मुजफ्फरनगर दंगा आपको याद होगा. करीब 43 लोग इन दंगों में मारे गए थे और 93 गंभीर रूप से घायल हुए थे. मुरफ्फरनगर दंगे के दौरान शुरुआती आग इतनी बड़ी नहीं थी जितनी खतरनाक 24 नवंबर को संभल के जामा मस्जिद के सामने की थी. संभल में सुबह से दोपहर तक दो बार में हुआ यह घमासान 4 घंटे तक चला जिसमें 10 हजार से ज्यादा लोग सड़कों पर थे. 4 लोगों की जान चली गई और 25 से ज्यादा पुलिस व प्रशासन के लोग घायल हो गए. आशंका थी कि 4 लोगों की मौत भयंकर दंगे का रूप ले लेगी पर ऐसा नहीं हुआ. उसके उलट, मात्र एक दिन के बंद के बाद हालात सामान्य होने शुरू हो गए. अभी हिंसा हुए एक हफ्ते भी नहीं बीते थे कि विपक्ष यहां के दौरे करना चाहता था. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी संभल पहुंचना चाहते थे. क्या हिंसा के माहौल की नजाकत को देखते हुए इन नेताओं का संभल में जले पर मरहम लगाने जाने का फैसला सही था?
1-परिस्थितियां बताती हैं कि माहौल कितना खतरनाक हो सकता था
जिन लोगों ने 24 नवंबर को संभल का माहौल देखा था उन्हें पता है कि उस दिन का दंगा कितना बड़ा हो सकता था. दरअसल माहौल कई दिनों से बन रहा था , विधानसभा चुनावों में कुंदरकी की हार और कई जगहों पर मुस्लिम समुदाय को वोट न देने की अफवाहों के चलते स्थानीय लोगों में नाराजगी सरकार को लेकर बढ़ रही थी. इसके पहले 19 नवंबर को दोपहर 2:38 पर कोर्ट का आदेश आया, 3:45 पर दो पत्र जिला प्रशासन को मिले. इसके बाद 5:30 बजे जिला प्रशासन की टीम कोतवाली पहुंची और 6 बजे मस्जिद के अंदर गए. 6 बजे से 7 बजे तक सर्वे चला. इसके बाद अंधेरा होने लगा. लाइट नहीं थी तो रात होने की वजह से सर्वे पूरा नहीं हो पाया. डीएम और कप्तान दोनों इस टीम के साथ थे.
-20 को फिर सर्वे टीम ने सर्वे के लिए जाने को जिलाप्रशासन से संपर्क किया लेकिन उस दिन कुंदरकी के उपचुनाव के चलते जिलाप्रशासन ने सर्वे के लिए प्रशासन व पुलिस की टीम देने से मना कर दिया। इसके बाद 21 को भी सर्वे नहीं हो पाया, क्योंकि जुम्मे के एक दिन पहले संवेदनशीलता रहती है और 22 को जुम्मा होने की वजह से सर्वे नहीं हुआ. कोर्ट कमिश्नर ने 23 को फिर अनुरोध किया. 23 को फिर जिला प्रशासन के सर्वे टीम के साथ सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लेटर आया जिसके बाद 24 को संडे में बचा हुआ सर्वे कराने के प्रशासन के साथ सर्वे टीम पहुंची.
-करीब साढ़े सात बजे से सर्वे शुरू हो गया. इसी बीच पता चला कि लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही थी और अचानक लोगों की संख्या काफी ज्यादा होने लगी और पीछ से पत्थरबाजी होने लगी तो दो लेयर सिक्युरिटी के साथ बल प्रयोग करते हुए लोगों को वहां से खदेड़ा गया. प्रशासन ने इस दौरान कुछ लोगों पर लाठी चार्ज भी किया. संभल के पांच वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में 3:15 लाख लोग रहते हैं यानि यहां की घनी आबादी में कुछ भी असंभव नहीं था.
