ऑपरेशन सिंदूर... फतह-ए-आलम पाकिस्तान को एक और ‘जीत’ मुबारक!

भारत के खिलाफ किसी भी जंग में पाकिस्तान का जो भी हश्र हुआ हो, उसकी एक बात पर तो दाद देनी ही होगी कि हमारा पड़ोसी फतेह की कहानियां गढ़ने में माहिर है. ऑपरेशन सिंदूर में उसने जो भी खोया हो, लेकिन ऐसी ही एक कहानी के बल पर उसने एक ‘फील्ड मार्शल’ पाया है.

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दिल के खुश रखने को... ऑपरेशन सिंदूर के बाद आसिम मुनीर ने शहबाज शरीफ को यह फोटो गिफ्ट की थी. दिल के खुश रखने को... ऑपरेशन सिंदूर के बाद आसिम मुनीर ने शहबाज शरीफ को यह फोटो गिफ्ट की थी.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:46 PM IST

आज 'ऑपरेशन सिंदूर' की सालगिरह है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद पीड़ितों को न्याय दिलाने की खातिर भारत ने यह ऑपरेशन भले पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ चलाया हो, लेकिन सरहद के उस पार, हमारे पड़ोसी मुल्क में यह किसी 'यौम-ए-तकबीर' से कम नहीं है. आखिर पाकिस्तान दुनिया का इकलौता ऐसा मुल्क है, जिसने अपनी हर शिकस्त को इतनी खूबसूरती से 'फतह' में तब्दील किया है कि खुद इतिहास भी कन्फ्यूज होकर अपनी किताबें फाड़ दे.

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आइए, पाकिस्तान की उस 'अजेय' वीरता का सफरनामा पढ़ते हैं, जो हकीकत से कोसों दूर, सिर्फ रावलपिंडी की 'आईएसआई प्रोपेगंडा लैब' में रची गई है.

चैप्टर 1: 1947-48 में 'कबायली' टूरिज्म और कश्मीर फतह

आजादी के फौरन बाद, जब दुनिया को लगा कि पाकिस्तान अभी घुटनों पर चलना सीख रहा है, तब वहां के हुक्मरानों ने एक नया 'ट्रैवल बिजनेस' शुरू किया. इसे नाम दिया गया 'कबायली हमला'. पाकिस्तान में आज भी पढ़ाया जाता है कि उनके मुजाहिदों ने अकेले दम पर पूरा कश्मीर जीत लिया था.

सच्चाई यह है कि जब भारतीय सेना ने खदेड़ना शुरू किया, तो 'फतह' के नारे लगाती यह फौज एलओसी के पीछे जाकर दुबक गई. लेकिन पाकिस्तान में इसे 'पहली जीत' माना जाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि जितना हिस्सा (पीओके) उन्होंने कब्जाया, वह उनकी सैन्य ताकत थी, जबकि हकीकत में वह भारत की 'नेहरूवादी दरियादिली' और यूएन का दखल था.

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चैप्टर 2: 1965 में 'टैंकों का कब्रिस्तान' या 'पिकनिक पॉइंट'?

1965 की जंग को पाकिस्तान 'यौम-ए-दिफा' यानी रक्षा दिवस के तौर पर मनाता है. वहां के सिलेबस में लिखा है कि पाकिस्तान ने दिल्ली के लाल किले पर झंडा फहराने की तैयारी कर ली थी.

हकीकत ये थी कि पाकिस्तान का 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' फेल हुआ. भारतीय सेना लाहौर के जिमखाना क्लब तक पहुंच गई और वहां के अफसर अपनी व्हिस्की छोड़कर भाग खड़े हुए. लेकिन ताशकंद समझौते के बाद पाकिस्तान ने आवाम को बताया- ’हम जीत रहे थे, बस वो रूस बीच में आ गया!’. असल में वह जंग पाकिस्तान की 'अक्ल' का कब्रिस्तान साबित हुई थी, लेकिन वे आज भी 6 सितंबर को ऐसे मनाते हैं जैसे उन्होंने चांद पर तिरंगा नहीं, अपना चांद-तारा गाड़ दिया हो.

चैप्टर 3: 1971 में '93 हजार' मेहमान और भूगोल बदलने की कला

यह दुनिया के इतिहास का सबसे अनोखा 'विक्ट्री डे' है. दुनिया जानती है कि जनरल नियाजी ने ढाका में घुटने टेके, 93 हजार फौजियों ने सरेंडर किया और पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए. लेकिन पाकिस्तान के सरकारी रेडियो और अखबारों ने तब भी यही कहा ’मुजाहिद मोर्चे पर डटे हैं, हिंदुस्तान तबाही के किनारे है!’

जब ढाका हाथ से निकल गया, तो वहां की आवाम को समझाया गया कि यह 'रणनीतिक पीछे हटना' (Strategic Retreat) था. आज भी पाकिस्तान में एक तबका मानता है कि 1971 में वे जीते थे, क्योंकि अब उन्हें 'पूर्वी पाकिस्तान' का बोझ नहीं उठाना पड़ रहा. वैसे, हार को इतना पॉजिटिव लेना कोई पाकिस्तान से सीखे.

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चैप्टर 4: 1999 में कारगिल के पहाड़ों पर 'खुदकुशी'

कारगिल की चोटियों पर जब पाकिस्तानी फौज (मुजाहिदों के भेष में) चढ़ी थी, तो मुशर्रफ साहब को लगा था कि उन्होंने 'मास्टर स्ट्रोक' खेल दिया है. जब भारत ने 'बोफोर्स' के गोलों से जवाब दिया, तो पाकिस्तान ने अपने सैनिकों की लाशें पहचानने तक से इनकार कर दिया.

