में सेंध उन सीटों पर भी दिखती है जो उनकी पार्टी ने जीती हैं. जलंगी में, TMC की जीत का मार्जिन 2021 के भारी-भरकम 80,000 से अधिक वोटों से गिरकर 2026 में 21,000 रह गया. महत्वपूर्ण बात यह है कि लेफ्ट और कांग्रेस ने 2021 का चुनाव गठबंधन में लड़ा था. अगर आप कांग्रेस और CPM के वोटों को एक साथ रख दें, तो उन्होंने 2026 में 1,00,000 से अधिक वोट हासिल किए हैं, जो TMC के नए चुने गए विधायक बाबर अली (88,684) को मिले वोटों से अधिक हैं. यहां तक कि इस सीट पर AJUP उम्मीदवार को भी लगभग 5,000 वोट मिले. मुस्लिम वोट बैंक में विभाजन साफ है.

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भगवानगोला में, 2021 में TMC का मार्जिन 1,00,000 से अधिक था, लेकिन यह लगभग आधा गिरकर 56,000 रह गया. यहां CPM को लगभग 50,000 और कांग्रेस को 29,000 से अधिक वोट मिले. कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों ने इसी तरह नलहाटी और रतुआ में भी TMC के वोट शेयर में सेंध लगाई.

कालीगंज में, CPM और AJUP के मुस्लिम उम्मीदवारों को क्रमशः लगभग 23,000 और 16,000 वोट मिले. कांग्रेस के शेख काबिल उद्दीन को 4,000 से अधिक वोट मिले. हालांकि TMC कालीगंज को बचाने में कामयाब रही, लेकिन 2021 की तुलना में इसका वोट शेयर 53 प्रतिशत से गिरकर 40 प्रतिशत हो गया है.

मालदा के सुजापुर जैसे मुस्लिम गढ़ में भी TMC का वोट शेयर 23% गिर गया. यहां मुख्य लाभ उठाने वाले कांग्रेस और ISF रहे -दोनों ने ही सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. बीजेपी का वोट शेयर काफी हद तक बना रहा. यही पैटर्न मालतीपुर, रघुनाथगंज में भी जारी है जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 70 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है.

तो ममता के लिए क्या गलत हुआ?

विशेषज्ञों के मुताबिक कि पश्चिम बंगाल में माना जाता था कि मुस्लिम वोटर TMC का एकजुट होकर साथ देंगे क्योंकि 2026 के चुनाव स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू (SIR) के बैकग्राउंड में हुए थे. वोटिंग अधिकार खोने और सोशल वेलफेयर स्कीम से बाहर होने का डर अल्पसंख्यक समुदाय की बातचीत में दिख रहा था. हालांकि, यह धारणा गलत साबित हुई.

कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद रियाज बताते हैं कि 2021 के राज्य चुनाव CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में हुए थे. TMC को इसका फायदा मिला था. उन्होंने वक्फ बोर्ड बिल पर ममता के स्टैंड, मुस्लिमों के लिए OBC कोटे के मुद्दे को हल करने से उनके इनकार और विकास व नौकरियों की कमी पर सामान्य नाराजगी जैसे कारणों का हवाला दिया. रियाज कहते हैं, ’मुस्लिम बहुल सीटों पर 90% हिंदू वोट बीजेपी को चले गए,’ जिससे ममता को दोहरी मार पड़ी.
उन्होंने तर्क दिया कि ISF के विस्तार को रोकने पर TMC के फोकस को फुरफुरा शरीफ के अनुयायियों ने पसंद नहीं किया. ’इसे ISF के उत्पीड़न के रूप में देखा गया. इससे फुरफुरा शरीफ के समर्थकों में यह धारणा बनी कि ममता बीजेपी से मजबूती से लड़ने के बजाय भांगड़ में भी ISF को दबाने पर अधिक केंद्रित थीं.’

रियाज और जादवपुर यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर अब्दुल मतीन जैसे विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि TMC प्रमुख ने बीजेपी का डर दिखाकर अल्पसंख्यक वोट बैंक पर कब्जा करने की कोशिश की. इसने 2021 में काम किया था. लेकिन ’कैप्टिव वोट बैंक’ (बंधुआ वोट बैंक) जैसा व्यवहार समुदाय द्वारा सकारात्मक रूप से नहीं लिया जा रहा है.

मतीन ने कहा कि मुस्लिम वोटों में बिखराव राज्य में एक रीजनल फैक्टर था. ’मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना के कुछ हिस्सों में यह चलन देखा गया. मुर्शिदाबाद कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था. ममता बनर्जी ने इन इलाकों में कांग्रेस को खत्म कर दिया था. मालदा के मुसलमान कांग्रेस, TMC और लेफ्ट-ISF गठबंधन में चले गए. बेलडांगा की कहानी इसी बिखराव के कारण हुई. इस क्षेत्र में SIR के प्रभाव और बड़े पैमाने पर नाम हटने ने भी TMC को प्रभावित किया,’ मतीन ने कहा.

मतीन कहते हैं, ’दक्षिण 24 परगना में TMC इसलिए नहीं हारी कि मुस्लिम वोट बंट गए. इसका संबंध बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों के एकजुट होने से अधिक है.’ रियाज और मतीन दोनों ने इशारा किया कि पिछले पांच वर्षों में TMC के सॉफ्ट हिंदुत्व वाले दिखावे ने मुस्लिम वोटरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डाला.

तो क्या बंगाल के मुस्लिम वोटरों ने ’बीजेपी को हराने’ का बोझ छोड़ दिया है? इस सवाल पर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर खालिद अनीस अंसारी ने कहा, ’एक धारणा है कि मुसलमान एकजुट होकर वोट करते हैं. लेकिन बंगाल में इस बार बिखराव देखा गया.’

अंसारी ने बताया कि जहां क्षेत्रीय पार्टियां मुस्लिम वोटों पर भरोसा करती हैं, वहीं वे बीजेपी के हिंदू बहुसंख्यकवाद का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त काम नहीं करती हैं. “मुसलमानों को लगता है कि ये पार्टियां पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही हैं. जहां वे मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं, वहीं वे दक्षिणपंथी हिंदू बहुसंख्यकवाद से सीधे टक्कर नहीं लेते. उन्हें डर है कि यह हिंदू वोटरों को रास नहीं आएगा. क्षेत्रीय पार्टियों के साथ यही विरोधाभास है,” उन्होंने कहा.

कारण जो भी हों, हिंदू वोटों का ठोस जुटान और इसी के समानांतर मुस्लिम वोट का बिखराव अब तक के भारतीय वोटिंग पैटर्न में एक बड़ा उलटफेर है. राजनीतिक पार्टियां अगले बड़े मुकाबले के लिए इस बंगाल के चुनाव नतीजों को बार-बार बारीकी से स्टडी करेंगी. जिसमें 2027 की शुरुआत में होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव. और निश्चित रूप से उसके बाद भी.

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