-स्थानीय लोग बताते हैं कि 10 बजे तक 10-12 हजार लोग अचानक सड़कों पर उतर आए. 11 बजे तक स्थिति यह थी कि डीएम जामा मस्जिद के ऊपर चढ़ गए और एसपी नीचे से स्थिति को कंट्रोल कर रहे थे. पुलिस फोर्स आसु गैस, ब्लो पाइप, रबर बुलट से पत्थरबाजों को खदेड़ रही थी और 11 बजे तक पुलिस और पत्थरबाजों में घमासान की स्थिति बनी हुई थी. इस दौरान पुलिस और प्रशासन के बड़े अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए.
-इसके बाद डीएम और डीआईजी जामा मस्जिद के पीछे हिंदू पुरखेड़ा की ओर से होते हुए निकले और एसपी, एडीएम, एसडीएम एकता चौकी की ओर से होते हुए टीम के साथ निकले थे. बाद में लगभग 12:00 डीएम भी एकता चौकी पर पहुंच गए.
-इसके बाद 12:30 बजे से 2 बजे के बीच एकता चौकी के पास फिर से बवाल हो गया. करीब एक बजे यहां फायरिंग हुई. कमिश्नर भी मौके पर पहुंच गए थे. सैकड़ों लोग सड़क पर थे. डीएम, कप्तान भी इन्हीं के बीच में फंसे थे. भीड़ जिस तरह आक्रामक हो गई थी. पहले 500 निजी और सार्वजनिक सीसीटीवी कैमरे तोड़े गए. उससे अंदाजा यही लगाया जा रहा था कि बड़े स्तर पर दंगे की तैयारी थी. सरकारी करीब 138 सीसीटीवी को तोड़े गए, जिनके तोड़ने वालों के फोटो कैमरे में रिकॉर्ड हैं. करीब 25 पुलिसकर्मी और प्रशासन के लोग घायल हुए और एक की हालत अभी भी अलीगढ़ अस्पताल में खराब बनी हुई है. एक डिप्टी कलेक्टर का हाथ और पैर टूट गया जो अभी बिस्तर पर है. करीब डेढ़ घंटे तक यहां संघर्ष के बाद 2 बजे के करीब माहौल कंट्रोल हुआ.
2-मुजफ्फरनगर में नेतागीरी के चलते ही छोटी सी हिंसा बदल गई थी दंगों में
27 अगस्त, 2013 को कवाल गांव में कथित तौर पर एक छेड़खानी के साथ मुजफ्फरपुर दंगा शुरू हुआ था पीड़ित मलिक पुरा गांव की लड़की के साथ छेड़खानी में मुस्लिम युवक शाहनवाज कि हत्या कर दी गई. इसके बाद जिले के तत्कालीन पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम मुजफ्फरनगर सुरेंद्र सिंह जाट के द्वारा कुछ मुस्लिम युवकों को कवाल से गिरफ्तार किया गया. उसी रात उत्तर प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार ने पुलिस कप्तान मंजिल सैनी और डीएम सुरेंद्र सिंह जाट का मुजफ्फरनगर से तबादला कर दिया गया और सभी मुस्लिम युवकों को थाने से ही छोड़ दिया गया. इसके बाद खालापार में जुम्मे की नमाज के बाद जनसभा करने की छूट मिल गई. इस सभा में जाटों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए गए. प्रतिक्रिया स्वरूप जाटों ने भी नगला में महापंचायत बुलाई. जाट मैदान में पंचायत के बाद घरों को लौटते हुए जाटों पर जोली नहर और अनेकों रास्तों पर जानलेवा हमला किया गया. करीब चार से पांच लोगों को जान से मार दिया. इसके बाद दोनों तरफ से राजनीति शुरू हो गई. मारे गए जाट युवकों के इंसाफ के लिए एक महापंचायत बुलाई गई. इसके बाद मुस्लिमों की तरफ से 30 अगस्त को हुई मुस्लिम महापंचायत हुई. उसके जवाब में हुई नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत में भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं पर यह आरोप लगा की उन्होंने जाट समुदाय को बदला लेने को उकसाया. बाद में मुज़फ़्फ़र नगर, शामली, बागपत, सहारनपुर में दंगा फ़ैल गया.
मतलब साफ है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे लोगों को अगर सभा करने की अभी मोहलत मिली होती तो माहौल फिर से गरम होने का अंदेशा रहता. नेताओं का मरहम किसी को उत्तेजित करता तो किसी का उत्साह बढ़ाता.इसलिए ऐसे समय में किसी भी पार्टी या नेता का संभल न पहुंचना ही बेहतर था.