लेकिन वहां का प्रोपेगंडा देखिए- ’हमने भारत को घुटनों पर ला दिया था, बस नवाज शरीफ ने अमेरिका के दबाव में आकर जंग रोक दी.’ यानी फौज अजेय थी, बस राजनीति गद्दार निकल गई. कारगिल को पाकिस्तान आज भी अपनी 'महान पहाड़ी फतह' बताता है, भले ही इसके बाद उनके मुल्क की इज्जत पहाड़ से नीचे गिरकर गई. मिलिट्री ऑपरेशंस के जानकार उसे सुसाइड मिशन मानते हैं. जिसके बारे में पाकिस्तानी जनरलों ने सोचा ही नहीं था.

चैप्टर 5: 2016 और 2019 में 'पेड़ और कौवे' की सर्जिकल स्ट्राइक

उरी और पुलवामा के बाद जब भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक की, तो पाकिस्तान ने दुनिया को एक नया 'डिफेंस लॉजिक' दिया. 2016 में तो उसने कहा कि ’कोई स्ट्राइक हुई ही नहीं. बस कुछ पटाखे चले थे.’ जबकि 2019 में सीमा पार से यह रिपोर्टिंग हुई कि ’भारतीय विमानों ने सिर्फ हमारे कुछ 'देवदार के पेड़' और एक 'बेचारा कौवा' शहीद किया है.’

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अगले दिन उन्होंने विंग कमांडर अभिनन्दन को पकड़ने का जश्न ऐसे मनाया जैसे उन्होंने पूरी भारतीय वायुसेना को बंधक बना लिया हो. यह अलग बात है कि अगले ही दिन खौफ के मारे (जैसा कि उनकी असेंबली में कहा गया— 'पैर कांप रहे थे, माथे पर पसीना था') उन्हें अभिनन्दन को वापस भेजना पड़ा. पर पाकिस्तान में इसे 'इंसानियत की जीत' और 'भारत की हार' के तौर पर सेलिब्रेट किया गया.

चैप्टर 6: ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान ने पाया फील्ड मार्शल

पहलगाम के खूनखराबे के बाद भारत की ऑपरेशन सिंदूर वाली कार्रवाई. बहावलपुर, मुरीदके समेत आतंकियों के नौ ठिकाने नेस्तोनाबूद. लेकिन, पाकिस्तान में जश्न. ’हमने भारत के जंगी जहाज मार गिराए’. और जब पाकिस्तानी एयरबेस पर ब्रह्मोस ने छेद किए तो एक नई कहानी रची गई. पहले सीजफायर, और फिर फतेह. नोबेल की प्यास में तड़प रहे ट्रंप क्रेडिट लूटने में लग गए. इधर, पाकिस्तान में सेना प्रमुख आसिम मुनीर ’फील्ड मार्शल’ का पद हथियाने में. जो उन्हें मिला भी.

पूरे तमाशे में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का किरदार दिलचस्प रहा. ट्रंप साहब जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच 'मध्यस्थता' की बात करते थे, तो उनके पास आंकड़ों की एक जादुई पोटली होती थी. ट्रंप अपनी रैलियों और बैठकों में अक्सर भारत और पाकिस्तान के बीच गिरते हुए विमानों के आंकड़े ऐसे बताते थे जैसे किसी बेसबॉल मैच का स्कोर कार्ड पढ़ रहे हों. वे कहते थे कि भारत ने ये गिराया, पाकिस्तान ने वो गिराया. लेकिन कमाल की बात यह है कि वही ट्रंप जो दूसरों के विमान गिनने में माहिर थे, यह बताने से कतराते रहे कि ईरान ने अमेरिका के कितने विमानों को निशाना बनाया.

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'फतेह' का पाकिस्तानी वर्जन

पाकिस्तान की हर जंग की कहानी का एक ही पैटर्न है- जंग शुरू करो. मुंह की खाओ. जब हार तय हो जाए, तो 'इस्लाम' और 'एटम बम' के नाम लेकर शोर मचाओ. आखिर में एक 'विक्ट्री डे' घोषित कर दो और नई पीढ़ी को बताओ कि हमने भारत को धूल चटा दी.

'ऑपरेशन सिंदूर' की इस सालगिरह पर हम बस यही कह सकते हैं कि हकीकत से मुंह मोड़ना पाकिस्तान का नेशनल स्पोर्ट बन चुका है. इतिहास की किताबों में वे भले ही जीतते रहें, लेकिन दुनिया के नक्शे और हकीकत के मैदान में उनकी 'फतह' सिर्फ एक जोक बनकर रह गई है. 

दिल की तसल्ली के लिए ऐसा करना बुरा भी नहीं है. जैसे पाकिस्तानी टीम क्रिकेट में भारत से हारती है, तो पिछली सदी के आंकड़े याद करने लगती है. ’हार गए तो क्या हुआ, पहले हम भी हराते थे’. क्रिकेट में पाकिस्तान की ये खुशफहमी भारत को कोई तकलीफ नहीं देती है. लेकिन, फौजी जंगों में हार जाने के बावजूद पाकिस्तान के मंसूबे ऊंचे रहना आने वाले कल में और खूनखराबे आतंकी वारदातों की आहट बन जाते हैं.

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