3-प्रशासन और पुलिस के बेस्ट कोऑर्डिनेशन मिसाल बन गया संभल हिंसा
पूरे घटनाक्रम को यदि देखा जाए तो भारत के इतिहास में पुलिस और प्रशासन के बीच इस तरह का कोऑर्डिनेशन देखने को नहीं मिला था. उपद्रव के समय घटनास्थल पर मौजूद एक दुकानदार अपना नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं कि पत्थर बरसाती उग्र भीड़ के सामने पुलिस प्रशासन के साथ जिला अधिकारी भी साथ-साथ चल रहे थे. यानि कि पुलिस को कोई भी एक्शन लेने के लिए अप्रूवल तुरंत मिल रहा था. इस दुकानदार का कहना है कि चोटिल तो डीएम और एसपी भी हुए थे , ये अलग बात है कि ये बात मीडिया में नहीं आई. स्थानीय पत्रकार का कहना है कि कई मौके ऐसे आए जब लगा भीड़ प्रशासन पर हावी हो जाएगी, लेकिन प्रशासन मुस्तैदी से डटा रहा और भीड़ हिंदू मुहल्लों की ओर मूव होने से बच गई. भीड़ जामा मस्जिद पर चढ़कर सर्वे टीम पर हमला करना चाहती थी, किंतु उसने केवल जमा मस्जिद के पीछे भवन के ऊपर खूब पत्थर बाजी की. वहीं सर्वे टीम पर हमला प्रशासन ने होने नहीं दिया. अन्यथा इतना बड़ा बवाल होता कि मुजफ्फरनगर पीछे छूट जाता.
प्रशासन और पुलिस का बेस्ट कोऑर्डिनेशन होने की वजह से यह आग एक पॉकेट में सुलगकर उसी में बुझ गई. जो डिसीजन लिए गए वह क्विवक फास्ट डिसीजन थे. बताया जाता है कि डीएम राजेन्द्र पैंसिया और एसपी केके बिश्नोई दोनों राजस्थान के रहने वाले हैं और पुराने दोस्त हैं. इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों के बीच जो इगो होता है वो यहां नहीं था.
4-तुरंत लिए गए यह फैसले साबित हुए कारगर
24 नवंबर को जैसे ही 2 बजे के करीब मामला शांत हुआ उसके बाद तुरंत 15-20 दंगाइयों पकड़ लिया गया. लोकल पर 126,135 के तहत पाबंद लगा दिया गया . इसके बाद करीब 2 हजार लोगों को नामजद किया गया. संभल में एंट्री करने के 7 नाके हैं जिनपर तुरंत फोर्स तैनात कर दी गई. सोशल मीडिया पर तुरंत निगरानी बढ़ा दी गई. अफवाह न फैले इसके लिए तुरंत इंटरनेट बंद कर दिया गया और 5 दिन तक पूरे तहसील में इंटरनेट प्रतिबंधित रखा गया. जनप्रतिनिधियों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. सभी जनप्रतिनिधियों से व्यक्तिगत रूप से वार्ता की और यदि उनसे वार्ता नहीं हुई तो उनके सहायकों से वार्ता की ताकि उनको स्थिति से अवगत भी कराया जा सके. संभल जाने पर किसी को आपत्ति नहीं थी किंतु ऐसी संवेदनशीलता और सतर्कता में यदि एक भी भड़काऊ बयान आ जाता तो हिंसा पुनः भड़क सकती थी. हिंसा के अगले दिन 25 नवंबर को एक दिन के लिए स्कूल मार्केट बंद करा दिया गया. हालांकि अगले ही दिन 26 से स्कूल मार्केट भी सब खोल दिए गए. साथ ही सबसे महत्वपूर्ण डिसीजन यह लिया गया कि 10 दिसंबर तक किसी भी जनप्रतिनिधि के संभल में आने पर प्रतिबंध रहेगा. कारण यही था किसी के भी आने से पब्लिक के सेंटिमेंट को भड़कने का मौका न मिले. यही कारण था कि जहां आग लगी थी वहीं बुझा ली गई.उसे फैलने से रोक दिया गया.
संयम श्रीवास्तव